डॉ.मुश्ताक़ अहमद शाह,सहज़,हरदा,मध्य प्रदेश

अपनी ज़ुल्फ़ों को इस तरह लहरा के हवा में,
कहने लगे कि ये ही तो बादल हैं, आओ ना।
तपिश-ए-हिज़्र में जल रहा शजर-ए-जाँ कब से,
इन घटाओं को सेहन-ए-दिल पे गिराओ ना।
मुरझा न जाए कहीं गुलशन-ए-उम्मीद मेरा,
तुम ख़ुद को अब्र-ए-करम सा बरसाओ ना।
नज़रों में मय-कदे की वही कैफ़ियत है पिन्हाँ,
इन आँखों से ही सही, कोई जाम पिलाओ ना।
दुनिया की ये तल्ख़ियाँ, ये तंग-ओ-तार रास्ते,
छोड़ो भी ये मरासिम, हाथ थाम के आओ ना।
मुद्दत हुई है मुश्ताक की शब-ए-गुल को महके,
तशरीफ़ लाकर इस अंजुमन को सजाओ ना।




