डिजिटल दंगल: AI वीडियो के माध्यम से भी योगी और अखिलेश आमने-सामने, 2027 से पहले यूपी में छिड़ा हाईटेक ‘डीपफेक’ युद्ध

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव में अभी समय बाकी है, लेकिन राज्य का राजनीतिक माहौल पूरी तरह चुनावी रंग में रंग चुका है।

अमूमन चुनावी रैलियों, मंचों और बयानों में आमने-सामने दिखने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव अब एक नए और बेहद आधुनिक मोर्चे पर टकरा रहे हैं, वह मोर्चा है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सिंथेटिक वीडियो का। दोनों ही खेमे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर एआई-जेनरेटेड वीडियो, पैरोडी गानों और डिजिटल मीम्स के जरिए एक-दूसरे पर तीखे हमले कर रहे हैं, जिसने यूपी की राजनीति को देश की सबसे हाईटेक चुनावी जंग में तब्दील कर दिया है। इस हाईटेक युद्ध की शुरुआत तब खुलकर सामने आई जब अगस्त और सितंबर 2026 में समाजवादी पार्टी के दफ्तर में खुद अखिलेश यादव की मौजूदगी में एक एआई वीडियो मीडिया के सामने प्ले किया गया। इस वीडियो में तकनीकी रूप से तैयार किए गए किरदारों के माध्यम से राजनीतिक संवाद दिखाया गया था। सपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ दल (भाजपा) के समर्थक विपक्ष को बदनाम करने के लिए एआई टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, और इसके जवाब में सपा ने भी पलटवार किया। सपा द्वारा दिखाए गए एक एआई वीडियो में अखिलेश यादव के डिजिटल अवतार को एक ‘क्रांतिकारी’ और ‘एंग्री यंग मैन’ के रूप में पेश किया गया था, जो महंगाई, कानून-व्यवस्था, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हमशक्ल डिजिटल किरदार से कड़े सवाल पूछ रहा था। वीडियो के अंत में दावा किया गया कि 2027 में उत्तर प्रदेश में सपा के मुख्य चुनावी एजेंडे ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की सरकार बनेगी।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे ये एआई कंटेंट पारंपरिक राजनीतिक विज्ञापनों जैसे नहीं हैं। इन्हें बेहद मनोरंजक, व्यंग्यात्मक गानों और शॉर्ट रील्स के रूप में पेश किया जा रहा है ताकि युवा वोटर्स तक इन्हें तेजी से फैलाया जा सके। सपा समर्थित कुछ एआई वीडियो में कथित तौर पर मुख्यमंत्री के डिजिटल स्वरूप और भगवा वस्त्र पहने किरदारों को लेकर तीखे व्यंग्य किए गए। कुछ गानों में राम मंदिर चंदे से जुड़े विवादों को एआई तस्वीरों के जरिए जोड़कर राजनीतिक निशाना साधा गया। इसके जवाब में भाजपा समर्थकों और दक्षिणपंथी डिजिटल क्रिएटर्स ने भी एआई टूल्स का इस्तेमाल तेज कर दिया है। “यूपी बदनाम हुआ, टीपू तेरे मारे” जैसे व्यंग्यात्मक एआई गानों के जरिए अखिलेश यादव (जिनका उपनाम टीपू है) के पिछले शासनकाल की कानून-व्यवस्था और कथित दंगों की याद दिलाई जा रही है। इस एआई वॉर ने केवल डिजिटल स्पेस ही नहीं, बल्कि वास्तविक राजनीतिक बयानों में भी उबाल ला दिया है। भाजपा नेताओं और कई संतों ने सपा द्वारा जारी कुछ एआई वीडियो पर कड़ी आपत्ति जताई है। भाजपा का आरोप है कि विपक्ष एआई के नाम पर संवैधानिक पदों की गरिमा को ठेस पहुंचा रहा है और भगवा संस्कृति एवं सनातन परंपरा का अपमान कर रहा है। वहीं, अखिलेश यादव ने इस डिजिटल जंग को ‘नए समय का नया चुनाव’ करार दिया है। उनका कहना है कि यदि भाजपा की तरफ से सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ भ्रामक प्रचार किया जाएगा, तो उनकी पार्टी का आईटी सेल भी तकनीक के ही माध्यम से करारा जवाब देगा। दिलचस्प बात यह है कि यह एआई युद्ध केवल स्क्रीन तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन पर भी दोनों बड़े नेताओं के बीच सीधी जंग जारी है। हाल ही में दोनों नेताओं के बीच जुबानी तीर तब और तेज हो गए जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव की उस राजनीतिक चुनौती को स्वीकार कर लिया, जिसमें उन्होंने अयोध्या से सीधे चुनाव लड़ने की बात कही थी। योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक मंचों से ललकारते हुए कहा कि “लड़ाई आमने-सामने होनी चाहिए” और वे खुद भी अयोध्या से मैदान में उतरें।

इसके अलावा, हाल के दिनों में ‘वोट चोरी का मुद्दा’ भी गरमाया हुआ है, जहां अखिलेश यादव ने आजमगढ़ के एक युवक का उदाहरण देते हुए एक ही व्यक्ति के नाम पर कई वोट दर्ज होने का आरोप लगाया है। इसके विपरीत, सीएम योगी अपनी जनसभाओं में समाजवादी पार्टी के पुराने इतिहास पर हमला बोलते हुए राज्य की बेहतर कानून-व्यवस्था, माफिया-मुक्त यूपी और प्रशासनिक सुधारों को अपनी मुख्य पिच बना रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में चल रहा यह एआई प्रयोग भारतीय चुनावी इतिहास में एक बड़ा टर्निंग पॉइंट है। अब तक चुनाव रैलियों, पोस्टरों और टीवी बहसों के जरिए लड़े जाते थे, लेकिन 2027 के महामुकाबले से ठीक पहले एआई और डीपफेक टेक्नोलॉजी ने नैरेटिव सेट करने का तरीका बदल दिया है। हालांकि, तकनीकी विशेषज्ञों ने चेतावनी भी दी है कि एआई वीडियो की यह होड़ धीरे-धीरे सच और झूठ के अंतर को धुंधला कर सकती है, जिससे मतदाताओं को गुमराह करना बेहद आसान हो जाएगा। इसके बावजूद, यूपी के इस डिजिटल दंगल से साफ है कि आने वाले समय में जो पार्टी तकनीक और नैरेटिव बिल्डिंग में जितनी आगे होगी, सत्ता की चाबी तक पहुंचने की उसकी राह उतनी ही आसान होगी।

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