अभी कल ही की तो बात लगती है…

डॉ. मुश्ताक अहमद शाह ‘सहज’ (हरदा, मध्य प्रदेश)

शाम के धुंधलके में जब सूरज पहाड़ियों के पीछे छिपने लगा, तो आंगन में रखी पुरानी आरामदायक कुर्सी पर बैठे बाबा की नज़रें घर के मुख्य दरवाजे पर टिकी थीं। हवा का एक हल्का सा झोंका आया और पेड़ से कुछ सूखे पत्ते टूट कर नीचे गिर पड़े। बाबा ने हाथ में पकड़ी हुई पानी की वह छोटी सी लाल बोतल देखी जो आज भी उनके स्टडी रूम की मेज़ पर रखी रहती थी। यह वही बोतल थी जिसे सालों पहले उनकी छोटी सी बेटी रोज स्कूल जाते हुए अपने नन्हे हाथों से थामे रखती थी। “बाबा! मेरा बस्ता बहुत भारी है…” बाबा के कानों में जैसे आज भी वह मासूम आवाज़ गूंज उठी। उन्हें याद आया कि किस तरह वे रोज़ सुबह अपनी बेटी का भारी बस्ता अपने कंधे पर लटकाकर, उसकी नन्ही सी उंगली थामे स्कूल के गेट तक छोड़ने जाते थे। स्कूल से वापसी पर जब वे थके-हारे घर लौटते, तो बेटी के चेहरे की एक खिलखिलाती मुस्कान और उसका बाबा के गले से लिपट जाना दिन भर की तमाम थकान मिटा दिया करता था।


वक़्त कितनी तेज़ी से ढलता है, इसका अंदाज़ा इंसान को तब होता है जब वह अतीत के पन्ने पलटता है। दिन, हफ्ते, महीने और साल पंख लगाकर उड़ते रहे। स्कूल के रंगीन बस्ते और छोटी कॉपियां कब कॉलेज के बड़े सपनों और किताबों में बदल गईं, पता ही न चला। बाबा की ज़िंदगी का केंद्र अब उनकी बेटी के सपने बन चुके थे। परीक्षा के दिनों में जब वह देर रात तक पढ़ती, तो बाबा की आंखों से भी नींद ग़ायब रहती। वे ख़ामोशी से ईश्वर से दुआएं मांगते रहते। बेटी की हर कामयाबी पर बाबा का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता, और अगर कभी वह जरा सी परेशान होती, तो बाबा का दिल बेचैन हो उठता। और फिर… वह दिन भी आ ही गया जिसका हर बाप को इंतज़ार भी होता है और डर भी। घर फूलों, रोशनियों और रिश्तेदारों की चहल-पहल से सजा हुआ था। हर तरफ़ ख़ुशी का माहौल था, लेकिन बाबा का दिल एक अजीब सी ख़ामोशी से भर रहा था। वही बेटी जो कल तक उनके घर का आंगन चहकाती थी, आज शादी के जोड़े में सजी, ज़िंदगी की नई दहलीज़ पर खड़ी थी। उसकी मुस्कान में एक नया सफ़र था और आंखों में अपने बाबा का घर छोड़ने की नमी। विदाई के वक्त जब बेटी बाबा के सीने से लगी, तो सब्र के सारे बांध टूट गए। बाबा ने उसके सिर पर बड़े प्यार से हाथ रखा और भारी आवाज़ में कहा: “हमेशा ख़ुश रहो, मेरी बच्ची…” आज बेटी को अपने नए घर गए कुछ वक्त बीत चुका है। घर के आंगन में अब वह पहली जैसी चहल-पहल तो नहीं, लेकिन बाबा जानते हैं कि बेटी सिर्फ घर से रुख़सत हुई है, उनके वज़ूद से नहीं। उसकी हंसी, उसकी मासूम बातें और उसके क़दमों की आहट आज भी घर के हर कोने में और बाबा के दिल में जिंदा है। बाबा ने मुस्कुराकर पानी की उस छोटी बोतल को देखा, अपनी नम आंखें पोंछीं और ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया। सच ही तो है, बाप और बेटी का रिश्ता फासलों और सीमाओं से परे होता है। यह वह पावन डोर है जो दुआओं, यादों और अटूट मोहब्बत से हमेशा कायम रहती है।

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