मुट्ठी भर साँसें और क्षुद्र अहंकार का पाखंड,जीवन के परम यथार्थ की पुकार

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश

“ज़िंदगी कितनी सी है, कितने जीते हैं हम…”
यह पंक्ति मात्र एक विलाप या साधारण जिज्ञासा नहीं है, बल्कि यह मानव चेतना की उस गहरी सुप्त अवस्था पर एक तीखा प्रहार है, जिसमें मनुष्य अपने अस्तित्व के मूल सत्य से पूरी तरह कट चुका है। असीम काल-प्रवाह के अनंत आकाश में मानव जीवन की अवधि एक जुगनू की चमक से अधिक कुछ नहीं है। समय की इस विशाल नदी में हमारे जीवन के कुल दशक मात्र कुछ बूंदों जैसे हैं। किंतु विडंबना देखिए कि इस अत्यंत नश्वर, क्षणभंगुर और सीमित यात्रा को हमने दम्भ, ईर्ष्या, नफ़रत, और अनगिनत कृत्रिम दीवारों से इतना भारी बना लिया है कि साँसें लेने से पहले ही हमारी आत्मा दम तोड़ने लगती है। भारतीय दर्शन और वैश्विक मनीषियों ने बार-बार इस बात को रेखांकित किया है कि यह संसार एक ‘सराय’ या ‘मुसाफ़िरखाना’ है। उपनिषदों से लेकर सूफी संतों की वाणी तक, हर जगह जीवन को एक स्वप्न या पानी के बुलबुले की तरह दर्शाया गया है। लेकिन आधुनिक मनुष्य ने इस दार्शनिक यथार्थ को बिसार दिया है। वह शाश्वत समझकर उन चीज़ों को संजोने में अपनी पूरी ऊर्जा खपा रहा है, जो इसी धरातल पर नष्ट होने के लिए बनी हैं।

जात-पात, ऊंच-नीच, अमीर-गरीब और कुल-गोत्र के जो भेद हमने रचे हैं, वे केवल हमारे मानसिक अज्ञान और आंतरिक असुरक्षा के प्रतीक हैं। जिस मिट्टी से राजा का शरीर बना है, उसी मिट्टी से रंक की काया भी गढ़ी गई है, फ़िर भी मनुष्य इस नश्वर चोले को लेकर इतना भ्रमित और अहंकारी क्यों है? आध्यात्मिकता हमें यह सिखाती है कि यह शरीर केवल एक वस्त्र है, जिसे आत्मा कुछ समय के लिए धारण करती है। जब हम स्वयं को इस नश्वर देह, पद या प्रतिष्ठा से जोड़ लेते हैं, तब मोह-माया का वह घना चक्रव्यूह तैयार होता है जिससे निकलना कठिन हो जाता है। हम संपूर्ण जीवन संग्रह करने, जोड़ने और एक-दूसरे से श्रेष्ठ साबित करने में बिता देते हैं। अंततः, जब मृत्यु की अंतिम बेला आती है, तब क्या बचता है? क्या हमारे साथ हमारी जाति या उपाधियाँ जाती हैं?
क्या बैंक-खातों के आंकड़े या महलों की दीवारें उस पार साथ जाती हैं? आध्यात्मिक दृष्टि से, इस प्रश्न का उत्तर केवल शून्य है। मरने के बाद मनुष्य अपने साथ केवल अपने कर्म, अपनी चेतना की शुद्धि और दूसरों के हृदय में छोड़ी गई करुणा की महक लेकर जाता है। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह सब यहीं राख या धूआं हो जाता है।


आज का समाज एक अजीब से प्रहसन से गुज़र रहा है। हर कोई जानता है कि एक दिन सबको इस संसार को अलविदा कहना है, फ़िर भी अहंकार और स्वार्थ का ऐसा साम्राज्य खड़ा कर दिया गया है जैसे यहाँ सदियों तक टिके रहना है। हम इतिहास के उन पन्नों को बार-बार अनदेखा कर देते हैं, जो बड़े-बड़े विजेताओं और सम्राटों के ख़ाली हाथ लौटने की गवाही देते हैं। सच्चाई से मुँह मोड़ने की यह प्रवृत्ति समाज में एक नैतिक पतन का कारण बन रही है। जब तक मनुष्य इस भ्रम में जिएगा कि वह सर्वशक्तिमान या सर्वोच्च है, तब तक समाज में हिंसा, भेदभाव और शोषण का यह चक्र थमेगा नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने इस सीमित जीवन को बाह्य दिखावे और भेदभाव की भेंट न चढ़ाएं। जीवन का वास्तविक सौंदर्य संग्रह में नहीं, बल्कि समर्पण, प्रेम और एक-दूसरे के प्रति करुणा में निहित है। यदि हम अपने इस छोटे से सफ़र को सार्थक बनाना चाहते हैं, तो हमें अपने भीतर के अहंकार को विसर्जित करना होगा। जिस दिन मनुष्य यह समझ जाएगा कि वह केवल एक यात्री है, उस दिन न कोई ऊँच होगा, न नीच, न कोई बैरी होगा, न पराया। और शायद यही वह ज्ञान है, जो जीते-जी जीवन को मुक्ति का आनंद दे सकता है और जाने के बाद एक अमिट प्रेरणा छोड़ सकता है।

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