डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश

आज देश का राजनीतिक परिदृश्य एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ हर रोज़ नए समीकरण बन-बिगड़ रहे हैं। लोकतंत्र के मंदिर से लेकर सड़कों तक, हर जगह एक अजीब सी उथल-पुथल मची हुई है। संसद के गलियारों से लेकर आंदोलनों के गढ़ जंतर-मंतर तक, देश का राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर है। इस बीच, सबसे बड़ा और ज्वलनशील सवाल यह है कि इस कशमकश में देश का लोकतंत्र, इसका राजनीतिक भविष्य और सबसे अहम,हमारा नवयुवक किस दिशा में जा रहा है? क्या राजनेताओं को वाकई देश के युवाओं के भविष्य की चिंता है, या यह सब सिर्फ कुर्सी बचाने और हथियाने का एक सियासी खेल बनकर रह गया है?
जंतर-मंतर का परिदृश्य, उम्मीद और निराशा का संगम, देश की राजधानी का जंतर-मंतर हमेशा से भारत की राजनीतिक नब्ज़ को टटोलने का केंद्र रहा है। आज जंतर-मंतर की तरफ़ देखें, तो वहाँ का परिदृश्य बेहद विरोधाभासी और आँखें खोल देने वाला है ,
आक्रोश और उम्मीद,,,एक तरफ़ जहाँ युवाओं का हुजूम रोजगार, पेपर लीक, शिक्षा के गिरते स्तर और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरा हुआ है, वहीं दूसरी तरफ़ उनकी आवाज़ को दबाने या राजनीतिक रोटियां सेकने के प्रयास भी साफ दिखते हैं। बदलती राजनीतिक चेतना,आज का युवा सिर्फ़ नारे लगाने वाला मुखौटा नहीं है,वह सवाल पूछ रहा है। चाहे वह सोशल मीडिया का वर्चुअल वॉर रूम हो या जंतर-मंतर की तपती धूप, युवा अब अपनी ताक़त और अधिकारों को लेकर पहले से कहीं अधिक जागरूक है। निराशा का साया, हक़ीक़त यह भी है कि महीनों धरने पर बैठने के बाद भी जब युवाओं के हाथ निराशा लगती है, तो उनका देश की व्यवस्था और राजनेताओं दोनों से विश्वास उठने लगता है। यह मोहभंग हमारे लोकतंत्र के लिए एक ख़तरनाक संकेत है।

पक्ष, विपक्ष और युवा,, दिशाहीनता या सुनियोजित राजनीति? आज देश का राजनीतिक परिदृश्य दो ध्रुवों में बंटा हुआ है,सत्ता पक्ष और विपक्ष। लेकिन इन दोनों की लड़ाई में असली मुद्दा कहीं खो गया है, सत्ता पक्ष का दृष्टिकोण,,सरकारें अक्सर राष्ट्रवाद, विकास के बड़े आंकड़ों और डिजिट्ल इंडिया के विज़न के साथ युवाओं को आकर्षित करती हैं। स्टार्टअप्स और ग्लोबल मंचों पर भारत के युवाओं की सफ़लता को सराहा जाता है, जो कि सच भी है। लेकिन क्या यह चमक-धमक देश के उन करोड़ों युवाओं तक पहुँच पा रही है जो हर साल डिग्रियां लेकर सरकारी नौकरियों की कतार में खड़े-खड़े ओवरएज हो रहे हैं? विपक्ष के पास आज सरकार की नाकामियों (जैसे बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक विभाजन) को उठाने का बड़ा मौक़ा है। लेकिन अक्सर विपक्ष की राजनीति भी सिर्फ़ चुनावी लाभ, जातिगत समीकरणों और सत्ता प्राप्ति की महत्त्वाकांक्षा तक सीमित होकर रह जाती है। युवा सिर्फ़ उनके भाषणों का हिस्सा बनकर रह जाते हैं, ज़मीनी एजेंडे का नहीं। क्या राजनेताओं को वाकई फिक्र है? कड़वी सच्चाई यह है कि आज की राजनीति का मुख्य केंद्र-बिंदु ‘जनहित’ से खिसक कर ‘सिंहासन’ पर केंद्रित हो गया है। चुनाव आते ही युवाओं को ‘देश का भविष्य’ और ‘लोकतंत्र का पहरेदार’ बताकर मंचों पर बुलाया जाता है, घोषणापत्रों में रोजगार के बड़े-बड़े ख्वाब दिखाए जाते हैं। लेकिन चुनाव ख़त्म होते ही वे वादे फ़ाइलों में दफ़न हो जाते हैं।

यदि राजनेताओं को वाक़ई युवाओं की फ़िक्र होती, तो शिक्षा व्यवस्था इतनी लाचार न होती कि छात्रों को अपने हक़ के लिए सड़कों पर उतरना पड़े। प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होना एक नियमित राष्ट्रीय त्रासदी न बन गया होता। युवाओं की ऊर्जा का उपयोग नफ़रत की राजनीति में न होकर देश के नवनिर्माण में हो रहा होता। लोकतंत्र का असली वारिस कौन? आज देश का नवयुवक एक अजीब क़शमक़श में है। वह विकास भी चाहता है और अपनी अस्मिता की रक्षा भी। वह आधुनिकता की दौड़ में सबसे आगे रहना चाहता है, लेकिन सिस्टम की जकड़न उसे पीछे खींच लेती है। जंतर-मंतर की गूँज और देश की उथल-पुथल साफ़ काइशारा करती है कि लोकतंत्र केवल नेताओं की जागीर नहीं है, बल्कि यह आम जनता और विशेषकर युवाओं के विश्वास पर टिका है। अगर राजनेताओं ने अब भी कुर्सी की अपनी इस अंधी दौड़ को छोड़कर युवाओं के भविष्य, रोजगार और शिक्षा को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाया, तो यह असंतोष किसी भी राजनीतिक दल के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं होगा, वक्त आ गया है कि कुर्सी बचाने या पाने की इस सियासत को छोड़कर, देश की असली ताक़त यानी ‘युवा शक्ति’ की सुध ली जाए,क्योंकि देश का भविष्य राजधानियों के कमरों में नहीं, युवाओं के सपनों में बसता है।



