डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़,हरदा, मध्य प्रदेश
“पैदा होते हैं लोग मर क्यों जाते हैं, ज़िंदगी ये फ़लसफ़ा क्या है…”
यह शेर सिर्फ चंद अल्फाज़ नहीं, बल्कि इंसानी वज़ूद का सबसे गहरा और पुराना सवाल है।

जब भी कोई इंसान होश संभालता है और दुनिया की इस भागदौड़ को देखता है, तो उसके दिल में यह सवाल ज़रूर उठता है कि आख़िर इस खेल का मक़सद क्या है? हम आते क्यों हैं, जीते क्यों हैं और आख़िरकार मिट क्यों जाते हैं? आइए, ज़िंदगी के इस खूबसूरत और हैरान कर देने वाले फ़लसफ़े को अलग-अलग दृष्टिकोण से समझने की कोशिश करते हैं। जैविकीय सच्चाई (बायोलॉजिकल रियलिटी) कुदरत का चक्र,, विज्ञान और प्रकृति के नियमों के मुताबिक, हर जीव की एक शुरुआत है और एक अंत है। ऊर्जा और संतुलन, ब्रह्मांड का नियम है कि जो चीज़ शुरू होती है, उसका अंत तय है। अगर मौत न हो, तो इस धरती पर जगह कम पड़ जाएगी। पुरानी पीढ़ियों का जाना नई पीढ़ियों के लिए जगह बनाना और बदलाव का रास्ता खोलना है।

बदलाव ही नियम है: कोशिकाएं बनती और मिटती हैं। शरीर का यह चक्र क़ुदरती तौर पर तयशुदा उम्र के साथ थम जाता है ताकि जीवन का यह प्रवाह बना रहे। दार्शनिक दृष्टिकोण सीमित समय की खूबसूरती,, महान दार्शनिकों का मानना है कि ज़िंदगी की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी नश्वरता यानी इसके ख़त्म होने में छिपी है। समय की कीमत,,अगर कोई चीज़ हमेशा के लिए हो, तो उसकी कोई क़ीमत नहीं रहती। गुलाब का फ़ूल कुछ दिनों के लिए खिलता है, इसलिए उसकी महक और ख़ूबसूरती ख़ास होती है। इसी तरह, ज़िंदगी छोटी और सीमित है, इसलिए हर पल क़ीमती है। अर्थ की तलाश,,मौत यह याद दिलाती है कि हमारे पास वक्त कम है। यह डर या निराशा पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि हमें यह सोचने पर मजबूर करने के लिए है कि हम अपना बचा हुआ वक्त कैसे और किन कामों में बिताएं। आध्यात्मिक और सांस्कृतिक नज़रिया सफ़र और सबक़,, अलग-अलग संस्कृतियों और धर्मों में इस सवाल का जवाब अलग तरह से दिया गया है।

एक पड़ाव,,बहुत से विचारकों का मानना है कि ज़िंदगी कोई मंज़िल नहीं, बल्कि एक सफ़र या पाठशाला है। इंसान यहां कुछ सीखने, अनुभव हासिल करने और अपने वज़ूद को बेहतर बनाने आता है। निशान छोड़ जाना,, यह मायने नहीं रखता कि आप कितने साल जिए, बल्कि यह मायने रखता है कि आपने अपने पीछे दुनिया को क्या दिया।कितनों के चेहरों पर मुस्कान लाई और कितनी ज़िंदगियों को छुआ। असल फ़लसफ़ा क्या है? पैदा होने और मरने के इस सफ़र के बीच का जो वक्त है, वही असली ‘ज़िंदगी’ है। मौत इस बात की गवाही देती है कि जीवन का हर पल अनमोल है। फ़लसफ़ा यह नहीं है कि हम क्यों मरते हैं, बल्कि असली फ़लसफ़ा यह है कि मरने से पहले हम किस तरह जीते हैं। इस बेनाम और ख़ूबसूरत सफ़र को प्यार, अच्छे कर्मों और सीख के साथ जीना ही इस सवाल का सबसे बेहतरीन जवाब है।




