एक अफ़साना जो मुकम्मल न हो सका…

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़,हरदा, मध्य प्रदेश


शाम का धुंधलका था, शहर के किसी मसरूफ़ तरीन चौराहे पर ट्रैफ़िक का शोर और हुजूम अपनी इंतहा पर था। गाड़ियों की लाइटें, लोगों के क़दमों की चाप, और इस गहमगहमी में भी एक अजीब सा सन्नाटा था। अचानक, उसी भीड़ के समंदर के बीच, एक लम्हे के लिए वक़्त रुक सा गया। नज़रें मिलें,वही पुरानी आँखें, मगर अब उनमें वक़्त की गर्द, बरसों की दूरी और फ़ासलों की संजीदगी थी। सड़क के इस पार वो खड़ी थी और उस पार मैं,दरमियान में दौड़ती हुई गाड़ियों का रेला और तक़दीर की वो दीवार थी जिसे कोई फ़ांद नहीं सकता था। बस इतनी सी मुलाक़ात थी,न कोई तवील गुफ़्तगू, न कोई शिकवा, न कोई शिकायत। दोनों ने एक दूसरे को देखा, होंटों पर एक उदास सी मुस्कराहट सजी, और बग़ैर कुछ कहे, हुजूम की लहर में एक दूसरे से ओझल हो गए। पीछे सिर्फ़ शाम का उतरता हुआ अँधेरा, शोर और हवा में तैरती हुई वो ख़ामोशी रह गई, जो हर बार ऐसे अधूरे मिलने के बाद दिल को और ज़्यादा वीरान कर जाती है। वो स्कूल की छुट्टी का वक़्त, गेट पर दोस्तों की बेपरवाह बातें, और बस जल्दी से घर पहुँचने की वो कशमकश क्या ख़ूब ज़माना था वो! उसी शोर-शराबे और मासूमियत भरी दुनिया में, कबीर और मीरा की कहानी शुरू हुई थी। दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे। क्लासरूम्स की उन बेंचों पर, ब्लैकबोर्ड्स पर लिखे सपनों के बीच, कब दोस्ती ने एक गहरे अहसास का रूप ले लिया, उन्हें ख़ुद पता नहीं चला। वो कच्ची उम्र की मोहब्बत थी,जहाँ न दुनिया की समझ थी और न ही मुस्तक़बिल की फ़िक्र, लेकिन उसके अंदर जो पक्की सच्चाई थी, वह रूह तक उतर चुकी थी।


लेकिन ज़िंदगी हमेशा वैसी नहीं चलती जैसे हम चाहते हैं। वक़्त ने अपने पर फ़ैलाए, स्कूल का दौर पीछे छूट गया, और हालात ने दोनों को अलग-अलग राहों पर धकेल दिया। वो हमसफ़र जो कभी हर सुबह का सहारा था, अचानक वक़्त के हाथों मजबूर हो कर बिछड़ गया और दिल में एक ऐसा दर्द छोड़ गया जो वक़्त के साथ और गहरा होता गया। आज भी उसकी यादें भुलाई नहीं जाती हैं।
आज भी जब कभी अचानक किसी मोड़ पर उनकी मुलाक़ात हो जाती है, तो लगता है जैसे साल बीते ही नहीं हैं। दोनों अलग मंज़िलों के राही की तरह मिलते हैं,जिनकी मंज़िलें और राहें बिल्कुल अलग हैं, जो एक दूसरे की ज़िंदगी में अब बस एक अजनबी की तरह हैं, लेकिन दिल के किसी कोने में वही पुरानी कसक बाक़ी है। तड़प इधर भी है और उधर भी, बस फ़र्क़ इतना है कि अब फ़ासले मिटाए नहीं जा सकते। क़िस्मत के लिखे को कौन मिटा सकता है? हाथ की लकीरें अलग थीं तो मिलन कैसे मुमकिन होता? पर सच तो यह है कि वो कच्ची उम्र का अहसास आज भी पक्के तौर पर दिल में ज़िंदा है। दर्द भी उसी का है और यादों का सरमाया भी है,बस यही तो अधूरी और सच्ची मोहब्बत है।

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