आज की आधुनिक बेटियाँ समाज की रूढ़िवादी सोच के मुँह पर एक करारा तमाचा हैं। सदियों से जिस पितृसत्तात्मक समाज ने बेटियों को घर के किसी कोने में सजने वाली, घर की ‘इज्जत’ के नाम पर चारदीवारी में कैद रहने वाली एक शो-पीस जैसी ‘वस्तु’ समझ रखा था,

आज उसी समाज को बेटियाँ अपनी ताकत का अहसास करा रही हैं। आज की बेटी केवल चूल्हा-चौका संभालने या शादी के बाजार में सज-धजकर बैठने वाली निर्जीव मूरत नहीं है, बल्कि वह अपने अधिकारों, अपने वजूद और अपने आत्मसम्मान के लिए सड़कों से लेकर संसद तक और कॉर्पोरेट ऑफिसों से लेकर खेल के मैदानों तक जंग लड़ने वाली एक जीती-जागती महाशक्ति बन चुकी है।हमारे समाज का पाखंड तो देखिए, एक तरफ नवरात्रों में कन्या-पूजन का ढोंग रचाया जाता है, तो दूसरी तरफ उसी कन्या को जन्म लेने से पहले कोख में मारने की साजिशें बुनी जाती हैं। यदि वह बच भी जाए, तो उसे बचपन से ही ‘पराया धन’ कहकर यह अहसास कराया जाता है कि उसका अपना कोई घर नहीं है। समाज ने सदियों से बेटियों के लिए एक दायरा तय कर दिया था “धीमे बोलो”, “हँसो मत”, “ज्यादा पढ़-लिखकर क्या करोगी, जाना तो दूसरे के घर ही है।” समाज बेटियों को ‘सजाने और संवारने’ में इसलिए व्यस्त रहता था ताकि वे किसी और के आंगन की शोभा बन सकें। लेकिन आज की बेटियों ने इस सजी-धजी गुलामी की जंजीरों को तोड़ दिया है। उन्होंने साफ कर दिया है कि वे किसी की जागीर या घर की सजावट की वस्तु नहीं हैं, बल्कि वे खुद अपना भाग्य लिखने वाली रचयिता हैं। वह दौर बीत गया जब बेटियों पर होने वाले अत्याचारों को ‘पारिवारिक मामला’ कहकर दबा दिया जाता था। आज की बेटी हर उस हाथ को मरोड़ना जानती है जो उसके स्वाभिमान पर उठता है। चाहे वह कार्यस्थल पर होने वाला भेदभाव (Gender Discrimination) हो, यौन उत्पीड़न हो, या फिर समाज में समान अवसरों की कमी।

आज की लड़कियाँ चुप नहीं बैठतीं। वे अपनी आवाज उठाती हैं, सोशल मीडिया पर कैम्पेन चलाती हैं, और कानून का दरवाजा खटखटाती हैं। आज की बेटियाँ न्याय मांगती नहीं हैं, वे अपना हक छीनना जानती हैं। जब ओलंपिक में देश का झंडा बुलंद करना हो, तो यही बेटियाँ मेडल लाकर समाज के उन ताने मारने वाले चेहरों को खामोश कर देती हैं। जब फाइटर जेट उड़ाना हो या देश की सीमाओं की रक्षा करनी हो, तो बेटियाँ पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर नहीं, बल्कि उनसे दो कदम आगे खड़ी नजर आती हैं। जैसे-जैसे बेटियाँ सशक्त हो रही हैं, समाज के एक बड़े वर्ग का पुरुषवादी अहंकार डगमगाने लगा है। आज भी जब कोई लड़की रात को देर से घर आती है, या अपनी पसंद के कपड़े पहनती है, या अपने करियर को शादी से ऊपर चुनती है, तो समाज की ‘नैतिक पुलिस’ (Moral Policing) सक्रिय हो जाती है। समाज को एक डरी हुई, सहमी हुई और समझौता करने वाली लड़की पसंद आती है। एक ऐसी लड़की जो अपने हक के लिए लड़ती है, उसे ‘घमंडी’, ‘बदतमीज’ या ‘संस्कृति को भूलने वाली’ का टैग दे दिया जाता है।

यह तीखा कमेंट उन सभी लोगों पर है जो आज भी बेटियों की कामयाबी को पचा नहीं पा रहे हैं। समाज को यह समझना होगा कि बेटियों का लड़ना कोई शौक नहीं, बल्कि उनकी मजबूरी है। वे इसलिए लड़ रही हैं क्योंकि उन्हें एक ऐसा सुरक्षित माहौल नहीं दिया गया जहाँ वे बिना डरे सांस ले सकें। वे इसलिए लड़ रही हैं ताकि आने वाली पीढ़ी की लड़कियों को इन दकियानूसी बेड़ियों में न जकड़ा जा सके। आज का समाज बदलाव के एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ वह बेटियों को रोकने की जितनी कोशिश करेगा, बेटियों का विद्रोह उतना ही तेज होगा। बेटियाँ अब महलों की रानी बनने का सपना नहीं देखतीं, वे खुद अपना साम्राज्य खड़ा कर रही हैं। अब समय आ गया है कि समाज बेटियों को ‘सहेजने और सजाने’ की वस्तु समझना बंद करे। वे कोई खिलौना नहीं हैं जिसे जब चाहा तोड़ दिया, जब चाहा समेट दिया। वे चिंगारी हैं, और अगर उन्हें दबाने की कोशिश की गई, तो वे उस पूरी रूढ़िवादी व्यवस्था को जलाकर राख कर देंगी जिसने उनके पंखों को बांधने की जुर्रत की थी। बेटियों का सम्मान केवल कागजी नारों ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ में नहीं, बल्कि उन्हें स्वतंत्र रूप से जीने, निर्णय लेने और अपने हक के लिए लड़ने की आजादी देने में है।



