हर शहर, हर गाँव में अंकिता भण्डारी –? सत्ता का काला चेहरा, कहाँ है शासन-प्रशासन?

अंकिता भण्डारी सिर्फ एक नाम नहीं। वह हर उस बेटी की आवाज है जो शक्ति के आगे झुकने से इनकार करती है। सत्ता का काला चेहरा तब तक साफ नहीं होगा जब तक प्रशासन सचमुच आम आदमी के पक्ष में खड़ा न हो।

सितंबर 2022 में उत्तराखंड के ऋषिकेश के पास वनांतरा रिजॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करने वाली 19 वर्षीय अंकिता भण्डारी की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। जबरन “अतिरिक्त सेवाएं” देने से इनकार करने के बाद उसकी लाश चिल्ला नहर से बरामद हुई। चार साल बीत चुके हैं। तीन आरोपियों पुलकित आर्य, सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को 30 मई 2025 को कोटद्वार की अदालत ने उम्रकैद की सजा सुना दी। पुलिस कहती है कि 24 घंटे में गिरफ्तारी, 88 दिन में 500 पन्नों की चार्जशीट, महिला-नेतृत्व वाली एसआईटी और मजबूत अभियोजन से न्याय मिल गया। दोषी जेल में हैं। परिवार को 25 लाख रुपये की मदद और नौकरियां दी गईं। फिर भी अंकिता के माता-पिता आज भी सड़कों पर हैं। इंडिया गेट पर धरना, सीबीआई जांच पूरी होने तक एक नेता की राज्यपाल नियुक्ति रोकने की मांग, और सवाल कहाँ है असली शासन-प्रशासन? यह सिर्फ एक हत्याकांड नहीं है। यह सत्ता के उस काले चेहरे का आईना है जो हर शहर, हर गाँव में अंकिता जैसी बेटियों के साथ खेलता है। प्रभाव, पैसा और राजनीतिक कनेक्शन जब एक तरफ खड़े हो जाते हैं तो आम आदमी की बेटी की लाश नहर में तैरती रह जाती है और सवाल अधर में लटके रह जाते हैं। पुलकित आर्य पूर्व भाजपा नेता के बेटे थे। शुरू से ही VIP कोण की चर्चा चली। परिवार कहता रहा कि कोई बड़ा नाम भी शामिल है। ऑडियो-वीडियो क्लिप सामने आए, “गट्टू” या VIP का जिक्र हुआ। कुछ नेताओं के नाम जुड़ने लगे। सच्चाई क्या है, यह सीबीआई तय करेगी। लेकिन सवाल यह है कि जब तक जांच अधूरी है, तब तक संवैधानिक पदों पर नियुक्तियां कैसे हो जाती हैं? परिवार का भरोसा क्यों नहीं बन पाता? शासन-प्रशासन का दावा है कि तेज कार्रवाई हुई। गिरफ्तारी हुई, सजा हुई। यह सराहनीय है। कई मामलों में तो आरोपी सालों तक बाहर घूमते रहते हैं। लेकिन अंकिता केस में परिवार आज भी पूरी पारदर्शिता मांग रहा है। तीन बार वकील बदले गए, सीबीआई जांच की सिफारिश की गई ये कदम उठाए गए। फिर भी जब माता-पिता न्याय की गुहार लेकर दिल्ली पहुंचते हैं तो हिरासत में लिए जाते हैं। क्या यह प्रशासन की संवेदनशीलता है या दबाव? हर शहर-गांव में ऐसी अंकिताएं हैं जो रिसॉर्ट, होटल, ऑफिस या खेत में काम करती हैं। जब कोई शक्तिशाली व्यक्ति अपनी मर्जी थोपता है और इंकार पर हिंसा होती है, तो व्यवस्था कहाँ खड़ी होती है? पुलिस, प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व सबकी परीक्षा होती है।

सत्ता का काला चेहरा सिर्फ एक पार्टी या व्यक्ति तक सीमित नहीं। यह सिस्टम का हिस्सा बन चुका है। जब कोई प्रभावशाली आरोपी होता है तो जांच में देरी, सबूतों की हेराफेरी या राजनीतिक संरक्षण के आरोप लगते हैं। जब सजा हो भी जाती है तो परिवार को लगता है कि असली साजिश उजागर नहीं हुई। अंकिता केस में उम्रकैद हुई, यह तथ्य है। लेकिन VIP एंगल पर अभी भी सवाल बाकी हैं। ऑडियो की प्रामाणिकता विवादित है, आरोप खारिज भी किए गए हैं। फिर भी जब परिवार राष्ट्रपति से अपील करता है कि जांच पूरी होने तक नियुक्ति रोकी जाए, तो राजनीतिक दलों का खेल शुरू हो जाता है। विपक्ष मुद्दा बनाता है, सत्ता पक्ष उपलब्धियां गिनाता है। बीच में फंस जाती है एक मां-बाप की पीड़ा। कहाँ है शासन-प्रशासन? वह प्रशासन जो सिर्फ गिरफ्तारी और चार्जशीट तक सीमित न रहे, बल्कि पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करे। जो परिवार के भरोसे को मजबूत करे, न कि धरने पर बैठे अभिभावकों को हिरासत में ले। जो महिलाओं की सुरक्षा को सिर्फ नारे तक न रखे। उत्तराखंड जैसे राज्य में पर्यटन और रिजॉर्ट उद्योग बड़ा है। युवा लड़कियां काम के लिए निकलती हैं। अगर सिस्टम उन्हें सुरक्षा नहीं दे पाता तो “बेटी बचाओ” के नारे खोखले हो जाते हैं। हर शहर, हर गांव में अंकिता भण्डारी का नाम गूंजता है क्योंकि यह कोई अलग घटना नहीं। यह उन सैकड़ों मामलों का प्रतीक है जहां शक्तिशाली लोग कानून को अपनी मुट्ठी में समझते हैं। न्याय सिर्फ सजा से नहीं होता। न्याय तब होता है जब सच्चाई सामने आए, जब कोई भी प्रभावशाली व्यक्ति जांच से ऊपर न लगे, जब परिवार को लगे कि व्यवस्था उनके साथ है। अंकिता की हत्या के चार साल बाद भी अगर माता-पिता को सड़क पर उतरना पड़ रहा है तो यह शासन-प्रशासन की नाकामी है। राजनीतिक नियुक्तियां जब विवादित नामों से जुड़ती हैं तो संदेह और गहरा होता है। सीबीआई जांच चल रही है। इसे निष्पक्ष, तेज और पारदर्शी तरीके से पूरा किया जाए। दोषियों को मिली उम्रकैद बरकरार रहे। लेकिन अधूरे सवालों को दबाने की कोशिश न हो।

अंकिता भण्डारी सिर्फ एक नाम नहीं। वह हर उस बेटी की आवाज है जो शक्ति के आगे झुकने से इनकार करती है। सत्ता का काला चेहरा तब तक साफ नहीं होगा जब तक प्रशासन सचमुच आम आदमी के पक्ष में खड़ा न हो। हर शहर, हर गांव में यह सवाल गूंजना चाहिए कहाँ है शासन-प्रशासन? कब तक प्रभावशाली लोग कानून से ऊपर रहेंगे? अंकिता की मौत व्यर्थ न जाए। न्याय की लड़ाई अधूरी न रहे। क्योंकि अगर एक अंकिता को पूरा न्याय नहीं मिला तो कल किसी और शहर, किसी और गांव में फिर कोई अंकिता खड़ी होगी और फिर वही सवाल।

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