कांग्रेस का बड़ा दांव या मजबूरी का फेरबदल? यूपी-पंजाब में नए नेतृत्व की अग्निपरीक्षा

कांग्रेस ने 2027 विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश और पंजाब में संगठन की कमान बदलकर बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है। उत्तर प्रदेश में अजय राय की जगह आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है।-रितेश सिन्हा

सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष तथा देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। पंजाब में पूर्व हॉकी कप्तान और जालंधर कैंट से विधायक रहे परगट सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। लेकिन कांग्रेस के लिए असली सवाल चेहरे बदलने का नहीं, संगठन बदलने का है। खासकर उत्तर प्रदेश में यह चुनौती कहीं बड़ी है। 403 विधानसभा सीटों और 80 लोकसभा सीटों वाला यूपी देश की सबसे बड़ी राजनीतिक प्रयोगशाला है। मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 22 मई 2027 तक है। ऐसे में कांग्रेस के पास संगठन को चुनावी मशीनरी में बदलने के लिए समय तो है, लेकिन बहुत अधिक नहीं। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की स्थिति बेहद कमजोर रही थी। पार्टी केवल दो सीटें जीत सकी। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर बदली। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में छह लोकसभा सीटें जीतीं और समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन ने भाजपा को कई क्षेत्रों में चुनौती दी। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की छह सीटें दर्ज हैं। यहीं कांग्रेस के सामने अवसर और चुनौती दोनों मौजूद हैं। 2024 ने यह जरूर दिखाया कि विपक्षी तालमेल से यूपी का चुनावी गणित बदल सकता है, लेकिन लोकसभा की छह सीटों को 403 विधानसभा क्षेत्रों में संगठनात्मक ताकत में बदलना बिल्कुल अलग परीक्षा है। गठबंधन से मिली राजनीतिक जगह और अपने दम पर खड़ा संगठन—दोनों को एक मान लेना कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी भूल हो सकती है।

आराधना मिश्रा ‘मोना’ के सामने यही सबसे कठिन सवाल है। रामपुर खास से उनकी राजनीतिक पकड़ अपनी जगह है, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी केवल एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं होती। उन्हें पूर्वांचल से पश्चिमी यूपी और अवध से बुंदेलखंड तक पार्टी की ऐसी संरचना तैयार करनी होगी, जो केवल चुनाव के समय दिखाई न दे। इमरान मसूद के सामने भी क्षेत्रीय प्रभाव को प्रदेशव्यापी संगठनात्मक भूमिका में बदलने की चुनौती होगी। सहारनपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजनीतिक पहचान होना एक बात है और 403 विधानसभा क्षेत्रों में संगठन को सक्रिय करना दूसरी। एक-दो लोकसभा या विधानसभा क्षेत्रों में प्रभाव पूरे प्रदेश की चुनावी क्षमता का विकल्प नहीं हो सकता। कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी यहीं दिखाई देती है। पार्टी के पास नेता हैं, लेकिन हर विधानसभा क्षेत्र में लगातार सक्रिय राजनीतिक संगठन कितना मजबूत है, यह बड़ा सवाल है। कितने जिलाध्यक्ष वास्तव में मैदान में हैं? कितने ब्लॉक अध्यक्ष बूथ तक पार्टी का नेटवर्क चला रहे हैं? कितने विधानसभा क्षेत्रों में ऐसे स्थानीय चेहरे हैं जो पांच साल जनता के बीच रहे हैं, न कि चुनाव आने पर सामने आए हैं? यूपी जैसे राज्य में केवल लखनऊ से संगठन चलाने की व्यवस्था काम नहीं कर सकती। प्रदेश नेतृत्व को जिला, ब्लॉक और बूथ तक जवाबदेही तय करनी होगी। निष्क्रिय पदाधिकारियों को हटाना, सक्रिय कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देना और विधानसभा स्तर पर राजनीतिक तैयारी अभी से शुरू करना जरूरी होगा। यही वजह है कि कांग्रेस की समस्या सिर्फ गुटबाजी नहीं, बल्कि उसका कमांड सिस्टम भी है। दिल्ली से लखनऊ, लखनऊ से जिला, जिला से ब्लॉक और ब्लॉक से बूथ तक फैसला कितनी तेजी से पहुंचता है और उस पर अमल कौन कराता है—यही संगठन की वास्तविक ताकत है।

