दिया जलाएगा, महंगाई की मार झेलता देश और डूबता बिहार? चूल्हे की बेबसी—

सच्चाई यह है कि देश का गरीब और बिहार का आम नागरिक आज जीवन यापन के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। उत्सव और एकजुटता के प्रतीक समाज का हौसला बढ़ा सकते हैं, लेकिन वे भूखे पेट की आग नहीं बुझा सकते।

भारत त्योहारों और उत्सवों का देश है। यहाँ हर बड़े संकट या राष्ट्रीय आह्वान पर एकजुटता दिखाने के लिए ‘दिया जलाने’ या प्रतीकात्मक उत्सव मनाने की एक समृद्ध परंपरा रही है। लेकिन जब देश थोक महंगाई (WPI) के 9.92% और खाद्य महंगाई के 7% के पार जाने की दोहरी मार झेल रहा हो, तब सवाल उठता है कि क्या केवल प्रतीकों से आम जनता का पेट भर सकता है? यह सवाल तब और अधिक चुभने वाला हो जाता है जब हम ‘डूबते बिहार’ की कड़वी जमीनी हकीकत को देखते हैं—एक ऐसा राज्य जो देश में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय (लगभग ₹70,000) और हर साल बाढ़ व पलायन की त्रासदी झेलने के बाद भी राजनीतिक नारों के भरोसे खड़ा है। यह कोई मज़ाक नहीं, बल्कि आज के भारत और बिहार की वह सच्चाई है जिससे आँखें नहीं मूंद ली जा सकतीं।

देश में महंगाई का तांडव: आम आदमी की जेब खाली

सितंबर 2026 में जारी ताज़ा आर्थिक आंकड़ों के मुताबिक, देश में महंगाई ने आम नागरिक का जीना मुहाल कर दिया है। ईंधन और बिजली (Fuel & Power): ऊर्जा और ईंधन क्षेत्र की महंगाई दर 22.93% तक पहुंच गई है, जिसने माल ढुलाई और परिवहन को बेहद महंगा कर दिया है। थाली से गायब होती पौष्टिकता: खाने-पीने की चीज़ों में थोक महंगाई बढ़कर 7.05% हो चुकी है। प्याज, लहसुन, दालें और खाद्य तेलों की कीमतें आसमान छू रही हैं। बचत का संकट: जब रसोई का बजट ही बिगड़ जाए, तो देश की एक बड़ी आबादी के पास भविष्य के लिए बचत करने का कोई रास्ता नहीं बचता। संसद की हालिया रिपोर्टों में भी यह बात सामने आई थी कि न्यूनतम बैलेंस न होने के कारण करोड़ों जनधन खाते बंद करने पड़े हैं। ऐसे में आम आदमी से यह उम्मीद करना कि वह सिर्फ सकारात्मकता का दिया जलाकर चुप बैठ जाए, जमीनी हकीकत से मुंह मोड़ने जैसा है।

‘डूबता बिहार’: दावों की चमक के पीछे छुपा अंधेरा

बिहार की स्थिति देश के अन्य राज्यों से कहीं अधिक संवेदनशील है। राज्य सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए ₹3.47 लाख करोड़ से अधिक का भारी-भरकम बजट पेश किया है, जिसमें ‘सात निश्चय-3’ योजना के तहत 2030 तक 1 करोड़ नौकरियां देने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया है। लेकिन इन बड़े आंकड़ों की परतों के नीचे बिहार की जो बुनियादी कमियां हैं, वे आज भी जस की तस हैं। देश में सबसे कम प्रति व्यक्ति आय: भले ही बिहार की विकास दर (GSDP) कागजों पर 13.1% तक दिखाई गई हो, लेकिन भारत के आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey) के अनुसार, बिहार आज भी प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश के सबसे निचले पायदान पर खड़ा है। यहाँ का एक औसत नागरिक साल भर में मुश्किल से ₹70,000 से ₹76,490 ही कमा पाता है। पलायन और बेरोजगारी का चक्रव्यूह: युवाओं के लिए राज्य सरकार 1.17 लाख से अधिक आगामी पदों पर बहाली की बात कह रही है, और बेरोजगार स्नातकों को ₹1,000 मासिक भत्ता भी दिया जा रहा है। मगर हकीकत यह है कि उद्योगों की कमी के कारण आज भी बिहार का हुनरमंद और अकुशल युवा दिल्ली, मुंबई और पंजाब की ओर पलायन करने को मजबूर है। प्राकृतिक आपदाओं का अभिशाप: हर साल उत्तर बिहार का एक बड़ा हिस्सा बाढ़ में डूब जाता है। फसलें बर्बाद हो जाती हैं और अरबों रुपयों का बुनियादी ढांचा पानी में बह जाता है। बुनियादी स्तर पर बाढ़ नियंत्रण के ठोस उपाय न होने के कारण यह राज्य हर साल आर्थिक रूप से कई कदम पीछे चला जाता है।

