दिल्ली का ऐतिहासिक रामलीला मैदान एक बार फिर राजनीतिक जंग और दावों-प्रतिदावों का मुख्य केंद्र बन गया है। रैली खत्म हो चुकी है, लेकिन सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की राजनीति में संख्या बल को लेकर छिड़ी बहस थमने का नाम नहीं ले रही है।

इस बार विवाद का विषय सिर्फ जनता की मौजूदगी नहीं है, बल्कि मैदान में बिछी कुर्सियां और इंटरनेट पर तैर रही तस्वीरें भी हैं। इस पूरे परिदृश्य को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, जहां विरोधियों की गिनती को हास्यास्पद बताया जा रहा है, वहीं अपनों की अति-उत्साही डिजिटल कलाबाजी पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि जो लोग कभी जेएनयू (JNU) के हॉस्टलों और नालियों में कंडोम गिनने जैसी बेतुकी हरकतों में मशगूल रहते थे, आज वे रैलियों की कुर्सियां गिनने के काम में लग गए हैं। विरोधियों का दावा है कि रामलीला मैदान में केवल तीस हजार कुर्सियां बिछाई गई थीं और उनमें से भी ज्यादातर खाली पड़ी थीं। इस तरह के दावों पर कड़ा पलटवार करते हुए रैली के आयोजकों और समर्थकों का कहना है कि प्रशासन और हमारी तरफ से तो सिर्फ तीन हजार कुर्सियां ही मंगाई गई थीं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि अगर वहां तीस हजार कुर्सियां थीं, तो क्या बाकी की कुर्सियां इन्हीं दुष्प्रचार करने वाले ‘सुअरों’ ने खुद लाकर लगवा दी थीं? असलियत यह है कि जब मैदान में जनसैलाब उमड़ा, तो कुर्सियों का वजूद ही खत्म हो गया। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि लोगों के बैठने की जगह नहीं बची और कुर्सियां अदृश्य हो गईं। लोग न केवल मैदान में खड़े रहने को मजबूर हुए, बल्कि आगे की झलक पाने के लिए अपनी एड़ियां उठाकर संघर्ष करते नजर आए। किसी को अंदाजा नहीं था कि जनता के इस अपार समर्थन के बीच भी कुछ ‘जोकर’ प्रवृत्ति के लोग सिर्फ कुर्सियां गिनने में अपना वक्त बर्बाद कर रहे होंगे।

एक तरफ जहां विरोधी इस रैली के भागीदारों की वास्तविक गिनती को कम करके दिखाने का हरसंभव जतन कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ गठबंधन के ही कुछ अति-उत्साही समर्थक एक अलग ही खेल में व्यस्त हैं। रैली की भव्यता को कई गुना बढ़ाकर दिखाने की होड़ में इन लोगों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डिजिटल मैनिपुलेशन का सहारा लेना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया पर ऐसी तमाम तस्वीरें तैर रही हैं जिनमें दिल्ली की सड़कों और फ्लाई ओवरों को ‘कॉपी-पेस्ट’ तकनीक के जरिए इंसानी सिरों से पटा हुआ दिखाया गया है। एक ही भीड़ के हिस्से को बार-बार दोहराकर (लूप करके) फ्लाई ओवरों पर इस तरह बिठाया गया है जो देखने में पूरी तरह अवास्तविक और फर्जी लगता है। इस तरह का कृत्रिम उत्साह और एआई का सहारा लेना जमीनी हकीकत को मजबूत करने के बजाय उसे कमजोर करता है। राजनीति में अति-उत्साह अक्सर विश्वसनीयता को चोट पहुंचाता है, और यही वजह है कि इन फेक और एडिटेड तस्वीरों की वजह से वास्तविक भीड़ के दावों पर भी उंगलियां उठने लगी हैं।

किसी भी रैली के प्रभाव को उसकी डिजिटल एडिटिंग से नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक उपस्थिति से आंका जाना चाहिए। हम यहां किसी भी तरह के प्रोपेगैंडा या बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए दावों के बजाय पूरी तरह से हकीकत साझा करना चाहते हैं। रामलीला मैदान की इस रैली में लाखों की तादाद में लोग पहुंचे थे, यह एक अकाट्य सत्य है। मैदान के अंदर और उसके आसपास के रास्तों पर जो हुजूम था, वह यह बताने के लिए काफी था कि लोगों में मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर गहरी दिलचस्पी या आक्रोश है। इस वास्तविक तादाद को अगर अंकों में आंका जाए, तो यह संख्या दो लाख से लेकर दस लाख के बीच कुछ भी हो सकती है। अलग-अलग कोणों से देखने पर यह गिनती बदल सकती है, लेकिन इसे महज तीस हजार बता देना या फिर एआई के जरिए इसे करोड़ों में बदल देना, दोनों ही पराकाष्ठाएं गलत हैं।

अंततः, रामलीला मैदान की यह रैली यह साफ करती है कि देश की राजनीति अब केवल मैदानों में नहीं, बल्कि डेटा और प्रोपेगैंडा के स्तर पर भी लड़ी जा रही है। जहां एक पक्ष जनता की आवाज और उपस्थिति को दबाने के लिए ‘कुर्सी पॉलिटिक्स’ का सहारा ले रहा है, वहीं दूसरा पक्ष एआई के ‘कॉपी-पेस्ट’ टूल से सच को धुंधला कर रहा है। लेकिन इन दोनों के बीच जो सच है, वह मैदान में खड़े उन लोगों की आंखों में दिखता है जो बिना किसी लालच या दबाव के, सिर्फ बदलाव की ‘उम्मीद’ में अपनी एड़ियां उठाए मंच की तरफ देख रहे थे। राजनीति को इन जोकरों और डिजिटल कलाकारों से इतर, इसी जमीनी हकीकत को स्वीकार करना होगा।




