अफ़साना: कमरे की दीवार पर टंगी दो तस्वीरें,एक माँ की और दूसरी अब्बा की।

डॉ.मुश्ताक़ अहमद शाह, सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश

कमरे की दीवार पर टंगी दो तस्वीरें,एक माँ की और दूसरी अब्बा की। जिन पर धूल जम चुकी थी, मगर उन चेहरों की ख़ामोशी आज भी बशीर के दिल पर हथौड़े की तरह बरस रही थी। बशीर घंटों उसी दीवार के सामने ज़मीन पर बैठा रहता। उसकी आँखों से बहते आँसू सूख चुके थे, बस हिचकियाँ थीं जो उसके सीने को अंदर से फाड़ रही थीं। वो खुद से बार-बार पूछता,क्या वाकई वे पागल थे? नहीं! पागल तो वो ख़ुद था, जो इस फ़ानी दुनिया की चमक-दमक और दोस्तों की झूठी वाहवाही में इतना अंधा हो गया था कि उसे अपने सबसे बड़े शुभचिंतक दुश्मन नजर आने लगे थे। अब्बा जब उसे सुबह-सवेरे उठाकर पढ़ने के लिए कहते, किताबों से दोस्ती करने की ताकीद करते, तो बशीर को लगता था कि वे उसकी आज़ादी छीन रहे हैं। माँ जब रोटियाँ बनाते वक्त उसे नसीहतें देतीं, तो वो गुस्से से घर छोड़कर निकल जाता था। उन दिनों उसे दुनिया के हर शख़्स की बात मीठी लगती थी, सिवाय अपने माँ-बाप के। उसे लगता था कि वे उसे टोक-टोक कर उसका जीना मुहाल कर रहे हैं। वो उन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझ बैठा था।
मगर वक्त ने जब पलटा खाया, तो ज़िंदगी का असली चेहरा सामने आया। उसके वे तमाम दोस्त, जिनकी एक आवाज़ पर वह अपनी जान छिड़कता था, आज वक्त के साथ बहुत आगे निकल चुके थे। कोई डॉक्टर था, कोई अफ़सर, तो कोई बड़े कारोबार का मालिक। उनकी दुनिया आबाद थी। और बशीर? पढ़ाई से मुँह मोड़ने और नादानी में जवानी गंवाने का यह सिला मिला कि आज उसके पास न कोई हुनर था, न रोज़गार। हालत यह थी कि कई-कई दिन फांकें में गुज़रते थे,पेट की आग बुझाने को दाने-दाने को मोहताज था वह।


इस टूटे हुए सफ़र में उसने चारों तरफ़ नज़र घुमाकर देखा। भाई-बहन अपनी-अपनी गृहस्थी, बीवी-बच्चों और खुशियों में इस कदर मगन थे कि किसी को फ़ुर्सत न थी कि वे पूछते कि बशीर किस हाल में जी रहा है या भूखा है। दोस्त तो पहले ही रास्ते बदल चुके थे। दुनिया का हर रिश्ता मतलब का निकला। तभी बशीर को वो कड़वी और शाश्वत सच्चाई समझ आई, जिसे समझने में उसने पूरी जिंदगी लुटा दी, इस दुनिया में माँ-बाप से बढ़कर किसी का दिल आपके लिए नहीं धड़कता। उसे याद आया कि जब वह बीमार पड़ता था, तो माँ रात-रात भर जागकर उसके सिर पर हाथ फेरती थी। जब वह ग़लत रास्ते पर चलता था, तो अब्बा की आँखें डर से नम हो जाती थीं कि उनका बेटा कहीं बर्बाद न हो जाए। वे जो डाँटते थे, वह उनकी फिक्र थी; वे जो मारते थे, वह उनकी औलाद के भविष्य को सँवारने की छटपटाहट थी। वे दुनिया की हर ठोकर से बचाने के लिए ढाल बनकर खड़े थे, और नासमझ बशीर उन्हें ही अपनी राह का काँटा समझ रहा था। जीवन के आख़िरी दिनों में जब वे दोनों एक-एक करके इस दुनिया से रुख़सत हुए, तो उनकी आँखें इसी नालायक बेटे की फ़िक्र में खुली रह गई थीं। जाते वक्त भी वे कुछ नहीं बोले थे, क्योंकि वे जानते थे कि अब इस बिगड़े हुए मुक़द्दर को कोई नहीं सुधार सकता। बशीर ने काँपते हुए हाथों से हवा में दोनों तस्वीरें थाम लीं और फूट-फूटकर रो पड़ा— “अब्बा… माँ… मुझे माफ़ कर दो! मैं समझ नहीं पाया कि आपके सिवा इस मतलबी दुनिया में मेरा अपना कोई नहीं था। वाकई, माँ-बाप से बढ़कर इस कायनात में कोई हमदर्द नहीं होता… काश! मैं यह बात वक्त रहते समझ जाता…” कमरे की उदास ख़ामोशी में बशीर की ये सिसकियाँ गूँजती रहीं, और पीछे छूट गई सिर्फ़ पछतावे की अनंत रात और यादों का कभी न मिटने वाला दर्द।

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