डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश

शांत निशा का रूप सुहाना, चाँदनी बिखरी गाँव की ओर।
कच्ची पगडंडी, बांस के झुरमुट, छप्पर पर है दीप की पोर।
शीतल पवन मधुर सुर छेड़े, मिट्टी में है प्यार पुराना।
रात थमी है सुकून के संग, मन का हर दुख भूल जाओ ना।
पर जब घिरे गगन में बादल, आंधी का जब रूप सजा,
लहरा उठे खेत के पौधे, हवा में झूम उठे हैं शजर।
भाग रहे बच्चे पग भरते, बारिश की छन-छन से डर के,
प्रकृति के इस खेल अनोखे, हर दिल में उमंगें बह लें।
एक तरफ़ है असीम शांति, दूजी ओर जीवन का उल्लास,
यह माटी की सोंधी खुशबू, गाँव की सादगी का आभास।