क्या ‘दिया जलाना’ और सरकारी योजनाएं काफी हैं?

जब जनता महंगाई और बेरोजगारी की मार से कराह रही हो, तब सरकारों द्वारा प्रतीकात्मक राष्ट्रवाद या लोकलुभावन वादों का सहारा लिया जाता है। बिहार सरकार ने श्रमिकों को राहत देने के लिए 1 अप्रैल 2026 से नई न्यूनतम मजदूरी दरें (अकुशल श्रमिकों के लिए ₹436/दिन) लागू की हैं, और सरकारी कर्मचारियों के लिए महंगाई भत्ते (DA) को 60% करने पर विचार चल रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यह राहत ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। जब बाज़ार में खुदरा और थोक मूल्य सूचकांक लगातार बढ़ रहे हों, तो ₹10 या ₹20 की दिहाड़ी बढ़ोतरी महंगाई के दानव के सामने तुरंत दम तोड़ देती है। ग्रामीण इलाकों में जीवन यापन करना शहरी क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो चुका है क्योंकि वहां आय के साधन सीमित हैं और महंगाई की मार चौतरफा है।

समाधान की राह: नारों से आगे निकलने का समय

यदि देश को महंगाई की मार से बचाना है और बिहार को सचमुच डूबने से उबारना है, तो प्रतीकात्मक दीयों की जगह वास्तविक नीतियों के दीये जलाने होंगे। औद्योगीकरण पर ध्यान: बिहार को केवल कृषि-आधारित और सेवा क्षेत्र (Services Sector) पर निर्भर रहने के बजाय विनिर्माण (Manufacturing) को बढ़ावा देना होगा। बजट 2026 में ₹50 लाख करोड़ के निजी निवेश का जो लक्ष्य रखा गया है, उसे कागजों से निकालकर धरातल पर उतारना होगा। बाढ़ का स्थायी समाधान: नेपाल के साथ जल समझौतों और नदियों को जोड़ने की परियोजनाओं पर युद्धस्तर पर काम करना होगा ताकि हर साल होने वाली बर्बादी रुके। महंगाई पर कड़ा नियंत्रण: केंद्र और राज्य सरकारों को टैक्स संरचना और ईंधन पर लगने वाले करों में कटौती करके आम जनता को सीधी राहत देनी होगी, क्योंकि ईंधन की महंगाई ही अंततः हर चीज़ को महंगी करती है।

    सच्चाई का सामना
    सच्चाई यह है कि देश का गरीब और बिहार का आम नागरिक आज जीवन यापन के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। उत्सव और एकजुटता के प्रतीक समाज का हौसला बढ़ा सकते हैं, लेकिन वे भूखे पेट की आग नहीं बुझा सकते। जब तक रोज़गार के ठोस अवसर पैदा नहीं होंगे और बाज़ार में बुनियादी चीज़ों के दाम आम आदमी की पहुंच में नहीं आएंगे, तब तक विकास के तमाम दावे और नारे सिर्फ एक मज़ाक बनकर रह जाएंगे। अब समय आ गया है कि सरकारें प्रतीकों की राजनीति छोड़कर ठोस आर्थिक सुधारों की कड़वी सच्चाई को स्वीकार करें और उस पर काम करें।

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