भारतीय बैंकिंग इतिहास में 14 अक्टूबर 2026 का दिन एक ऐसी कॉर्पोरेट डील के गवाह के रूप में दर्ज हो गया, जिसने सरकारी संपत्तियों के विनिवेश (Privatization) की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

एनडीए-1 के दौर में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने दिसंबर 2003 में संसद के भीतर देश से एक पवित्र वादा किया था। तब उद्योगों को दीर्घकालिक ऋण देने वाली सरकारी विकास संस्था ‘आईडीबीआई’ (IDBI) को एक कमर्शियल बैंक में बदला जा रहा था। तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने देश को आश्वस्त किया था कि सरकार इस बैंक में अपनी हिस्सेदारी कभी भी 51 फ़ीसदी से नीचे नहीं जाने देगी, यानी इसकी कमान हमेशा जनता के हाथ में रहेगी। साल 2019 में मोदी सरकार ने इस वादे को पहली बार तोड़ते हुए अपनी सीधी हिस्सेदारी घटाई और सरकारी जीवन बीमा निगम (LIC) को इसमें प्रमोटर के तौर पर शामिल किया। चूंकि एलआईसी भी सरकारी थी, इसलिए बैंक पर जनता का हक बना रहा। लेकिन अक्टूबर 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीसरी सरकार ने इस ऐतिहासिक वादे को पूरी तरह किनारे रख दिया और देश के एक विशाल बैंकिंग ढांचे को तश्तरी में सजाकर एक विदेशी निजी कंपनी के हवाले कर दिया।
₹52,878 करोड़ की डील: नियंत्रण भी मिला और भारी डिस्काउंट भी
आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति (CCEA) ने आईडीबीआई बैंक की 60.72 फ़ीसदी हिस्सेदारी कनाडा के अरबपति प्रेम वत्स की कंपनी फ़ेयरफ़ैक्स फ़ाइनेंशियल होल्डिंग्स को बेचने पर अंतिम मुहर लगा दी। इस सौदे के तहत केंद्र सरकार ने अपनी 30.48% और एलआईसी ने अपनी 30.24% हिस्सेदारी बेची है। प्रति शेयर की कीमत ₹81 तय की गई, जिससे कुल डील ₹52,878 करोड़ की बैठी। अब सरकार और एलआईसी के पास महज 34% हिस्सा बचेगा, लेकिन बैंक को पूरी तरह चलाने का मालिकाना हक फेयरफैक्स के पास स्थानांतरित हो जाएगा। हैरानी की बात यह है कि जिस दिन कैबिनेट ने इस सौदे को मंजूरी दी, उस दिन शेयर बाजार में आईडीबीआई का भाव ₹90.39 प्रति शेयर था। कॉरपोरेट जगत का यह बुनियादी नियम है कि जब कोई किसी कंपनी का पूरा मैनेजमेंट कंट्रोल खरीदता है, तो वह बाजार भाव से अधिक कीमत चुकाता है, जिसे ‘कंट्रोल प्रीमियम’ कहा जाता है। लेकिन यहाँ फेयरफैक्स को नियंत्रण भी मिला और प्रति शेयर करीब ₹9.39 का डिस्काउंट भी। बेचे गए 652.8 करोड़ शेयरों पर जनता के नुकसान का यह आंकड़ा सीधे तौर पर लगभग ₹6,100 करोड़ बैठता है।

इस पूरी निजीकरण प्रक्रिया में पारदर्शिता का दावा करने के लिए सरकार ने ‘डबल ब्लाइंड’ (Double Blind) सिस्टम का हवाला दिया। साधारण शब्दों में इसका मतलब यह होता है कि बेचने वाले को खरीदार की बोली का पता न हो और खरीदार को बेचने वाले की न्यूनतम आरक्षित कीमत (Reserve Price) की भनक न हो, ताकि कोई हेरफेर न हो सके। लेकिन आईडीबीआई के मामले में विनिवेश विभाग (DIPAM) के 13 अगस्त के एक अंदरूनी नोट से जो कहानी सामने आई, वह चौंकाने वाली है:
पहली नीलामी: साल 2025-26 में जब पहली बार बोलियां मंगाई गईं, तब सरकार ने बैंक की न्यूनतम कीमत ₹94.42 प्रति शेयर तय की थी। फेयरफैक्स की बोली इससे कम होने के कारण पहली नीलामी रद्द होनी चाहिए थी।
नियमों को मरोड़ना: सरकार ने अपनी पुरानी आरक्षित कीमत को किनारे रखकर नए सिरे से मूल्यांकन (Asset Valuation) का आदेश दिया। नया मूल्यांकन ठीक फेयरफैक्स की ₹81 की बोली के नीचे यानी ₹75.99 पर ला दिया गया। यदि यह क्रम सही है, तो पहले खरीदार का लिफाफा खोला गया और फिर उसके हिसाब से घर की कीमत तय की गई।

