यज्ञ की आहुतियों का धुआं अभी हवा में घुला ही हुआ है और लड्डू की मिठास से भाजपा के आईटी सेल के कीबोर्ड अब भी चिपचिपे हैं। सरकारी तंत्र और मुख्यधारा के चैनलों ने मिलकर 17 सितंबर को देश के नागरिकों को यह विश्वास दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि यदि कल सुबह आपकी सांसें चल रही थीं, तो इसका पूरा श्रेय केवल और केवल प्रधानमंत्री जी के ‘अवतार दिवस’ को जाता है। साहब का 76वां जन्मदिन बीत गया।

कहते हैं कि भारत में नेताओं का जन्मदिन सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय उत्सव होता है। 17 सितंबर को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना 76वां जन्मदिन मनाया। भाजपा और सरकारी तंत्र ने इसे ‘सेवा पखवाड़ा’ घोषित कर दिया, लड्डू बंटे, हवन हुए और बधाई संदेशों की ऐसी बाढ़ आई कि सोशल मीडिया के सर्वर भी थामे न थमें। लेकिन इस भव्य उत्सव के बीच, देश के असली मालिक यानी ‘आम जनता’ ने इस पर क्या कहा? जब हमारे संवाददाताओं ने देश के अलग-अलग कोनों में जाकर जनता से पूछा, “क्या आपने दिया मोदी जी को आशीर्वाद?” तो जो जवाब मिले, वे आशीर्वाद से ज्यादा जनता की बेबाक दास्तान और करारे कटाक्ष (Sarcasm) थे। महंगाई, बेरोजगारी और ईवीएम (EVM) के इस दौर में जनता के इस ‘विशेष आशीर्वाद’ पर पेश है एक विशेष रिपोर्ट। दिल्ली के कनाड प्लेस में झोला टांगे घूम रहे रमेश कुमार (उम्र 42 वर्ष, प्राइवेट नौकरी) से जब पूछा गया कि उन्होंने प्रधानमंत्री को क्या दुआ दी, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जेब से अपना बटुआ निकाला। “साहब, आशीर्वाद तो हम रोज सुबह उठकर रसोई गैस का सिलेंडर देखकर मोदी जी को ही देते हैं। पहले जो रसोई गैस ₹400 में मिलती थी, अब उसके दर्शन के लिए जेब में हजार-बारह सौ रुपये का वीआईपी पास रखना पड़ता है। टमाटर और सरसों का तेल तो अब तिजोरी में रखने की चीज हो गई है। हमारी तरफ से मोदी जी को यही आशीर्वाद है कि भगवान उन्हें इतनी लंबी उम्र दे कि वे देख सकें कि एक आम आदमी बिना सब्जी के सिर्फ ‘डिजिटल इंडिया’ की रील्स देखकर पेट कैसे भरता है!” रीगल सिनेमा के पास खड़ी गृहिणी सुशीला देवी ने भी इसमें सुर मिलाते हुए कहा “मोदी जी ने देश को आत्मनिर्भर बना दिया है।

पहले हम बजट बनाते थे, अब हमने बजट बनाना ही छोड़ दिया है। सूखी रोटी खाओ और प्रभु के गुण गाओ। हमारा आशीर्वाद तो सीधे पेट्रोल पंप से रोज सुबह कट जाता है!” प्रयागराज और पटना जैसे शिक्षा के गढ़ों में, जहां युवा सालों-साल सरकारी नौकरियों की तैयारी करते हैं, वहां का माहौल कुछ अलग ही था। सिविल लाइंस में चाय की दुकान पर बैठे एक बेरोजगार युवा, अमित यादव (एम.ए., बी.एड.) ने हाथ में चाय का कुल्हड़ पकड़कर तीखा तंज कसा। “अरे साहब! हम तो मोदी जी के इतने आभारी हैं कि बता नहीं सकते। उन्होंने हमें नौकरी के झंझट से पूरी तरह मुक्त कर दिया है। अगर नौकरी मिल जाती, तो हम सुबह 9 से 5 बजे तक किसी दफ्तर में गुलामी कर रहे होते। यह मोदी जी का ही आशीर्वाद है कि आज हम 28 साल की उम्र में भी पूरी तरह ‘स्वतंत्र’ हैं, सुबह से शाम तक यूट्यूब पर रील्स देखते हैं और शाम को चाय पर देश की जीडीपी (GDP) तय करते हैं। रील्स बनाने और ट्विटर पर ट्रेंड चलाने का जो रोजगार उन्होंने हमें दिया है, उसके लिए कोटि-कोटि धन्यवाद।” पास ही खड़े एक और छात्र ने कहा, “सरकार कहती है पकोड़ा तलना भी रोजगार है। हम तो सोच रहे हैं कि डिग्री जलाकर उसी की आंच पर पकोड़े की दुकान खोल लें। कम से कम स्टार्टअप इंडिया में हमारा नाम तो आएगा!”

