देश भर से आता वोट चोरी का सबूत , सरकार मस्त और आंदोलित जनता —

भारतीय लोकतंत्र में चुनावी शुचिता एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। जहां एक ओर सजग नागरिक और विपक्षी दल प्रक्रिया को शत-प्रतिशत संदेहरहित और पारदर्शी बनाने के लिए निरंतर मांगें और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते रहते हैं, वहीं दूसरी ओर देश की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था ने बार-बार यह रेखांकित किया है कि भारत की चुनावी प्रणाली पूरी दुनिया में सबसे सुरक्षित और विश्वसनीय प्रणालियों में से एक है।

इस समय भारत में चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) तथा वीवीपीएटी (VVPAT) की विश्वसनीयता को लेकर बहस छिड़ी हुई है। विपक्ष के नेताओं, विभिन्न नागरिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा समय-समय पर मतदान और मतगणना प्रक्रिया में गड़बड़ियों के आरोप लगाए जाते रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और सरकार का हमेशा से यह स्पष्ट और दृढ़ रुख रहा है कि देश की चुनावी प्रणाली पूरी तरह से सुरक्षित, पारदर्शी और त्रुटिहीन है। चुनावी पारदर्शिता की मांग करने वाले कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों का मुख्य ध्यान ईवीएम की तकनीकी सुरक्षा और वीवीपीएटी पर्चियों के मिलान पर केंद्रित रहा है। नागरिक संगठनों और विपक्षी दलों द्वारा लगातार यह मांग उठाई जाती रही है कि स्वतंत्र सत्यापन सुनिश्चित करने के लिए सभी वीवीपीएटी पर्चियों की गणना की जानी चाहिए। वर्तमान व्यवस्था के तहत प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में केवल पांच यादृच्छिक (रैंडम) रूप से चुने गए मतदान केंद्रों की पर्चियों का ही मिलान ईवीएम के मतों से किया जाता है। कई मौकों पर सामाजिक संगठनों ने रैलियों और संगोष्ठियों के माध्यम से यह चिंता व्यक्त की है कि मतदाता को यह पूरी तरह से आश्वस्त होने का अधिकार होना चाहिए कि उसका वोट उसी उम्मीदवार को गया है जिसे उसने दिया है। इन समूहों का तर्क है कि आधुनिक तकनीक में हेरफेर की सैद्धांतिक संभावनाओं को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, इसलिए सुरक्षा के अतिरिक्त उपाय किए जाने चाहिए।

भारत सरकार और निर्वाचन आयोग ने इन सभी आशंकाओं और आरोपों को बार-बार सिरे से खारिज किया है और देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर जनता के विश्वास को बनाए रखने के लिए कई मजबूत तर्क और तथ्य पेश किए हैं। निर्वाचन आयोग के अनुसार, भारत में इस्तेमाल होने वाली ईवीएम पूरी तरह से ‘स्टैंडअलोन’ (Standalone) मशीनें हैं। इसका अर्थ यह है कि ये मशीनें किसी भी इंटरनेट, वाई-फाई, ब्लूटूथ या बाहरी नेटवर्क से जुड़ी नहीं होती हैं। इंटरनेट कनेक्टिविटी न होने के कारण इन्हें दुनिया के किसी भी कोने से हैक या रिमोट कंट्रोल नहीं किया जा सकता। मशीनों के निर्माण से लेकर मतदान के दिन तक एक अत्यंत कड़ी और पारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन किया जाता है। मतदान से पहले सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में ‘मॉक पोल’ (छद्म मतदान) कराया जाता है ताकि उनकी संतुष्टि सुनिश्चित की जा सके। इसके अलावा, मशीनों को ले जाने और सुरक्षित रखने के लिए त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरे और स्ट्रांग रूम की व्यवस्था की जाती है, जिनकी निगरानी सीसीटीवी कैमरों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों द्वारा की जाती है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी ईवीएम की विश्वसनीयता को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए वर्तमान प्रणाली पर भरोसा जताया है। न्यायालय ने अपने निर्णयों में स्पष्ट किया है कि बिना किसी ठोस और प्रामाणिक साक्ष्य के केवल आशंकाओं के आधार पर पूरी चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाना उचित नहीं है। अदालत ने चुनाव आयोग द्वारा अपनाई जाने वाली सुरक्षा प्रक्रियाओं को पर्याप्त माना है।

भारतीय लोकतंत्र में चुनावी शुचिता एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। जहां एक ओर सजग नागरिक और विपक्षी दल प्रक्रिया को शत-प्रतिशत संदेहरहित और पारदर्शी बनाने के लिए निरंतर मांगें और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते रहते हैं, वहीं दूसरी ओर देश की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था ने बार-बार यह रेखांकित किया है कि भारत की चुनावी प्रणाली पूरी दुनिया में सबसे सुरक्षित और विश्वसनीय प्रणालियों में से एक है। लोकतंत्र की मजबूती इसी बात में है कि संस्थाओं की विश्वसनीयता भी बनी रहे और जनता के मन में उठने वाले हर तार्किक सवाल का समाधान भी पारदर्शी तरीके से होता रहे।

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