लोकतंत्र की देहरी पर संकट,युवाओं को भावनात्मक और पहचान की राजनीति का ईंधन बनाया जा रहा है

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़,हरदा

भारत इस समय एक अभूतपूर्व वैचारिक और राजनीतिक संक्रमण काल से गुजर रहा है। देश की सत्ता और विपक्ष की खींचतान के बीच यदि कोई सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है, तो वह है आम नागरिक और देश का वह युवा, जिसके कंधों पर कल के भारत का भार है। सवाल अब केवल यह नहीं रह गया है कि सत्ता में कौन काबिज़ है या विपक्ष की भूमिका कितनी प्रभावी है, मूल प्रश्न यह है कि क्या राष्ट्र अपनी उस बुनियादी दिशा से भटक चुका है, जो इसे एक जीवंत, सशक्त और समावेशी लोकतंत्र बनाती है?
प्राथमिकताओं का भटकाव और गिरता राजनीतिक स्तर किसी भी परिपक्व लोकतंत्र की रीढ़ उसके बुनियादी मुद्दे होते हैं,शिक्षा का स्तर, स्वास्थ्य सेवाएँ, रोजगार के अवसर, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आर्थिक स्थिरता। परंतु, मौजूदा राजनीतिक विमर्श को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि इन जीवन-मरण से जुड़े प्रश्नों को जानबूझकर हाशिए पर धकेल दिया गया है। सार्वजनिक विमर्श का स्तर जिस तेज़ी से नीचे गिरा है, वह गंभीर चिंता का विषय है। ज़िम्मेदार पदों पर बैठे व्यक्तियों और सार्वजनिक मंचों से बहती बेलगाम, असभ्य और अमर्यादित भाषा केवल शब्दों की मर्यादा नहीं तोड़ती, बल्कि वह पूरे समाज के नैतिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करती है। जब तर्कों की जगह उत्तेजना और गाली-गलौज ले ले, तो यह संकेत है कि राजनीति विवेकहीनता के अंधे मोड़ पर पहुँच चुकी है।
युवाओं की निराशा और व्यवस्था से सवाल, देश की कुल आबादी में युवाओं की संख्या का ढिंढोरा तो पीटा जाता है, परंतु नीतिगत स्तर पर उन्हें क्या मिल रहा है? आज का युवा डिग्री हाथ में लिए अवसरों की तलाश में भटक रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली, नियुक्तियों में देरी और नौकरियों की कमी ने नई पीढ़ी के भीतर एक गहरी निराशा भर दी है। विडंबना यह है कि युवाओं की इस असीम ऊर्जा, उनकी तार्किक सोच और नया रचने की क्षमता का उपयोग देश निर्माण में करने के बजाय, उन्हें भावनात्मक और पहचान की राजनीति का ईंधन बनाया जा रहा है। युवा मन स्वभाव से प्रश्न पूछने वाला होता है, लेकिन जब सवालों के बदले दबाने की नीतियाँ और नफ़रत का माहौल परोसा जाए, तो यह देश के उज्ज्वल भविष्य पर सीधा प्रहार है। आज के युवा को भावनात्मक भटकाव नहीं, बल्कि एक स्थिर, पारदर्शी और अवसरों से भरा वातावरण चाहिए।


संवैधानिक संस्थाएँ, भ्रष्टाचार और मौन की संस्कृति, संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, यह देश के लोकतांत्रिक मूल्यों की गारंटी है। आज आमजन के मन में यह आशंका गहरा रही है कि क्या संवैधानिक शक्तियों का संतुलन बिगड़ रहा है? क्या स्वतंत्र संस्थाओं की स्वायत्तता पर अंकुश लगाया जा रहा है? इसके साथ ही, भ्रष्टाचार का स्वरूप अब और अधिक सूक्ष्म और संगठित हो गया है। आर्थिक हितों के आवरण में जब निर्णय लिए जाते हैं, तो पारदर्शिता दम तोड़ने लगती है। सबसे दुखद स्थिति यह है कि असहमति जताने वाली या सच बोलने वाली आवाज़ों पर अदृश्य पहरे लगा दिए गए हैं। सच बोलना मानो एक राजनीतिक जोखिम बन गया है। ऐसी स्थिति न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटती है, बल्कि समाज में एक असहज सन्नाटा और भय पैदा करती है। देश किसी राजनीतिक दल, नेता या क्षणिक विचारों से हमेशा बड़ा होता है। राजनीति का अंतिम उद्देश्य समाज का कल्याण और देश की अस्मिता की रक्षा होना चाहिए, न कि उसे अशांति और ध्रुवीकरण की आग में झोंकना। समय आ गया है कि सत्ता और विपक्ष,दोनों ही पक्ष आत्ममंथन करें। लोकतंत्र केवल बहुमत का गणित नहीं, बल्कि असहमति का सम्मान और कानून का शासन है। देश की अस्मिता को सही दिशा देने का दायित्व अब जागरूक नागरिकों और युवाओं पर है। जब तक देश का युवा अपने वास्तविक मुद्दों,शिक्षा, रोज़गार, न्याय और अधिकार,पर एकजुट होकर सवाल नहीं पूछेगा, तब तक व्यवस्था में सुधार की उम्मीद बेमानी होगी। इतिहास गवाह है कि जब-जब लोकतंत्र पर संकट छाया है, देश की चेतना ने ही उसे सही राह दिखाई है।

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