’24 घंटे हो गए मोदी जी, आ जाइए, डरिए मत’, आप झूठ बोलते हैं, चुनौती स्वीकार करिए ? पब्लिक क्या चाहती है,,,,

भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती इसके जीवंत और मुखर होने में है। विपक्ष का आक्रामक होना और सरकार को चुनौती देना इस जीवंतता का प्रमाण है।

भारतीय राजनीति इस समय एक नए और बेहद आक्रामक दौर से गुजर रही है। संसद से लेकर सोशल मीडिया और सड़कों तक, बयानों की धार इतनी तीखी हो चुकी है कि राजनीतिक मर्यादा की सीमाएं लगातार धुंधली हो रही हैं। हाल ही में विपक्ष के नेताओं द्वारा सीधे प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए दिए गए तीखे बयान—”24 घंटे हो गए मोदी जी, आ जाइए, डरिए मत… आप झूठ बोलते हैं, चुनौती स्वीकार करिए”—ने देश के राजनीतिक पारे को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। एक तरफ विपक्ष इसे जनहित के मुद्दों पर सत्ता को घेरने का आक्रामक और साहसिक कदम बता रहा है, तो दूसरी तरफ सत्तापक्ष इसे देश के सर्वोच्च लोकतांत्रिक पद की गरिमा को गिराने वाला और हताशा से उपजा बयान करार दे रहा है। लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा और बुनियादी सवाल यह है कि इस हाई-ड्रामे और आर-पार की लड़ाई के बीच देश की ‘पब्लिक’ यानी आम जनता क्या चाहती है? क्या जनता को इन व्यक्तिगत हमलों में रस आ रहा है, या उसकी जरूरतें कुछ और हैं? विपक्ष का यह तेवर साफ दिखाता है कि वह अब रक्षात्मक मोड से पूरी तरह बाहर आ चुका है। सीधे प्रधानमंत्री को बहस या चुनौती के लिए ललकारना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। विपक्ष का तर्क है कि देश के महत्वपूर्ण मुद्दों, जैसे—रोजगार, आर्थिक असमानता, सीमा सुरक्षा, या राष्ट्रीय नीतियों पर प्रधानमंत्री को सीधे संसद या सार्वजनिक मंच पर आकर जवाब देना चाहिए। जब विपक्ष कहता है कि “चुनौती स्वीकार करिए”, तो वह जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश करता है कि सरकार सीधे और तीखे सवालों से बच रही है। लोकतंत्र में जवाबदेही तय करना विपक्ष का मुख्य कर्तव्य है और इसके लिए कड़े शब्दों का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है। लेकिन यहाँ एक महीन रेखा है। जब यह आक्रामकता व्यक्तिगत आरोपों और “डरने” जैसे शब्दों तक सीमित हो जाती है, तो मूल मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। बहस इस बात पर नहीं होती कि नीति में क्या कमी है, बल्कि इस बात पर होने लगती है कि किसने किसको क्या कहा।

प्रधानमंत्री और सत्ताधारी दल के लिए इस तरह के सीधे हमले नई चुनौती नहीं हैं। भाजपा और सरकार अक्सर ऐसे बयानों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और उनकी छवि पर एक और व्यक्तिगत हमले के रूप में पेश करती है। सत्तापक्ष का कहना है कि विपक्ष के पास कोई ठोस वैकल्पिक नीति या विजन नहीं है, इसलिए वे केवल सुर्खियां बटोरने और ध्यान भटकाने के लिए इस तरह की भाषा का उपयोग कर रहे हैं। सरकार का दावा है कि प्रधानमंत्री का काम और उनकी नीतियां ही उनके जवाब हैं, और जनता ने बार-बार चुनावों के माध्यम से विपक्ष के इन आरोपों को खारिज किया है। सत्तापक्ष का यह भी तर्क है कि इस तरह के बयानों से देश की राजनीतिक संस्कृति खराब होती है और इससे लोकतंत्र मजबूत नहीं, बल्कि कमजोर होता है।

नेताओं की इस तीखी बयानबाजी और 24-घंटे की चुनौती के बीच, देश की जनता मूक दर्शक बनकर सब देख रही है। लेकिन जनता की प्राथमिकताएं इन राजनीतिक अखाड़ों से बिल्कुल अलग हैं। पब्लिक वास्तव में क्या चाहती है, जनता यह नहीं देखना चाहती कि कौन सा नेता ज्यादा तेज चिल्ला सकता है या कौन बेहतर तंज कस सकता है। पब्लिक चाहती है कि संसद और सार्वजनिक मंचों पर देश की बुनियादी समस्याओं पर सार्थक बहस हो। महंगाई कम कैसे होगी? युवाओं को पक्के रोजगार कैसे मिलेंगे? किसानों की आय कैसे बढ़ेगी? जनता को आरोपों के बजाय इन सवालों के ठोस और व्यावहारिक समाधान चाहिए। आम नागरिक आज भी देश के प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेताओं, दोनों के पदों का सम्मान करता है। जनता चाहती है कि नेता आपस में लड़ते समय भी भाषाई मर्यादा और लोकतांत्रिक शिष्टाचार का पालन करें। जब राजनीति का स्तर व्यक्तिगत कीचड़ उछालने तक गिर जाता है, तो आम जनता का पूरी राजनीतिक व्यवस्था से भरोसा उठने लगता है। जनता निश्चित रूप से चाहती है कि सरकार उनके सवालों का जवाब दे। जब विपक्ष कोई गंभीर मुद्दा उठाता है, तो जनता उम्मीद करती है कि सरकार पूरी पारदर्शिता के साथ सामने आकर आंकड़े और तथ्य रखे। लेकिन साथ ही, जनता यह भी चाहती है कि विपक्ष केवल विरोध के लिए विरोध न करे, बल्कि सरकार की कमियों को उजागर करते हुए खुद एक बेहतर विकल्प पेश करे। एक आम आदमी के लिए सबसे बड़ी चुनौती सुबह उठकर अपने परिवार की आजीविका चलाना, बच्चों को अच्छी शिक्षा देना और बीमार होने पर बेहतर इलाज पाना है। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन सा नेता 24 घंटे से गायब है या कौन चुनौती दे रहा है। उसे फर्क पड़ता है तो इस बात से कि उसके इलाके की सड़कें कैसी हैं, अस्पताल में दवाइयां हैं या नहीं, और उसके घर में साफ पानी आ रहा है या नहीं।

भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती इसके जीवंत और मुखर होने में है। विपक्ष का आक्रामक होना और सरकार को चुनौती देना इस जीवंतता का प्रमाण है। लेकिन जब यह चुनौती केवल राजनीतिक लाभ, सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने और एक-दूसरे को नीचा दिखाने का माध्यम बन जाए, तो यह देश के समय और संसाधनों की बर्बादी है। नेताओं को यह समझना होगा कि जनता उन्हें सिर्फ इसलिए नहीं चुनती कि वे टीवी कैमरों के सामने आकर एक-दूसरे को ललकारें। जनता उन्हें अपनी किस्मत बदलने और देश को आगे ले जाने के लिए चुनती है। “डरिए मत” और “झूठ बोलते हैं” जैसे नारों से आगे बढ़कर जब तक राजनीति वास्तव में जनता के जीवन को बेहतर बनाने के मुद्दों पर केंद्रित नहीं होगी, तब तक यह पूरी कवायद केवल एक राजनीतिक तमाशा बनकर रह जाएगी, जिससे ‘पब्लिक’ को कुछ हासिल होने वाला नहीं है।

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