प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन के अवसर पर देश भर में राजनीतिक और सामाजिक सरगर्मियां तेज रहीं। हर साल की तरह इस बार भी 17 सितंबर को देश के कई हिस्सों में इस दिन को ‘सेवा दिवस’ के रूप में मनाया गया। लेकिन इस बार का जन्मदिन राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ गया है।

विपक्षी दलों और कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का तर्क है कि इस बार के जन्मदिन पर आम जनता (पब्लिक) से ज्यादा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और स्वयं केंद्र सरकार के भीतर से प्रधानमंत्री को ‘आशीर्वाद’ और एकजुटता का संदेश देने की पुरजोर कोशिश की गई। आइए इस पूरे घटनाक्रम का एक विस्तृत विश्लेषण करते हैं कि आखिर क्यों इस बार के जन्मदिन को संगठन और सत्ता के बीच के समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, हालिया विधानसभा चुनावों और पार्टी के आंतरिक बदलावों के मद्देनजर इस बार का जन्मदिन भाजपा और आरएसएस के लिए एक बड़ा एकजुटता मंच (Solidarity Platform) बन गया। देश के शीर्ष नेतृत्व गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने प्रधानमंत्री को आधुनिक भारत का निर्माता बताते हुए बधाई दी। इन संदेशों में जनता से ज्यादा इस बात पर जोर था कि कैसे मोदी जी का नेतृत्व संगठन को एक सूत्र में बांधे रखता है। भाजपा सरकार के मंत्रियों ने इसे एक ‘संकल्प दिवस’ की तरह पेश किया, जिसमें सरकार की नीतियों को प्रधानमंत्री के दूरदर्शी नेतृत्व का परिणाम बताया गया। आलोचकों का मानना है कि यह जनता के जुड़ाव से अधिक सरकार के भीतर प्रधानमंत्री की निर्विवाद स्थिति को रेखांकित करने का प्रयास था।

पिछले कुछ समय से मीडिया और राजनीतिक हलकों में भाजपा और आरएसएस के बीच वैचारिक और संगठनात्मक मतभेदों को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जाती रही हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर संघ के शीर्ष नेतृत्व का रुख बेहद महत्वपूर्ण था। आरएसएस के शीर्ष पदाधिकारियों द्वारा प्रधानमंत्री की लंबी आयु और देश सेवा के लिए उनके स्वास्थ्य की कामना की गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह शुभकामना केवल एक औपचारिक बधाई नहीं थी, बल्कि यह संघ की तरफ से यह साफ संदेश था कि संगठन अभी भी उनके साथ मजबूती से खड़ा है। विपक्ष का आरोप है कि यह ‘जनता का आशीर्वाद’ नहीं बल्कि संघ का संगठनात्मक कवच है, जो प्रधानमंत्री को आंतरिक चुनौतियों से निपटने की ताकत देता है। संघ के इस आशीर्वाद ने उन सभी अटकलों पर फिलहाल विराम लगा दिया है जो दोनों संगठनों के बीच दूरी का दावा कर रही थीं। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों ने इस मौके को प्रधानमंत्री और आम जनता के बीच बढ़ती ‘दूरी’ के रूप में पेश करने की कोशिश की। विपक्ष के सोशल मीडिया हैंडल और बयानों में इस बात को प्रमुखता से उठाया गया कि देश की आम जनता इस समय महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता से जूझ रही है, इसलिए जनता के बीच वह उत्साह नहीं है जो भाजपा और सरकार के भीतर दिखाई दे रहा है।

हर साल की तरह इस बार भी विपक्षी युवाओं और कुछ संगठनों ने सोशल मीडिया पर ‘राष्ट्रीय बेरोजगारी दिवस’ जैसे हैशटैग चलाकर सरकार को घेरने का प्रयास किया। विपक्ष का तर्क है कि बधाई संदेशों की बाढ़ केवल सरकारी मशीनरी और भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा प्रायोजित थी, न कि स्वतःस्फूर्त जनता की भावना। विपक्ष का यह भी आरोप है कि जनता को जोड़ने के लिए सरकार को इस दिन कई सरकारी योजनाओं (जैसे स्वास्थ्य शिविर और रक्तदान अभियान) का सहारा लेना पड़ा, जिससे यह साबित होता है कि यह एक प्रशासनिक आयोजन अधिक था और जन-उत्सव कम। इस पूरे नैरेटिव के बीच यह देखना भी जरूरी है कि क्या वाकई आम जनता का जुड़ाव इस आयोजन से कम था? देश के विभिन्न हिस्सों से आई तस्वीरें एक मिश्रित कहानी बयां करती हैं। देश भर के सरकारी अस्पतालों, अनाथालयों और स्कूलों में भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा फल वितरण और स्वच्छता अभियान चलाए गए। समर्थकों का कहना है कि इन अभियानों में आम लोगों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। यह स्पष्ट है कि देश की जनता अब प्रधानमंत्री के प्रति दो स्पष्ट धड़ों में बंटी नजर आती है। एक धड़ा उन्हें देश को वैश्विक मंच पर नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाले महानायक के रूप में देखता है, जबकि दूसरा धड़ा आर्थिक मोर्चे पर विफलताओं के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराता है। इसलिए, ‘पब्लिक का आशीर्वाद’ इस बात पर निर्भर करता है कि आप समाज के किस वर्ग से बात कर रहे हैं।
कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री मोदी का यह जन्मदिन उनके व्यक्तिगत उत्सव से कहीं अधिक भाजपा, आरएसएस और सरकार के त्रिकोणीय संबंधों को मजबूत करने का जरिया बना। विपक्ष भले ही इसे ‘जनता की बेरुखी और संगठन का सहारा’ कहकर प्रचारित करे, लेकिन व्यावहारिक राजनीति में यह ‘आशीर्वाद’ प्रधानमंत्री के लिए बेहद जरूरी है। आगामी चुनावों और सांगठनिक बदलावों से ठीक पहले संघ और अपनी ही सरकार से मिला यह मजबूत समर्थन प्रधानमंत्री मोदी को नीतिगत फैसले लेने और विपक्ष के हमलों का सामना करने के लिए राजनीतिक संजीवनी प्रदान करता है। जनता का आशीर्वाद वोटों के रूप में ईवीएम में दिखेगा या नहीं, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल संगठन के भीतर मोदी जी का स्थान पहले की तरह ही अभेद्य नजर आता है।




