डॉ. आरज़ू अहमद शाह,मगरधा,मध्य प्रदेश

दीपावली के उल्लास की अगवानी करता पावन पर्व धनतेरस (धनत्रयोदशी) मात्र भौतिक वैभव, स्वर्ण-रजत या बर्तन खरीदने का अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह हमारी अगाध आस्था, सनातन निष्ठा, शाश्वत संस्कृति और उस दिव्य परंपरा का जीवंत अहसास है, जो जीवन को आरोग्य और प्रेम के सूत्र में पिरोती है। भारतीय परिवेश विशेषकर हमारे गाँवों और कस्बों के आत्मीय ताने-बाने में यह पर्व रिश्तों की गर्माहट और जीवन के परम सत्य यानी आरोग्यता का संदेश लेकर आता है। हमारे आँगन में जब धनतेरस की बेला आती है, तो यह केवल बाज़ार की चहल-पहल नहीं होती, बल्कि यह घर-परिवार के जुड़ाव का उत्सव होता है। साफ़-सफाई और नव-सृजन, घरों की लिपाई-पुताई, स्वच्छ आँगन और द्वार पर सजती रंगोली इस बात का प्रतीक है कि हम अपने जीवन में सकारात्मकता और पवित्रता का स्वागत करने के लिए तत्पर हैं। परंपरा की जीवंतता,सामर्थ्य के अनुसार तांबे, पीतल या मिट्टी के पात्र खरीदना इस बात का प्रमाण है कि हम आधुनिकता की दौड़ में भी अपनी मिट्टी और जड़ों से मज़बूती से जुड़े हुए हैं। यह भारतीय संस्कृति का वह सहज़ सौंदर्य है जो हर वस्तु को एक संस्कार में बदल देता है।

धनतेरस का यह पावन पर्व मूल रूप से भगवान धनवंतरी को समर्पित है। पुराणों के अनुसार, कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को समुद्र मंथन के दौरान भगवान धनवंतरी हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। आरोग्य ही परम धन है, लोक-व्यवहार में हम भले ही ‘धन’ का अर्थ मुद्रा या स्वर्ण मान लें, किंतु भारतीय मनीषा ने हमेशा यह स्वीकारा है कि ‘पहला सुख निरोगी काया’। भगवान धनवंतरी आयुर्वेद के आदि प्रवर्तक और जगत के चिकित्सक हैं। उनके हाथ में मौजूद अमृत कलश इस शाश्वत सत्य की घोषणा करता है कि संसार में मनुष्य के लिए सबसे बड़ा धन आरोग्यता और स्वस्थ प्राण-शक्ति है। चिकित्सा और करुणा की साधना,,यह दिन उन सभी चिकित्सकों, वैद्यों और प्राण-रक्षकों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का भी अवसर है, जो सेवा-भाव से मानवता के कष्टों का निवारण करते हैं। धनतेरस की संध्या जब यमराज के निमित्त और घर के द्वारों पर दीप प्रज्वलित किए जाते हैं, तो वह केवल तिमिर को मिटाने का उपक्रम नहीं होता,वह अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति और परिवार की दीर्घायु की मंगलकामना होती है।

जब परिवार के सभी जन मिलकर दीपमाला सजाते हैं, एक-दूसरे को आरोग्यता की शुभकामनाएँ देते हैं, तो यह आत्मीयता आपसी प्रेम और भाईचारे के बंधन को प्रगाढ़ करती है। पड़ोसियों और अपनों के साथ स्नेह साझा करना हमें यह अहसास कराता है कि सुख केवल अकेले भोगने में नहीं, बल्कि बाँटने में है। धनतेरस हमें यह बोध कराता है कि हमारा जीवन मात्र भौतिक सफलताओं और उपभोग की दौड़ नहीं है, बल्कि यह संवेदनाओं, संस्कृति और स्वास्थ्य का उत्सव है। भगवान धनवंतरी की अनुकंपा से हमारे जीवन में न केवल अन्न-धन का विस्तार हो, बल्कि शरीर निरोगी हो और मन में करुणा व प्रेम का प्रकाश सदैव जगमगाता रहे। इस धनतेरस, आइए हम केवल दीप ही न जलाएं, बल्कि हर सुसंस्कृत मन में आरोग्यता, सेवा और भाईचारे का संकल्प भी प्रज्वलित करें।




