एक जीवंत लोकतंत्र में जनता को सरकार से सवाल पूछने और अपनी देशभक्ति को अपनी मर्जी से अभिव्यक्त करने की पूरी आजादी होनी चाहिए। सरकार को अघोषित आपातकाल जैसी इस तानाशाही प्रवृत्ति को तुरंत छोड़ना होगा, अन्यथा इतिहास गवाह है कि जनता जब अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती है, तो बड़े से बड़े सत्ताधीशों का अहंकार टूट जाता है।

देश में जहां एक तरफ ‘हर घर तिरंगा’ अभियान के तहत हर नागरिक को अपने घर, दुकान और दफ्तरों पर शान से राष्ट्रध्वज फहराने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली के ऐतिहासिक सेंट्रल पार्क में तिरंगा लहराने पर पुलिसिया कार्रवाई होना सीधे तौर पर लोकतंत्र की आत्मा पर आघात है। आम नागरिकों द्वारा अपनी देशभक्ति का इजहार करने पर मुकदमा दर्ज होना या हिरासत में लिया जाना यह गंभीर सवाल खड़ा करता है क्या देश में अघोषित इमरजेंसी लागू हो चुकी है। सरकार एक तरफ राष्ट्रवाद और देशभक्ति को जन-आंदोलन बनाने का दावा करती है। विज्ञापनों, रैलियों और सरकारी अपीलों के जरिए करोड़ों रुपये खर्च करके लोगों से तिरंगा फहराने को कहा जाता है। लेकिन जब देश के युवा, छात्र या जागरूक नागरिक किसी सार्वजनिक स्थल जैसे सेंट्रल पार्क में शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होकर तिरंगा लहराते हैं, तो उन्हें कानून-व्यवस्था के लिए खतरा मान लिया जाता है।यह दोहरा मापदंड समझ से परे है। यदि हर घर तिरंगा फहराना गौरव की बात है, तो देश के सार्वजनिक पार्कों में तिरंगा लहराना अपराध कैसे हो गया? क्या तिरंगा फहराने का अधिकार भी अब इस बात से तय होगा कि फहराने वाला व्यक्ति सरकार का समर्थक है या विरोधी? अक्सर ऐसी कार्रवाइयों के पीछे धारा 144 लागू होने या सुरक्षा कारणों का हवाला दिया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि शांतिपूर्ण ढंग से, बिना किसी हिंसा या नफरती नारेबाजी के, केवल राष्ट्रध्वज हाथ में लेकर खड़े होना किस कानून के तहत अपराध की श्रेणी में आता है?

जब सत्ताधारी दल या उनसे जुड़े संगठन बड़े-बड़े जुलूस निकालते हैं, तब सुरक्षा और नियम आड़े नहीं आते। परंतु जब आम जनता या प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को लेकर या केवल एक प्रतीक के रूप में तिरंगे का सहारा लेते हैं, तो प्रशासन सक्रिय हो जाता है। यह रवैया साफ तौर पर दर्शाता है कि सत्ता अब नागरिकों की देशभक्ति से नहीं, बल्कि उनके एकजुट होने और सवाल पूछने की ताकत से डर रही है। 1975 की आधिकारिक इमरजेंसी और आज के दौर में बुनियादी अंतर सिर्फ इतना है कि आज कागजों पर आपातकाल की घोषणा नहीं की गई है। लेकिन जमीन पर स्थितियां उससे जुदा नहीं हैं, शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को राष्ट्रविरोधी या कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बताकर कुचल दिया जाता है। नागरिकों को यह डर सताने लगा है कि उनका कौन सा कदम प्रशासन को नाराज कर देगा और उन पर पुलिसिया कार्रवाई हो जाएगी। पुलिस और जांच एजेंसियां निष्पक्ष काम करने के बजाय सत्ता के इशारे पर विपक्ष और असहमति जताने वाले नागरिकों को निशाना बना रही हैं। जब एक आम नागरिक अपने ही देश की राजधानी के दिल (सेंट्रल पार्क) में तिरंगा हाथ में लेकर खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे, तो यह मान लेना गलत नहीं होगा कि लोकतांत्रिक मूल्य वेंटिलेटर पर हैं। तिरंगा किसी सरकार की बपौती नहीं है। सरकार और प्रशासन को यह याद रखने की जरूरत है कि तिरंगा किसी राजनीतिक दल या चुनी हुई सरकार की निजी संपत्ति नहीं है। यह देश के 140 करोड़ नागरिकों का है। इसे फहराने का अधिकार हर उस व्यक्ति को है जो इस देश के संविधान में विश्वास रखता है।

यदि सरकार को शांतिपूर्ण ढंग से तिरंगा लहराते नागरिकों में ‘अपराधी’ नजर आने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि सत्ता अपनी राह से भटक चुकी है। दमन और खौफ के दम पर राष्ट्रवाद की परिभाषा नहीं लिखी जा सकती। सेंट्रल पार्क की घटना कोई मामूली कानूनी मामला नहीं है, बल्कि यह हमारे सामूहिक लोकतांत्रिक स्वास्थ्य का लिटमस टेस्ट है। यदि आज हम इस पुलिसिया कार्रवाई पर चुप रहे, तो कल अपने घरों की छतों पर तिरंगा फहराने के लिए भी सरकार से परमिशन लेनी पड़ सकती है। एक जीवंत लोकतंत्र में जनता को सरकार से सवाल पूछने और अपनी देशभक्ति को अपनी मर्जी से अभिव्यक्त करने की पूरी आजादी होनी चाहिए। सरकार को अघोषित आपातकाल जैसी इस तानाशाही प्रवृत्ति को तुरंत छोड़ना होगा, अन्यथा इतिहास गवाह है कि जनता जब अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती है, तो बड़े से बड़े सत्ताधीशों का अहंकार टूट जाता है।



