राहुल गांधी और मोदी जी: प्यार, तकरार, बहिष्कार और टकराव

नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच का यह रिश्ता भारतीय लोकतंत्र के मौजूदा चरित्र को बयां करता है। एक तरफ जहाँ नरेंद्र मोदी देश के बहुसंख्यक वर्ग की आकांक्षाओं और एक मजबूत, आक्रामक नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं; वहीं राहुल गांधी खुद को कमजोरों, अल्पसंख्यकों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा करने वाले एक योद्धा के रूप में पेश करते हैं।

भारतीय राजनीति के आधुनिक इतिहास में अगर किन्हीं दो चेहरों ने सबसे ज्यादा ध्रुवीकरण, चर्चा और सुर्खियां बटोरी हैं, तो वे हैं—नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी। इन दोनों नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती राजनीति ने देश के लोकतांत्रिक परिदृश्य को एक नया रंग दिया है। यह कहानी सिर्फ दो व्यक्तियों की नहीं, बल्कि दो अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं, पृष्ठभूमियों और काम करने के तौर-तरीकों की है। इनके बीच के रिश्तों को चार मुख्य स्तंभों के जरिए समझा जा सकता है: प्यार, तकरार, बहिष्कार और अभूतपूर्व टकराव। यूं तो दोनों नेता एक-दूसरे के धुर विरोधी माने जाते हैं, लेकिन भारतीय राजनीति ने इनके बीच कुछ ऐसे पल भी देखे हैं जिन्हें ‘प्यार’ या राजनीतिक सहजता का नाम दिया जा सकता है। इस सिलसिले में सबसे ऐतिहासिक वाकया साल 2018 का है, जब संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान राहुल गांधी अचानक अपनी सीट से उठे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास जाकर उन्हें गले लगा लिया। वह ‘संसदीय झप्पी’ भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित दृश्यों में से एक बन गई। राहुल गांधी ने तब कहा था, “आपके मन में मेरे लिए नफरत हो सकती है, लेकिन मेरे मन में आपके लिए सिर्फ प्यार है।” इसके अलावा, विभिन्न राष्ट्रीय समारोहों, मुख्यमंत्रियों के शपथ ग्रहण या जी-20 जैसे वैश्विक मंचों पर जब भी दोनों का आमना-सामना होता है, तो औपचारिक हाथ मिलाना और एक-दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुराना यह दिखाता है कि घोर वैचारिक मतभेदों के बावजूद दोनों के भीतर एक-दूसरे के प्रति बुनियादी शिष्टाचार जीवित है। हाल के वर्षों में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी का यह कहना कि “मैं मोदी जी और भाजपा से नफरत नहीं करता, वे मेरे गुरु हैं क्योंकि वे मुझे सिखाते हैं कि क्या नहीं करना है,” भी इसी कड़वाहट रहित दृष्टिकोण को दर्शाता है।

राजनीति में तकरार होना लाजिमी है, लेकिन मोदी और राहुल की तकरार ने व्यक्तिगत आक्षेपों के नए रिकॉर्ड बनाए हैं। दोनों तरफ से एक-दूसरे की छवि को धूमिल करने के लिए शब्दों के तीखे बाण चलाए गए हैं। भाजपा और नरेंद्र मोदी ने लंबे समय तक राहुल गांधी को राजनीति में अनुभवहीन साबित करने के लिए ‘पप्पू’ या ‘शहजादा’ (वंशवाद की राजनीति पर तंज) जैसे शब्दों से नवाजा। इसके जवाब में राहुल गांधी और कांग्रेस ने ‘सूट-बूट की सरकार’, ‘चौकीदार चोर है’ और ‘मित्रकाल’ जैसे नारे देकर प्रधानमंत्री की साख पर सीधे हमले किए। यह तकरार संसद से लेकर चुनावी रैलियों तक इतनी व्यक्तिगत हो जाती है कि कई बार नीतियों पर बहस पीछे छूट जाती है और केवल इस बात पर चर्चा होती है कि किसने किस पर कितना करारा तंज कसा।

इन दोनों नेताओं के रिश्तों का तीसरा पहलू है ‘बहीष्कार’। जब तकरार हद से ज्यादा बढ़ जाती है, तो वह बहिष्कार का रूप ले लेती है। संसद के भीतर जब प्रधानमंत्री मोदी भाषण देते हैं, तो विपक्ष (जिसकी कमान अब नेता प्रतिपक्ष के रूप में राहुल गांधी के हाथों में है) अक्सर वॉकआउट या बहिष्कार का रास्ता चुनता है। इसी तरह, नए संसद भवन के उद्घाटन जैसे ऐतिहासिक मौकों पर भी कांग्रेस और राहुल गांधी की अगुवाई में विपक्ष ने कार्यक्रम का पूर्ण बहिष्कार किया था। दूसरी तरफ, जब राहुल गांधी या विपक्ष के नेता सरकार द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठकों से दूरी बनाते हैं या सरकारी समितियों का हिस्सा बनने से मना करते हैं, तो यह दिखाता है कि दोनों पक्षों के बीच संवाद के रास्ते लगभग बंद हो चुके हैं। यह बहिष्कार केवल बैठकों तक सीमित नहीं है, बल्कि एक-दूसरे के विचारों और अस्तित्व को ही सिरे से खारिज करने की राजनीतिक जिद बन चुका है। रिश्तों का सबसे खतरनाक और वर्तमान दौर है—अभूतपूर्व टकराव। अब यह लड़ाई सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि कानूनी और संस्थागत स्तर पर पहुंच चुकी है। ‘मोदी सरनेम’ वाली टिप्पणी के बाद राहुल गांधी की संसद सदस्यता का जाना और फिर सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बाद उसकी बहाली—इस टकराव का सबसे बड़ा उदाहरण था। संसद के भीतर दोनों नेताओं के बीच सीधे टकराव अब हर सत्र की मुख्य यूएसपी (USP) बन चुके हैं। राहुल गांधी जहाँ सरकार पर केंद्रीय एजेंसियों (ED, CBI) के दुरुपयोग, उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने और संविधान पर हमला करने का सीधा आरोप लगाते हैं; वहीं प्रधानमंत्री मोदी और सत्तापक्ष उन पर विदेशी धरती पर देश का अपमान करने, देश विरोधी ताकतों के साथ खड़े होने और जातिगत आधार पर देश को बांटने का आरोप लगाते हैं। यह टकराव आज के भारत की हकीकत बन चुका है, जहाँ दोनों ही पक्ष झुकने को तैयार नहीं हैं।

नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच का यह रिश्ता भारतीय लोकतंत्र के मौजूदा चरित्र को बयां करता है। एक तरफ जहाँ नरेंद्र मोदी देश के बहुसंख्यक वर्ग की आकांक्षाओं और एक मजबूत, आक्रामक नेतृत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं; वहीं राहुल गांधी खुद को कमजोरों, अल्पसंख्यकों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा करने वाले एक योद्धा के रूप में पेश करते हैं। प्यार से शुरू होकर टकराव तक पहुंचने वाली यह राजनीतिक यात्रा देश की जनता के सामने दो अलग-अलग भारत की तस्वीरें रखती है। लोकतंत्र के लिए तकरार और टकराव जरूरी हैं, लेकिन जब ये व्यक्तिगत दुश्मनी में बदल जाएं, तो देश का नुकसान होता है। जनता चाहती है कि इन दोनों शीर्ष नेताओं के बीच की तकरार निजी हमलों के बजाय देश के विकास, युवाओं के रोजगार और महंगाई जैसे असल मुद्दों पर हो, ताकि लोकतंत्र की गरिमा बनी रहे।

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