माता-पिता की ममता और उनका बेमिसाल मक़ाम,,,

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश

“पैदाइश से लेकर मौत तक आप हज़ारों रिश्ते बना सकते हैं, लेकिन एक फ़िक्र करने वाला बाप और मोहब्बत करने वाली माँ दोबारा कभी नहीं मिलेंगे.” यह एक ऐसी शाश्वत सच्चाई है जिसे लफ़्ज़ों में बाँधना मुमकिन नहीं बस महसूस किया जा सकता है। इस दुनिया में इंसान जन्म लेते ही रिश्तों के एक अंतहीन समंदर में उतर जाता है। स्कूल के दोस्त कॉलेज के यार जीवनसाथी और फ़िर कारोबार व समाज के अनगिनत ताने-बाने,हम ताउम्र हज़ारों रिश्ते बनाते हैं उन्हें सँवारते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन इन तमाम रिश्तों की भीड़ में दो ऐसे नूरानी चेहरे होते हैं जिनका कोई बदल कोई विकल्प इस कायनात में मौजूदा ही नहीं है। ज़रा सोचिए जब इस दुनिया में हमारा कोई वजूद नहीं था तब नौ महीने तक अपनी कोख़ में हमें पालने वाली हर धड़कन को अपनी धड़कन बनाने वाली माँ होती है। वह ममता की वह मूरत है जो ख़ुद भूखी रहकर हमें खिलाती है हमारी एक हल्की सी तकलीफ़ पर जिसकी रातों की नींद उड़ जाती है। जब हम दुनिया के थपेड़ों से थककर चूर हो जाते हैं तो माँ का वह आँचल ही होता है जहाँ सिर रखते ही सारी थकान और दर्द पल भर में ओझल हो जाते हैं।


और दूसरी तरफ़ वह शख़्स होता है जिसे लोग अक्सर सख्त मिज़ाज या ख़ामोश समझते हैं,वह है ‘बाप’। वह अपनी हसरतों अपनी ख़्वाहिशों और अपनी ज़रूरतों का गला घोंटकर बच्चों की मुस्कान के लिए धूप में तपता है काँटों पर चलता है। उसकी सख़्त डाँट के पीछे भी बच्चों के मुस्तक़बिल की फ़िक्र छिपी होती है। वह परिवार की वह मज़बूत ढाल है जिसके साये में पूरा घर बेख़ौफ़ जीता है। आज की नई पीढ़ी इस अंधी दौड़ में इतनी आगे निकल गई है कि उसे वर्चुअल दुनिया के लाइक्स और फॉलोअर्स तो अज़ीज़ लगते हैं मगर घर के एक कोने में बैठे बूढ़े माँ-बाप की आँखें इंतज़ार में थक जाती हैं। आज की भागदौड़ में हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि जब कोई दोस्त साथ छोड़ दे तो दूसरा मिल जाता है जब कोई हमसफ़र बिछड़ जाए तो ज़िंदगी नया मोड़ ले लेती है,लेकिन माँ और बाप के जाने के बाद दुनिया का कोई भी कोना कोई भी शख्स उनकी कमी को पूरा नहीं कर  सकता वे ज़िंदगी में सिर्फ़ एक ही बार मिलते हैं।


क्या कभी हमने सोचा है कि हम अपने दोस्तों और दुनिया भर के कामों के लिए घंटों निकाल लेते हैं लेकिन उन दो हस्तियों के पास बैठने के लिए हमारे पास चंद लम्हे भी नहीं होते जिन्होंने अपना पूरा जीवन हमारे नाम कर दिया? जिस दिन वे आँखें हमेशा के लिए बंद कर लेते हैं उस दिन घर की दीवारों से लेकर हवाओं तक में सन्नाटा पसर जाता है। तब एहसास होता है कि हमने क्या खो दिया।
वक्त रहते इन अनमोल रिश्तों की क़द्र कीजिए। उनके चेहरे की झुर्रियों में अपनी कामियाबी की दास्तान पढ़िए और उनके बुढ़ापे की लाठी बनिए। माँ-बाप का दिल जीतना ही ख़ुदा की रज़ा पाने का सबसे बड़ा ज़रिया है क्योंकि इनके बिना ज़िंदगी महज़ एक सूना रेगिस्तान बनकर रह जाती है।

Change Language