भारतीय राजनीति में चुनाव और ईवीएम का रिश्ता चोली-दामन का हो चुका है। जब जनता से पूछा गया कि क्या वे चुनावों के जरिए प्रधानमंत्री को अपना समर्थन या आशीर्वाद देते हैं, तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक बुजुर्ग किसान, चौधरी चरण सिंह (उम्र 68 वर्ष) ने हुक्के का कश खींचते हुए बड़ा दार्शनिक जवाब दिया। “अरे भाई, हमारे आशीर्वाद की जरूरत ही किसे है? हमारा आशीर्वाद तो अब एक ‘चमत्कारी मशीन’ में बंद हो चुका है। हम गांव वाले चाहे गुस्से में हाथी पर बटन दबाएं, साइकिल पर दबाएं या पंजे पर—मशीन इतनी संस्कारी है कि वह सारा आशीर्वाद समेटकर सीधे कमल के फूल में ही ट्रांसफर कर देती है! जब लोकतंत्र में ऐसी ‘अदृश्य शक्ति’ बैठी हो, तो जनता के मुंह से निकले आशीर्वाद की क्या औकात? मशीन खुद ही प्रधानमंत्री जी को विजयी भव: का वरदान दे देती है।”ईवीएम को लेकर जनता के बीच यह कटाक्ष अब एक आम चुटकुला बन चुका है, जहां लोग मानते हैं कि उनका वोट सिर्फ एक औपचारिकता है, असली ‘आशीर्वाद’ तो तकनीक के पास है।
इस पूरे घटनाक्रम को देखें तो भारत इस समय दो समानांतर दुनियाओं में जी रहा है। जहां भाजपा के करोड़ों कार्यकर्ता, आईटी सेल और मुख्यधारा का मीडिया यह साबित करने में जुटा है कि देश का हर नागरिक प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर भावुक है और उनकी आरती उतार रहा है। जहां आम आदमी अपने बच्चों की स्कूल फीस, अस्पताल के खर्च और बिजली के बढ़ते बिलों को देखकर माथा पीट रहा है। जब सरकार ‘अमृत काल’ का जश्न मना रही होती है, तब राशन की कतार में खड़ा नागरिक सोचता है कि इस अमृत में से उसके हिस्से की बूंदें कहां गईं। जनता का यह कटाक्ष असल में उनका गुस्सा नहीं, बल्कि उनकी बेबसी की हताश अभिव्यक्ति है। इलाहाबाद और पटना के लॉजों में single-burner वाले स्टोव पर खिचड़ी पकाते-पकाते बूढ़े हो रहे युवाओं की टोली से जब जन्मदिन की बधाई मांगी गई, तो एक 29 वर्षीय ‘युवा’ (जो अब सरकारी फॉर्म भरते-भरते ‘ओवरएज’ का तमगा पा चुका है) ने कुटिल मुस्कान के साथ कहा “नौकरी? छिः! कितनी छोटी और तुच्छ सोच है आपकी। नौकरी लेकर हम क्या करते? किसी दफ्तर में बैठकर बाबू बनते? साहब ने हमें उस गुलामी से बचाया है। आज हमारे पास पेपर लीक होने का रोमांच है, हर छह महीने पर परीक्षा रद्द होने का सस्पेंस है, और लाठीचार्ज के समय पुलिस की फुर्ती देखने का लाइव अनुभव है। हम तो साहब को लंबी उम्र की दुआ इसलिए देते हैं ताकि वो हमारे बच्चों को भी पकोड़े तलने की ऐसी सीक्रेट रेसिपी सिखा सकें जो किसी फाइव-स्टार शेफ को भी न पता हो। बेरोजगार होना ही इस देश का असली ‘स्वदेशी स्टेटस सिंबल’ है।” एक अन्य छात्र ने तो यहाँ तक कह दिया कि वह सरकार का इतना आभारी है कि अपनी रील्स के बैकग्राउंड म्यूजिक में अब ‘अमृत काल’ का थीम सॉन्ग लगाता है, ताकि व्यूज न सही, कम से कम देशभक्ति का सर्टिफिकेट तो मिल जाए।
