“मूरख हृदय न चेत जौ गुरु मिले विरंचि सम।”
“फूलहिं फलहिं न बेंत जदपि सुधा बरसे जलद।”
गोस्वामी तुलसीदास जी

देश में जब-जब धर्म के नाम पर पाखंड, अंधविश्वास और व्यापार का बोलबाला बढ़ा है, तब-तब व्यंग्य और कटाक्ष ने समाज को आईना दिखाने का काम किया है। आज सोशल मीडिया से लेकर बौद्धिक गलियारों तक एक नए नारे की गूंज सुनाई दे रही है”बोलो बाबा झोलरदास की जय!” पहली बार सुनने में यह किसी नए धार्मिक आंदोलन या किसी नए अवतारी पुरुष का जयकारा लग सकता है, लेकिन हकीकत में यह आधुनिक युग के स्वघोषित बाबाओं, ढोंगियों और धर्म को धंधा बना चुके पाखंडियों के मुंह पर एक करारा तमाचा है। दरअसल, यह पूरा मामला तब सुर्खियों में आया जब देश के प्रबुद्ध और संवेदनशील तबके ने धर्म के नाम पर जनता को ठगने वाले ‘बाबाओं’ के खिलाफ एक अनोखा मोर्चा खोल दिया। इस मोर्चे के तहत एक नए ‘झोलर संप्रदाय’ के प्रवर्तन (शुरुआत) की घोषणा की गई है। यह संप्रदाय किसी प्राचीन ग्रंथ या रहस्यमयी गुफा से नहीं निकला, बल्कि इसके पीछे की कहानी बेहद दिलचस्प और प्रतीकात्मक है। इस संप्रदाय के प्रणेता का कहना है कि उन्हें इस नए पंथ की स्थापना का ‘परम ज्ञान’ महात्मा बुद्ध की तरह किसी बोधि वृक्ष के नीचे नहीं, बल्कि आज सुबह बैंगन की सब्जी खाते समय प्राप्त हुआ। व्यंग्य के इस अनूठे तीर से यह साफ करने की कोशिश की गई है कि आज के दौर में जिस तरह कोई भी व्यक्ति रातों-रात चमत्कारी बाबा बनकर बैठ जाता है और अपने झूठे ज्ञान का ढोल पीटने लगता है, उसी तरह इस ‘झोलर संप्रदाय’ की नींव भी रसोई घर में पकी एक साधारण सी बैंगन की सब्जी पर टिकी है। चूंकि इस संप्रदाय की प्रेरणा बैंगन की सब्जी से मिली है, इसलिए इसके नियमावली में एक बेहद अनिवार्य शर्त जोड़ी गई है। सभी झोलर मतावलंबियों के लिए बैंगन खाना अनिवार्य होगा। यह नियम उन कथित धार्मिक गुरुओं पर सीधा प्रहार है जो खान-पान, पहनावे और रहन-सहन के नाम पर समाज में भेदभाव और पाखंड की दीवारें खड़ी करते हैं।

इस नए संप्रदाय के केंद्र में हैं,देश के झल्ले और झल्लियां। आम बोलचाल में ‘झल्ला’ या ‘झल्ली’ उसे कहा जाता है जो दुनियादारी की चालाकियों से दूर, अपनी ही धुन में मस्त और थोड़ा अल्हड़ स्वभाव का हो। आज के दौर में जब पूरा देश जाति, भाषा, प्रांत और संप्रदाय के खतरनाक पचड़ों में उलझा हुआ है, तब यह ‘झल्ले-झल्लियों’ का वर्ग ही है जो इन सब संकीर्णताओं से कोसों दूर है। झोलर संप्रदाय का दावा है कि ये लोग किसी नफरत की राजनीति या धार्मिक कट्टरता का हिस्सा नहीं बनते। उन्हें न तो किसी की भाषा से परहेज है और न ही किसी के प्रांत से। वे बस अपनी सादगी और फक्कड़पन में जीते हैं। यही कारण है कि इस नए संप्रदाय के अनुयायी सिर्फ और सिर्फ यही ‘झल्ले-झल्ली’ होंगे। यह घोषणा इस बात का संकेत है कि आने वाला युग इन्हीं सीधे-सरल और पाखंड-मुक्त लोगों का होने वाला है। इस विमर्श में कवि कुल शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी का भी संदर्भ लिया गया है। तुलसीदास जी ने सदियों पहले वैष्णव और शैव जैसे विरोधी मतों को एक मंच पर लाने का ऐतिहासिक और गुरुतर कार्य किया था। उन्होंने समाज की इसी जड़ता और अंधभक्ति पर चोट करते हुए रामचरितमानस में लिखा था:
“मूरख हृदय न चेत जौ गुरु मिले विरंचि सम।”
“फूलहिं फलहिं न बेंत जदपि सुधा बरसे जलद।”
इस चौपाई का सीधा और सटीक अर्थ यह है कि मूर्ख व्यक्ति के हृदय में कभी चेतना या ज्ञान का संचार नहीं हो सकता, भले ही उसे ब्रह्मा (विरंचि) के समान साक्षात गुरु ही क्यों न मिल जाए। ठीक वैसे ही जैसे बेंत के पौधे पर कभी फूल और फल नहीं आते, चाहे बादलों से अमृत की वर्षा (सुधा बरसे जलद) ही क्यों न हो रही हो। आज के संदर्भ में यह चौपाई उन अंधभक्तों पर पूरी तरह सटीक बैठती है, जो अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर इन ‘झोलरदास’ जैसे ढोंगी बाबाओं के पीछे भाग रहे हैं। समाज का एक बड़ा हिस्सा इन धंधेबाजों के बुने जाल में इस कदर फंस चुका है कि उनके सामने चाहे जितने भी प्रमाण रख दिए जाएं, उनकी आंखें नहीं खुलतीं। वे इन बाबाओं के झूठे चमत्कारों और ढोंग की सूखी ज़मीन पर आस्था के फूल खिलाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं।

आज देश के कोने-कोने में आलीशान आश्रम बनाकर बैठे ये कथित संत आस्था के नाम पर अरबों-खरबों का साम्राज्य चला रहे हैं। जड़ी-बूटी बेचने से लेकर, कलाई के धागे और मानसिक शांति के नाम पर किए जाने वाले टोटकों तक सब कुछ एक सोची-समझी व्यावसायिक रणनीति का हिस्सा है। भोली-भाली जनता, जो अक्सर जीवन के दुखों, बीमारियों और आर्थिक तंगहाली से परेशान होती है, इन ढोंगियों के जाल में आसानी से फंस जाती है। ‘झोलर संप्रदाय’ का यह पूरा विचार इसी कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। यह समाज को यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम कब तक इन आस्था के व्यापारियों के हाथों लुटते रहेंगे?”तो मेरे देश के प्यारे झल्ली-झल्लियों, तैयार हो जाओ नए झोलर संप्रदाय के लिए!” यह आह्वान भले ही एक तीखा व्यंग्य हो, लेकिन इसके मायने बेहद गहरे हैं। यह समाज को अंधभक्ति से बाहर निकलकर तार्किक और विवेकशील बनने का संदेश देता है। जब तक समाज में अंधविश्वास रहेगा, तब तक ‘बाबा झोलरदास’ जैसे धंधेबाज पनपते रहेंगे। अब समय आ गया है कि बैंगन की सब्जी जैसी साधारण और वास्तविक चीज़ों की अहमियत को समझा जाए और धर्म के नाम पर परोसी जा रही ढोंग की इस थाली को पूरी तरह से नकार दिया जाए।



