तुम्हारी हर परेशानी साथ में मैं हूं न,,,,

डॉ. मुश्ताक अहमद शाह

तुम्हारी हर परेशानी में साथ ,मैं हूं न,
हार के बाद फिर तेरी जीत में मैं हूं न।

चाँद की चाँदनी तेरे उजियारे लिए,
तन्हा सफर में तेरे साथ मैं हूं न।

जब बढ़े अँधेरा दिल के आसमां पे,
रोशनी की दुआओं की लड़ी में मैं हूं न।

वो मुकाम जिससे हर कोई डरता है,
उस वक्त तेरा हमसफ़र में मैं हूं न।

बिखरे हुए ख्वाबों के बिखरे मोती,
तेरे हर रोज़ के रंगों में मैं हूं न।

जब भटक जाए तु रास्ता अपना,
तेरा उस मोड़ पर राहगीर में मैं हूं न।

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