पुलिस को ‘मंथली’ नहीं देने पर जेब में कट्टा रखकर फंसाया, कोर्ट के आदेश पर 7 पुलिसकर्मियों पर FIR दर्ज..

राजस्थान के भरतपुर जिले से खाकी को शर्मसार करने वाली एक बेहद गंभीर और सनसनीखेज घटना सामने आई है, जहाँ कथित तौर पर मासिक ‘मंथली’ (रिश्वत) न देने पर एक 16 वर्षीय नाबालिग किशोर को पुलिसकर्मियों द्वारा न केवल बेरहमी से पीटा गया, बल्कि उसकी जेब में जबरन अवैध देसी कट्टा (हथियार) डालकर उसे आर्म्स एक्ट के झूठे मुकदमे में फंसा दिया गया।

इस मामले में न्यायपालिका ने कड़ा रुख अपनाते हुए पीड़ितों को बड़ी राहत दी है। भरतपुर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) न्यायालय के आदेश पर मथुरा गेट थाने के सहायक उप-निरीक्षक (ASI) सहित 7 पुलिसकर्मियों के खिलाफ विभिन्न संगीन धाराओं में एफआईआर (FIR) दर्ज की गई है। यह पूरा मामला पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली और सत्ता के दुरुपयोग पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अदालत के हस्तक्षेप के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है और मामले की निष्पक्ष जांच के आदेश दिए गए हैं। यह आपराधिक घटना भरतपुर शहर के मथुरा गेट थाना क्षेत्र की है। पीड़ित एक 16 वर्षीय नाबालिग किशोर है, जिसने हाल ही में अपने परिवार की आजीविका चलाने के लिए भरतपुर में ही ‘कार रेंटल’ (किराए पर गाड़ी देने) का एक छोटा सा कारोबार शुरू किया था। शिकायत के अनुसार, जैसे ही उसने यह काम शुरू किया, जिला विशेष टीम (DST) के कुछ कांस्टेबलों और स्थानीय पुलिसकर्मियों की नजर उस पर पड़ी। आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने नाबालिग से अपना धंधा शांति से चलाने के बदले हर महीने ₹10,000 की ‘मंथली’ (मासिक हफ्ता वसूली) की मांग की। नाबालिग ने इतनी बड़ी रकम हर महीने देने से साफ तौर पर इनकार कर दिया, क्योंकि उसका नया कारोबार अभी शुरुआती दौर में था और वह इतनी बड़ी रिश्वत देने में सक्षम नहीं था।

जब नाबालिग ने ‘मंथली’ देने से मना कर दिया, तो आरोपी पुलिसकर्मियों ने उसे देख लेने और झूठे मुकदमे में फंसाकर जेल भेजने की धमकी दी। आरोप है कि अपनी धमकियों को अमलीजामा पहनाते हुए पुलिसकर्मियों ने नाबालिग को जबरन रास्ते से उठा लिया (अपहरण कर लिया) और उसे सुनसान जगह पर ले जाकर बेरहमी से पीटा। इतना ही नहीं, क्रूरता और साजिश की हदें पार करते हुए पुलिसकर्मियों ने नाबालिग की जेब में एक अवैध देसी कट्टा और कारतूस डाल दिए। इसके बाद उसकी फर्जी बरामदगी दिखाते हुए एक फर्जी वीडियो भी तैयार किया गया ताकि कोर्ट में इसे पुख्ता सबूत के तौर पर पेश किया जा सके। पुलिस ने नाबालिग के खिलाफ आर्म्स एक्ट (हथियार अधिनियम) के तहत मुकदमा दर्ज कर उसे हिरासत में ले लिया। जब नाबालिग पुलिस की हिरासत से छूटकर वापस अपने घर लौटा, तो उसके शरीर पर गंभीर चोटों के निशान देखकर परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई। पुलिस के खौफ और उसकी धमकियों के बावजूद, नाबालिग की बुआ (पीड़ित पक्ष) ने इस अन्याय के खिलाफ लड़ने का फैसला किया। उन्होंने जिले के उच्च पुलिस अधिकारियों से गुहार लगाई, लेकिन जब पुलिस महकमे की तरफ से अपने ही कर्मियों को बचाने की कोशिश की गई और कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो पीड़ित परिवार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। पीड़ित पक्ष के वकील अधिवक्ता परमवीर सोगरवाल ने न्यायालय के समक्ष दंड प्रक्रिया संहिता (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के तहत एक इस्तगासा (आवेदन) पेश किया। उन्होंने अदालत के सामने पुलिस की बर्बरता, मेडिकल रिपोर्ट, चोटों के निशान और हफ्ता वसूली के दावों से जुड़े साक्ष्य प्रस्तुत किए।

