बिहार की आपदा को राष्ट्रीय आपदा बनाए,,,, कहाँ है बिहार का स्पेशल राज्य का दर्जा ?

बिहार में इस साल फिर से बाढ़ का भीषण तांडव देखने को मिल रहा है, जिससे 14-15 जिलों के करीब 45 से 78 लाख से अधिक लोग प्रभावित हो चुके हैं.

गंगा, कोसी, गंडक, सोन और पुनपुन जैसी प्रमुख नदियाँ कई स्थानों पर खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं. राज्य का 73% से अधिक भौगोलिक क्षेत्र (लगभग 68,800 वर्ग किलोमीटर) बाढ़ के प्रति बेहद संवेदनशील है, जो देश के कुल बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का करीब 16.5% हिस्सा है. हर साल आने वाली इस भीषण तबाही ने एक बार फिर बिहार को “राष्ट्रीय आपदा घोषित करने” और राज्य को “विशेष दर्जा” देने की दशकों पुरानी राजनीतिक व सामाजिक बहस को हवा दे दी है. नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, बिहार आपदा प्रबंधन विभाग (DMD) और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) की 10 टीमें तथा SDRF की 27 टीमें विभिन्न जिलों में तैनात हैं. 14 से अधिक जिलों के 85 से ज्यादा ब्लॉक बाढ़ की चपेट में हैं. प्रभावित लोगों के लिए 1,000 से अधिक कम्युनिटी किचन चलाए जा रहे हैं, जो लाखों लोगों को भोजन उपलब्ध करा रहे हैं. अब तक 2.50 लाख से अधिक पॉलिथीन शीट्स और 41,000 से अधिक सूखे राशन के पैकेट बांटे जा चुके हैं, जबकि 1,900 से अधिक नावें लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने के कार्य में जुटी हैं. बिहार के नागरिकों और स्थानीय राजनेताओं का तर्क है कि जब राज्य की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा हर साल बाढ़ के बुनियादी ढांचे को ठीक करने और राहत कार्यों में ही खर्च हो जाता है, तो इसे केवल ‘राज्य की समस्या’ क्यों माना जाए?

भारत में तकनीकी रूप से किसी भी आपदा को सीधे ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित करने का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है, लेकिन केंद्र सरकार इसे “गंभीर प्रकृति की आपदा” (Calamity of Severe Nature) मान सकती है. ऐसा होने पर राज्य को ‘राष्ट्रीय आपदा आकस्मिकता कोष’ (NCCF/NDRF) से अतिरिक्त वित्तीय सहायता मिलती है और केंद्र द्वारा ऋण अदायगी में राहत व अन्य रियायतें दी जाती हैं. बिहार लंबे समय से विशेष राज्य के दर्जे (Special Category Status – SCS) की मांग कर रहा है. विशेष राज्य का दर्जा मिलने परकेंद्र प्रायोजित योजनाओं (Centrally Sponsored Schemes) में 90% राशि केंद्र सरकार द्वारा और केवल 10% राशि राज्य द्वारा दी जाती है (सामान्य राज्यों के लिए यह अनुपात 60:40 या 50:50 होता है).औद्योगिक विकास के लिए एक्साइज ड्यूटी, कस्टम ड्यूटी और आयकर में भारी छूट मिलती है. केंद्र सरकार का रुख रहा है कि 14वें और 15वें वित्त आयोग की सिफारिशों के बाद, विशेष राज्य के दर्जे की अवधारणा को लगभग समाप्त कर दिया गया है. इसके बदले राज्यों को केंद्रीय करों में हिस्सेदारी (Devolution of Taxes) बढ़ाकर मदद दी जा रही है. इसके अतिरिक्त, बिहार उन पारंपरिक मानदंडों (जैसे दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र, अंतरराष्ट्रीय सीमा पर कम जनसंख्या घनत्व और आदिवासी बहुल आबादी) को पूरी तरह पूरा नहीं करता है, जो गाडगिल-मुखर्जी फॉर्मूले के तहत तय किए गए थे.

बिहार की बाढ़ केवल एक मौसमी समस्या नहीं बल्कि राज्य के विकास को दशकों पीछे धकेलने वाला एक वार्षिक दुष्चक्र है. जब तक नेपाल से आने वाली नदियों के जल प्रबंधन को लेकर ठोस अंतरराष्ट्रीय नीति और केंद्र से बड़ी ढांचागत वित्तीय सहायता नहीं मिलती, तब तक बिहार की यह ‘आपदा’ और ‘विशेष दर्जे’ की राजनीति की गूंज शांत होने वाली नहीं है.

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