नज़र को पढ़ने का सलीक़ा तुम्हें नहीं आया,,,

डॉ. मुश्ताक अहमद शाह

तबीब ने कहा दवाओं से कुछ नहीं फायदा होगा।
ख़ैरख़्वाह कोई तो रहता यहां भी तुम्हारा होगा

दर्द जिस्म की सरहद से आगे बढ़ चुका अपना।
धड़कनों में मेरी कुछ तो अपना सा लगा होगा।

नज़र को पढ़ने का सलीक़ा तुम्हें नहीं आया ,
आंखों में ख़्वाब छुपाके तुमने भी तो रखा होगा।

इलाज किताबों के वर्क़ पलटने से कहां मिलता,
ख़त लिख कर मुश्ताक़ तुमने भी तो रखा होगा।

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