न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे मानवाधिकारों का हनन और वर्दी की आड़ में किया गया गंभीर अपराध माना। ACJM कोर्ट ने मथुरा गेट थाना प्रभारी (SHO) हरलाल मीणा को तलब किया और तत्काल प्रभाव से दोषी पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज करने का सख्त निर्देश जारी किया। अदालत के कड़े रुख और लिखित आदेश के बाद मथुरा गेट पुलिस थाने में शुक्रवार को आरोपी पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला पंजीकृत किया गया। इस एफआईआर में नामजद आरोपी से भी मिल लीजिए , दशरथ (कांस्टेबल / पुलिसकर्मी) अंकित (कांस्टेबल / पुलिसकर्मी) सत्यवीर (कांस्टेबल / पुलिसकर्मी) हरिओम (कांस्टेबल / पुलिसकर्मी) अभिमन्यु (कांस्टेबल / पुलिसकर्मी) शिवलाल (मथुरा गेट थाने में तैनात सहायक उप-निरीक्षक – ASI) एक अन्य अज्ञात पुलिस अधिकारी । इन सभी के खिलाफ अवैध वसूली (उगाही), अपहरण, मारपीट, साजिश रचने और फर्जी दस्तावेज व साक्ष्य गढ़ने जैसी संगीन धाराओं में मामला दर्ज किया गया है।

चूंकि मामला स्थानीय मथुरा गेट थाने के ही पुलिसकर्मियों से जुड़ा हुआ था, इसलिए स्थानीय पुलिस पर जांच को प्रभावित करने या सबूतों से छेड़छाड़ करने का संदेह था। निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए उच्च अधिकारियों के निर्देश पर इस संवेदनशील मामले की जांच अटल बंद थाना प्रभारी (SHO) हेमेंद्र चौधरी को सौंप दी गई है। अटल बंद थाना पुलिस अब इस बात की विस्तृत जांच कर रही है कि बरामद दिखाया गया देसी कट्टा कहाँ से आया था, क्या पुलिसकर्मियों ने खुद इसे खरीदा था, और नाबालिग को चोटें कैसे आईं। पुलिस महानिदेशक कार्यालय और भरतपुर एसपी इस मामले की मॉनिटरिंग कर रहे हैं। यह घटना राजस्थान में पुलिस भ्रष्टाचार और हफ्ता वसूली के बढ़ते मामलों का एक बड़ा प्रमाण है। हाल ही में राजस्थान उच्च न्यायालय ने भी पुलिस द्वारा आरोपियों या संदिग्धों के मानवाधिकारों के हनन पर कड़ी चिंता व्यक्त की थी। इस मामले ने यह साबित कर दिया है कि यदि पुलिस ही रक्षक से भक्षक बन जाए, तो आम नागरिक के पास न्यायालय ही एकमात्र सहारा बचता है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी निर्दोष नागरिक, विशेषकर एक नाबालिग की जेब में अवैध हथियार रखकर फंसाना सीधे तौर पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) और आर्म्स एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन है। यदि जांच में आरोप पूरी तरह सिद्ध हो जाते हैं, तो इन पुलिसकर्मियों को न केवल अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा, बल्कि उन्हें लंबी जेल की सजा भी भुगतनी पड़ सकती है। फिलहाल, विभाग इन आरोपियों को निलंबित करने की प्रक्रिया शुरू कर चुका है।

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