नक़ाबों के लबादे चेहरों से उतर क्यों नहीं जाते?

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश

ये दीवारों के साए रोज़ जो डसते हैं आँखों को,
चराग़ों की तरह हम ख़ौफ़ से डर क्यों नहीं जाते?

​बिक़ी बाज़ार में हर साँस नीलामियों के हाथों,
बे-ग़ैरत से अरमाँ दम-ब-दम मर क्यों नहीं जाते?

आया है ख़त के आऊंगा मैं तेरे शहर में  जानां,
आने की ख़ुशी में हद से गुज़र क्यों नहीं जाते।

​तमाशा सी नज़र आती है ज़िंदगी हर एक चेहरे पर,
नक़ाबों के लबादे चेहरों से उतर क्यों नहीं जाते?

​बुलंदी की हवस में खींच लाती है ज़मीन हमको,
ये ऊँचे मर्तबे के ख़्वाब झूठे बिखर क्यों नहीं जाते?

बहुत हंसी है चांद जो चमकता है फ़लक पर बेशक,
मेरे महबूब तुम भी थोड़ा सा संवर क्यों नहीं जाते।

मदहोश जब कर गई उसकी मदभरी आँखें तुमको,
पी ली है तुमने तो फिर तुम भी बहक क्यों नहीं जाते।

​ज़माने भर की ख्वाहिश पीठ पर लादे हुए “मुश्ताक़”,
ये बोझिल पाँव थककर अब ठहर क्यों नहीं जाते?

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