देश बदल चुका है और मीडिया भी, लेकिन जनता को अपनी मूल चेतना नहीं खोनी चाहिए। सत्ता किसी की भी हो, सवाल हमेशा पूछे जाने चाहिए और कड़वे सवाल पूछने वाले कलाकार हमेशा से समाज की धरोहर रहे हैं।

भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया और देश की राजनीतिक चेतना में पिछले कुछ वर्षों में एक अभूतपूर्व बदलाव आया है। जहाँ कभी सत्ता से तीखे सवाल पूछना मुख्यधारा के पत्रकारों और कलाकारों का प्राथमिक धर्म माना जाता था, वहीं आज सवाल पूछने वालों को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। इस बदलते दौर में, जब देश का मुख्यधारा का मीडिया अक्सर सत्ता के सुर में सुर मिलाता नजर आता है, तब लोकगीतों के जरिए जनसरोकार की आवाज उठाने वाली नेहा सिंह राठौर जैसी कलाकार व्यवस्था के सामने एक मजबूत चुनौती बनकर खड़ी हैं। आज का समय सिर्फ एक लोकगायिका की कला की सराहना करने का नहीं है, बल्कि देश और मीडिया के बदले हुए इस मिजाज के बीच नेहा सिंह राठौर के साथ मजबूती से खड़े रहने का है।पिछले कुछ सालों में भारत के सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में एक बड़ा बदलाव आया है। असहमति की आवाजों को दबाने और आलोचना को व्यक्तिगत दुश्मनी या राष्ट्रविरोधी करार देने की प्रवृत्ति बढ़ी है। ऐसे में नेहा सिंह राठौर ने अपने ठेठ भोजपुरी अंदाज और तीखे लोकगीतों जैसे “यूपी में का बा?”, “एमपी में का बा?” और “बिहार में का बा?” के जरिए बेरोजगारी, महंगाई, प्रशासनिक लापरवाही और आम जनता की लाचारी को मुख्यधारा की चर्चा में लाकर खड़ा कर दिया। जब उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात में अतिक्रमण हटाने के दौरान मां-बेटी की जलकर मौत हुई, तो नेहा ने ‘यूपी में का बा? सीजन-2’ गाया। इस गीत के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा बकायदा नोटिस थमाया गया। एक लोकगायिका को उसके गीतों के लिए पुलिस का नोटिस मिलना इस बात का सीधा प्रमाण है कि देश का राजनीतिक तंत्र अब तीखे सवालों और लोक-चेतना से कितना असहज होने लगा है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक भूमिका देश के बदले हुए मीडिया की रही है। मीडिया, जिसका काम जनता की समस्याओं को उठाना और सरकार की जवाबदेही तय करना था, आज खुद सत्ता की ढाल बन चुका है। जब नेहा सिंह राठौर जैसी स्वतंत्र आवाज पर सरकारी दबाव बनाया जाता है या उन्हें ट्रोलिंग का शिकार होना पड़ता है, तब मुख्यधारा के मीडिया (गोदी मीडिया) का एक बड़ा हिस्सा उनके गीतों की अंतर्वस्तु (Content) पर बात करने के बजाय उनकी नीयत पर सवाल उठाने लगता है। मीडिया यह भूल जाता है कि लोक कलाकारों का काम हमेशा से सत्ता के खिलाफ जनभावनाओं को सुर देना रहा है। चाहे सत्ता किसी भी दल की हो। कबीर, नागार्जुन और अदम गोंडवी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कलाकारों को आज मीडिया के स्टूडियो में बैठकर ‘एजेंडा चलाने वाला’ घोषित कर दिया जाता है। नेहा सिंह राठौर के साथ खड़े होने का मतलब सिर्फ एक व्यक्ति विशेष का समर्थन करना नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस मूल आत्मा को बचाना है जो अभिव्यक्ति की आजादी और लोक कला की रीढ़ है। हमें उनके साथ खड़े होने की जरूरत इसलिए है क्योंकि यदि आज एक लोकगायिका को सरकार की कमियां गिनाने के लिए प्रताड़ित किया जाता है और समाज चुप रहता है, तो आने वाले समय में आम नागरिक की आवाज उठाने वाला कोई नहीं बचेगा।लोकगीत हमेशा से शोषितों और वंचितों की आवाज रहे हैं। नेहा के गीतों में युवाओं की बेरोजगारी और किसानों का दर्द झलकता है। उनके साथ खड़े होना उस जमीनी आवाज को जिंदा रखना है। जब मुख्यधारा का मीडिया अपने कर्तव्यों से विमुख हो चुका हो, तब नेहा जैसे स्वतंत्र यूट्यूबर्स और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ही जनता के असल मुद्दों को जीवित रख रहे हैं।

देश बदल चुका है और मीडिया भी, लेकिन जनता को अपनी मूल चेतना नहीं खोनी चाहिए। सत्ता किसी की भी हो, सवाल हमेशा पूछे जाने चाहिए और कड़वे सवाल पूछने वाले कलाकार हमेशा से समाज की धरोहर रहे हैं। नेहा सिंह राठौर को घेरने की हर कोशिश दरअसल देश की हर उस आवाज को डराने का प्रयास है जो सरकार से आंखें मिलाकर बात करना चाहती है। आज वक्त आ गया है कि देश की जनता, बुद्धिजीवी और निष्पक्ष सोच रखने वाले लोग इस चौतरफा हमले के खिलाफ नेहा सिंह राठौर के साथ खड़े हों और यह संदेश दें कि लोकतंत्र में जनता का राग ही सबसे बड़ा राग है।



