डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़, हरदा, मध्य प्रदेश

बुझ गया आज सितारा तो बताओ लोगो!
फ़िर अंधेरे में उजाला ही नहीं होने वाला।
फ़िर सर-ए-दश्त तमाशा सा कहां देखोगे,
हम सा तमाशाई,दूजा नहीं फ़िर आने वाला।
हमने दुनिया को बहुत ग़ौर से देखा है, यहां,
अब किसी पर भी यक़ीन नहीं होने वाला।
आज जो शख़्स बिछड़ता है हमारी सूरत,
फ़िर वो गलियों में लौट के नहीं आने वाला।
कट ही जाएगी ये सदियों की, मुसफ़त भी,
रास्ता ज़िंदगी का तन्हा नहीं कटने वाला।
धूप में जलते हुए पेड़ों से जाकर पूछो,
बाप ज़ुबान से कुछ नहीं कहने वाला।
गिर जाओ अगर ख़ुद ही उठ भी जाना,
कोई भी नहीं यहां गिरते को उठाने वाला।
अपना मेयार बना लेंगे हम ख़ुद “मुश्ताक़”,
कोई हम पर मुसल्लत तो नहीं होने वाला।