प्रदेश अध्यक्ष बदलना आसान है, लेकिन संगठन की कार्यशैली बदलना कठिन। यदि प्रदेश अध्यक्ष नया हो जाए, लेकिन जिलों में पुराने समीकरण चलते रहें; जिलाध्यक्ष बदल जाए, लेकिन बूथ पर कार्यकर्ता न पहुंचे; बैठकें होती रहें, लेकिन उनका परिणाम जमीन पर दिखाई न दे—तो फेरबदल केवल संगठनात्मक पैकेजिंग बनकर रह जाएगा। कांग्रेस को अपनी दूसरी पंक्ति के नेतृत्व पर भी ध्यान देना होगा। केवल कुछ बड़े नेताओं के सहारे 403 सीटों का चुनाव नहीं लड़ा जा सकता। प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में स्थानीय नेतृत्व, कार्यकर्ता नेटवर्क और लगातार जनसंपर्क जरूरी है। टिकट के दावेदारों की राजनीतिक सक्रियता का मूल्यांकन भी चुनाव से पहले होना चाहिए, न कि केवल नामांकन के समय। सपा के साथ संबंध भी कांग्रेस की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होंगे। 2024 में गठबंधन ने दोनों दलों को राजनीतिक लाभ दिया। लेकिन विधानसभा चुनाव में सीटों का स्थानीय गणित कहीं अधिक जटिल होता है। इसलिए कांग्रेस को एक तरफ गठबंधन की संभावनाओं पर काम करना होगा और दूसरी तरफ अपना स्वतंत्र संगठन भी मजबूत करना होगा। गठबंधन राजनीतिक अवसर दे सकता है, लेकिन बूथ संगठन ही उस अवसर को स्थायी राजनीतिक आधार में बदलता है। भाजपा के संदर्भ में भी 2024 का चुनाव महत्वपूर्ण संकेत देता है। उत्तर प्रदेश में 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा 33 सीटों पर रही, जबकि कांग्रेस छह और समाजवादी पार्टी 37 सीटों पर जीती। लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों के आंकड़ों को सीधे जोड़कर 2027 का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। 2022 में विधानसभा का समीकरण अलग था। इसलिए कांग्रेस के लिए भी 2024 की सफलता को भविष्य की गारंटी मानना उतना ही जोखिमपूर्ण होगा।

पंजाब में परगट सिंह की नियुक्ति भी संगठनात्मक पुनर्गठन का हिस्सा है। उनके सामने राज्य में नेतृत्व के विभिन्न केंद्रों को एक साझा रणनीति में रखने की चुनौती होगी। हाल के महीनों में पंजाब कांग्रेस के नेतृत्व को लेकर अंदरूनी खींचतान की खबरें भी सामने आई थीं। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से कांग्रेस के लिए यूपी का दांव कहीं अधिक बड़ा है। उत्तर प्रदेश में अब सबसे जरूरी है कि पार्टी चुनाव की घोषणा का इंतजार न करे। विधानसभा-वार संगठन की समीक्षा, जिला और ब्लॉक स्तर पर जवाबदेही, बूथ समितियों का पुनर्गठन, स्थानीय मुद्दों पर लगातार आंदोलन और संभावित उम्मीदवारों की समय रहते पहचान—इन सबकी शुरुआत अभी से करनी होगी। कांग्रेस ने यूपी में चेहरा बदल दिया है। अब उसे कार्यशैली और कमांड सिस्टम बदलने की परीक्षा पास करनी होगी। 2024 ने पार्टी को राजनीतिक अवसर दिया है, लेकिन 2027 में वही अवसर कितना संगठनात्मक आधार बनता है, इसकी कसौटी 403 विधानसभा क्षेत्रों में होगी।

आखिरकार सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस के पास प्रदेश अध्यक्ष कौन है। सवाल यह है कि क्या उसके पास हर विधानसभा क्षेत्र में लड़ने वाला संगठन है? अगर इसका जवाब मजबूत हुआ तो नया नेतृत्व अपनी भूमिका साबित कर सकता है। अगर जवाब कमजोर रहा तो केवल पदों का फेरबदल कांग्रेस की पुरानी संगठनात्मक समस्या का समाधान नहीं कर पाएगा। यूपी में कांग्रेस की अग्निपरीक्षा इसलिए किसी एक नेता की नहीं, बल्कि नेतृत्व, संगठन, कमांड सिस्टम और गठबंधन—चारों की संयुक्त परीक्षा है।

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