प्रतिस्पर्धा का अंत: अकेले खरीदार के आगे सरेंडर
किसी भी सरकारी संपत्ति को बेचने की असली ताकत उसमें होने वाली स्वस्थ प्रतिस्पर्धा (Competition) होती है। जब कोटक महिंद्रा बैंक और खाड़ी के दिग्गज बैंक ‘एमिरेट्स एनबीडी’ (Emirates NBD) जैसे बड़े नाम इस रेस में शामिल थे, तो उम्मीद थी कि बोलियां ऊपर जाएंगी। लेकिन कोटक बैंक ने वित्तीय बोली लगाने से इनकार कर दिया और एमिरेट्स एनबीडी ने पैर पीछे खींच लिए। जब मैदान में फेयरफैक्स अकेला खरीदार बचा, तो सरकार के पास अपनी संपत्ति को बचाने का एकमात्र हथियार उसकी न्यूनतम कीमत (₹94.42) थी, लेकिन सरकार ने उस हथियार को खुद ही सरेंडर कर दिया।
करदाताओं के पैसे से बना ‘कुशन’ और ‘गल्ले से लूट’ की तरकीब
यह कहानी और भी गंभीर हो जाती है जब हम फेयरफैक्स के चेयरमैन प्रेम वत्स के 15 अक्टूबर के उस बयान को देखते हैं, जिसमें उन्होंने निवेशकों से कहा कि वे भारत में अपनी तीन कंपनियों (गो डिजिट जनरल, गो डिजिट लाइफ़ और IIFL कैपिटल) की हिस्सेदारी आईडीबीआई बैंक में डालेंगे और बैंक इसका भुगतान ‘नकद’ में करेगा। पूरी खरीद के लिए फेयरफैक्स को 5.6 अरब डॉलर की जरूरत थी, और उनकी इन तीन कंपनियों की कीमत करीब 3 अरब डॉलर आंकी गई है। यानी आधे से ज्यादा रकम वे बैंक के ही खजाने से वसूल लेंगे।
यहाँ तीन बड़े वित्तीय झोल दिखाई देते हैं:
पारदर्शिता का अभाव: गो डिजिट लाइफ शेयर बाजार में लिस्टेड ही नहीं है, तो उसका पारदर्शी बाजार भाव कैसे तय हुआ?
आरबीआई के नियमों का उल्लंघन: रिज़र्व बैंक का सख्त नियम है कि कोई भी कमर्शियल बैंक किसी एक वित्तीय कंपनी में अपनी मुख्य पूंजी का 10 फ़ीसदी से अधिक निवेश नहीं कर सकता। यह सौदा इस बैंकिंग नियम में कैसे फिट बैठेगा?
जनता की पूंजी का दुरुपयोग: साल 2016 से 2020 के बीच जब आईडीबीआई बैंक 6.4 अरब डॉलर के भारी घाटे में था, तब केंद्र सरकार और एलआईसी ने अपने करदाताओं और पॉलिसीधारकों के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई (अकेले 2019 में ₹9,300 करोड़) डालकर इसका कैपिटल कुशन 27.10% तक पहुंचाया था। अब उसी अतिरिक्त सरकारी पूंजी का इस्तेमाल नया मालिक अपनी निजी कंपनियों के भुगतान के लिए करने जा रहा है।

हितों का टकराव: एलआईसी के बोर्ड में फेयरफैक्स का साया
इस पूरे सौदे के पीछे हितों के टकराव (Conflict of Interest) की एक धुंधली परत भी है। जिस समय यह सौदा अंतिम रूप ले रहा था, उस दौरान एलआईसी की निवेश समिति का एक निदेशक ‘थॉमस कुक इंडिया’ के बोर्ड में भी सक्रिय था। गौरतलब है कि एलआईसी इस सौदे में अपनी हिस्सेदारी बेचने वाला पक्ष था, जबकि थॉमस कुक इंडिया का स्वामित्व सीधे तौर पर खरीदार कंपनी फेयरफैक्स के पास है। एलआईसी ने आज तक यह स्पष्ट नहीं किया कि क्या उस निदेशक ने इस दोहरे रिश्ते को सार्वजनिक किया था या खुद को इस संवेदनशील निर्णय प्रक्रिया से अलग रखा था।
क्रोनी कैपिटलिज्म का नया मॉडल
नवंबर 2014 में फेयरफैक्स के मुखिया प्रेम वत्स की प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात के बाद शुरू हुआ यह सफर आज देश के एक प्रीमियर बैंक के निजीकरण पर आकर थमा है। खरीदार की मर्जी के मुताबिक आरक्षित मूल्य को घटाना, बाजार भाव से कम पर नियंत्रण सौंपना, प्रतिस्पर्धा का गायब होना और बैंक की अपनी ही संचित पूंजी से नए मालिक की अन्य कंपनियों को फंड करना—ये सारे बिंदु इस सौदे को संदेह के घेरे में लाते हैं। क्या इसे महज एक इत्तेफाक मान लिया जाए या फिर यह क्रोनी कैपिटलिज्म और ‘ओएलएक्स (OLX) सरकार’ के नैरेटिव की एक और जीती-जागती मिसाल है? देश की वित्तीय संप्रभुता के इस मोड़ पर आज यह सवाल पूछना बेहद जरूरी है।




