वक़्त के रहते रहते,,,

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश 

बदल दी हमने राह अपनी वक़्त के रहते रहते,

उतार दी ज़ंजीरें-रिश्तों की वक़्त के रहते रहते।

थक गए थे हम चिराग-ए-आरज़ू जलाते-जलाते,

मिली तनहाई की  की रातें वक़्त के रहते रहते।

असीर-ए-ग़म रहे हम मुद्दतों इस महफ़िल में,

पाई ख़ुद से हम- क़लामी वक़्त के रहते रहते।

नसीब में न थी वो सोहबत-ए-गुल, क्या कीजिए,

काँटों से राब्ता कर लिया हमने वक़्त के रहते रहते।

बज़्म-ए-दोस्तों में अब हमारा पता नहीं मिलता,

चुनी है हमने ये ख़ामोशी वक़्त के रहते रहते।

वफ़ा की आस में ‘मुश्ताक’ को न मिटाया करो,

संभल जा ऐ दिल-ए-मुज़्तर वक़्त के रहते रहते।

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