चुनावों में जनता के ‘आशीर्वाद’ यानी वोट की ताकत पर जब बात हुई, तो ग्रामीण भारत के ताऊ और चौधराइन ने लोकतंत्र की इस सबसे बड़ी मशीनरी को साक्षात ‘काली माता का चमत्कार’ घोषित कर दिया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक चतुर ग्रामीण ने हुक्के का कश खींचते हुए समझाया “देखो भाई, भारत का वोटर अब बहुत समझदार और आलसी हो गया है। वो सोचता है कि धूप में लाइन लगाकर क्यों दिमाग खराब करना कि बटन कहाँ दबाना है। इसलिए भगवान ने हमें ईवीएम (EVM) नाम का ‘डिजिटल देवदूत’ दिया है। आप अपनी उंगली से हाथी छुओ, साइकिल छुओ या हाथ—मशीन के अंदर बैठा हुआ ‘सॉफ्टवेयर का संस्कारी भूत’ जानता है कि असली मालिक कौन है। वह चुपके से उस वोट को कमल के चरणों में अर्पित कर देता है। जब हमारा वोट खुद-ब-खुद सही जगह जाने का रास्ता जानता हो, तो हम जनता कौन होते हैं साहब को आशीर्वाद देने वाले? मशीन खुद ही सुबह-शाम उन्हें ‘परम विजयी’ होने का वरदान टाइप करके दे देती है।”
इस व्यंग्य के पीछे का कड़वा सच यह है कि आज का भारत दो हिस्सों में साफ-साफ कट चुका है। जो विज्ञापनों में चमकता है, जहां जी-20 के होर्डिंग्स लगे हैं, और जहां साहब की एक मुस्कान पर सेंसेक्स ऊपर-नीचे होता है। जो सुबह चार बजे मजदूरी के चौक पर खड़ा होता है, जो सरकारी राशन की सड़ी हुई गेहूं की बोरी को ढोता है, और जो यह सोचकर डर जाता है कि अगर बीमार पड़ गए तो सरकारी अस्पताल के स्ट्रेचर पर ही दम तोड़ना पड़ेगा। जब मुख्यधारा का मीडिया कैमरे लेकर निकलता है, तो वह पहले भारत की चकाचौंध दिखाता है। लेकिन जब कैमरे बंद होते हैं, तो दूसरे भारत की हताशा इस तीखे व्यंग्य के रूप में बाहर आती है। यह जनता का आशीर्वाद नहीं, बल्कि उनका वो मूक विरोध है जो वो सीधे तौर पर दर्ज नहीं करा सकते, क्योंकि ऐसा करने पर तुरंत ‘देशद्रोही’ या ‘विदेशी साजिश का हिस्सा’ होने का तमगा जो मिल जाता है।
कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री मोदी के 76वें जन्मदिन पर जनता ने जो ‘आशीर्वाद’ दिया, वह किसी गुलदस्ते या बधाई पत्र में सिमटने वाला नहीं है। वह देश की सड़कों पर दौड़ते खाली पेटों, बंद पड़ी फैक्ट्रियों और परीक्षा लीक होने के बाद घर लौटते मायूस युवाओं की आंखों में साफ देखा जा सकता है। व्यावहारिक सच यही है कि सत्ता के गलियारों को अब जनता के व्यक्तिगत आशीर्वाद की उतनी परवाह नहीं है, जितनी कि हेडलाइंस और संगठनात्मक शक्ति की है। जनता भी यह बात समझ चुकी है, इसलिए उसने अब रोना छोड़कर हंसना सीख लिया है। महंगाई की मार हो या बेरोजगारी का दंश, भारतीय जनता अब हर दर्द पर कटाक्ष का मरहम लगाकर कह रही है—”मोदी जी, आप दीर्घायु हों, क्योंकि आपके बिना हमारे जीवन में मनोरंजन और यह ‘अद्भुत विकास’ भला कौन लाएगा?”अंततः, जनता समझ चुकी है कि इस देश में ‘जनता जनार्दन’ सिर्फ पांच साल में एक दिन के लिए होती है, बाकी के 1824 दिन वह सिर्फ टैक्स देने और तालियां बजाने वाली एक मशीन है। इसलिए, उन्होंने साहब के 76वें जन्मदिन पर बिना किसी शिकायत के अपना ‘अखंड आशीर्वाद’ दे दिया है। जनता ने हंसते हुए कहा है “साहब, आप ऐसे ही चमकते रहिए, विदेश घूमते रहिए, और नए-नए सूट पहनकर हमें गौरवान्वित करते रहिए। हम यहाँ नीचे महंगाई की मार सह लेंगे, भूखे पेट सो लेंगे, और आपकी लंबी उम्र की दुआ मांगते रहेंगे। आखिर इस अंधकार भरे अमृत काल में आपके बिना हमारा मनोरंजन भला और कौन करेगा?”




