सड़क पर उतरना और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना लोकतंत्र की आत्मा है। लेकिन जब यह प्रदर्शन देश को आगे ले जाने के बजाय थामने लगे, तो आत्ममंथन की जरूरत होती है।

आज का भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ देश की नीतियां, फैसले और भविष्य वातानुकूलित संसद भवनों या टीवी स्टूडियो से ज्यादा सड़कों पर तय हो रहे हैं। आज हर छोटा-बड़ा मुद्दा राजनीतिक दलों के लिए शक्ति प्रदर्शन का जरिया बन चुका है। चाहे सरकार की कोई नई नीति हो, विपक्ष का कोई विरोध प्रदर्शन हो, या फिर रोज़गार और अधिकारों की मांग करता हुआ युवा वर्ग—हर कोई आज सड़क पर है। इसे ही आधुनिक भारत की ‘रोड की राजनीति’ कहा जा रहा है। लेकिन इस पूरे चक्रव्यूह में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि दिन-रात सड़कों पर होने वाले इस घमासान से आम जनता यानी पब्लिक को वास्तव में क्या मिल रहा है?सड़क की राजनीति में सरकार की भूमिका भी अब रक्षात्मक नहीं रही। जब भी विपक्ष या कोई नागरिक समूह सड़क पर उतरता है, तो सरकार और सत्ताधारी दल उसके जवाब में अपनी रैलियां, रोड शो और विकास यात्राएं लेकर सड़कों पर उतर आते हैं। सरकार के लिए सड़कें अब अपनी योजनाओं की ‘मार्केटिंग’ और भारी भीड़ जुटाकर अपनी लोकप्रियता साबित करने का सबसे बड़ा माध्यम बन चुकी हैं। जब देश का शीर्ष नेतृत्व किलोमीटर लंबे रोड शो करता है, तो वह यह संदेश देने की कोशिश करता है कि जनता उनके साथ है। लेकिन इस भव्य प्रदर्शन की दूसरी तस्वीर यह है कि जब भी कोई बड़ा वीआईपी मूवमेंट या सरकारी रैली होती है, तो कई किलोमीटर का इलाका सील कर दिया जाता है। घंटों ट्रैफिक जाम में फंसी एम्बुलेंस और दफ्तर जाने के लिए परेशान आम आदमी को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या यह शक्ति प्रदर्शन वाकई उसके कल्याण के लिए है?

लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार की कमियों को उजागर करना और जनता की आवाज़ बनना है। जब संसद में बहस के रास्ते सीमित होने लगते हैं, तो विपक्ष के पास सड़क ही आखिरी विकल्प बचती है। हाल के दिनों में विपक्ष ने महंगाई, बेरोजगारी, और विभिन्न घोटालों के खिलाफ ‘चलो दिल्ली’ जैसे बड़े मार्च और रामलीला मैदान में महारैलियों के जरिए खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश की है। लेकिन यहाँ भी एक कड़वी सच्चाई है। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि विपक्ष के लिए सड़क पर उतरना जनता के दर्द से ज्यादा अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाए रखने और मीडिया की सुर्खियों में बने रहने का जरिया बन गया है। जब आंदोलन सिर्फ प्रतीकात्मक चक्का जाम और पुतले फूंकने तक सीमित रह जाते हैं, तो उससे बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं निकलता, बल्कि आम जनता की दैनिक दिनचर्या और आजीविका ही प्रभावित होती है। इस रोड की राजनीति में सबसे दिलचस्प और नया मोड़ लेकर आई है आज की युवा पीढ़ी, जिसे हम GenZ कहते हैं। आज का युवा पारंपरिक राजनीतिज्ञों की तरह सिर्फ झंडे उठाने सड़क पर नहीं आ रहा। उसके लिए सड़क अब एक साथ तीन भूमिकाएं निभा रही है—अधिकारों की लड़ाई, सफलता की चाह और उसकी ‘मस्ती की पाठशाला’। GenZ ने आंदोलन करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। जहाँ पहले आंदोलनों में केवल गंभीर और तनावपूर्ण माहौल होता था, वहीं आज के युवा आंदोलनों में स्टैंड-अप कॉमेडी, नुक्कड़ नाटक, रैप म्यूज़िक और रचनात्मक पोस्टर्स का बोलबाला है। वे गंभीर से गंभीर मुद्दों को भी सोशल मीडिया रील्स और मीम्स के जरिए ट्रेंड करा देते हैं। स्मार्टफोन और हाई-स्पीड इंटरनेट उनके सबसे बड़े हथियार हैं। वे सड़क पर बैठकर सीधे इंस्टाग्राम या एक्स (ट्विटर) पर लाइव होते हैं और देखते ही देखते लाखों लोगों को अपने साथ जोड़ लेते हैं। यह टेक्नोलॉजी का सही और बेहद सटीक उपयोग है, जिसने सरकारों को भी सोचने पर मजबूर किया है। लेकिन इस डिजिटल चकाचौंध के बीच कई बार आंदोलनों की गंभीरता कम होने का खतरा भी बना रहता है, जब मुख्य मुद्दा पीछे छूट जाता है और सोशल मीडिया पर ‘लाइक’ और ‘व्यूज’ बटोरना प्राथमिक हो जाता है।

इन सबके बीच पिसती है देश की आम जनता—वह वर्ग जो न तो नेता है, न कार्यकर्ता और न ही सोशल मीडिया पर रील बनाने वाला इन्फ्लुएंसर। उसे केवल अपने काम पर जाना है, बच्चों को स्कूल भेजना है और शाम को सुरक्षित घर लौटना है। आर्थिक नुकसान और असुविधा: बार-बार के बंद, हाईवे जाम और प्रदर्शनों के कारण सबसे ज्यादा मार दिहाड़ी मजदूरों, छोटे दुकानदारों और ऑटो चालकों पर पड़ती है। जब रास्ते बंद होते हैं, तो व्यापार ठप हो जाता है। बुनियादी मुद्दों से भटकाव: जब राजनीति केवल इस बात पर केंद्रित हो जाए कि कौन सड़क पर कितनी बड़ी भीड़ जुटा सकता है, तो अस्पताल, स्कूल, साफ पानी और कचरा प्रबंधन जैसे जरूरी और बुनियादी मुद्दे ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। ध्रुवीकरण और तनाव: सड़कों पर होने वाली राजनीति अक्सर उग्र रूप ले लेती है, जिससे सामाजिक ताना-बाना कमजोर होता है और आम नागरिकों के मन में असुरक्षा की भावना पैदा होती है।

सड़क पर उतरना और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना लोकतंत्र की आत्मा है। लेकिन जब यह प्रदर्शन देश को आगे ले जाने के बजाय थामने लगे, तो आत्ममंथन की जरूरत होती है। सरकार को जनता की जायज मांगों को सुनने के लिए संवेदनशील होना होगा, विपक्ष को केवल राजनीतिक लाभ के लिए रास्ते रोकने से बचना होगा और युवा पीढ़ी को अपनी रचनात्मक ऊर्जा का इस्तेमाल केवल शोर मचाने के बजाय ठोस बदलाव के लिए करना होगा। जब तक राजनीति का केंद्र सड़क की चौधरत से हटकर आम आदमी के जीवन स्तर को सुधारने पर नहीं आएगा, तब तक इस ‘रोड की राजनीति’ से जनता को केवल जाम, धुआं और खोखले वादों के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा।




