डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह “सहज़”, हरदा, मध्य प्रदेश,

ये मात्र दो शब्द भर नहीं हैं, बल्कि मानव चेतना, संस्कृति और अस्तित्व की संपूर्ण धुरी को अपने भीतर समेटे हुए एक गहरा दार्शनिक संसार हैं। जब हम इन दोनों को एक साथ देखते हैं, तो पाते हैं कि ये एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सृजन का अर्थ केवल किसी वस्तु का निर्माण करना नहीं है, बल्कि शून्यता से संभावनाओं को जन्म देना है। यह वह आदिम और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिससे ब्रह्मांड की रचना हुई, प्रकृति हर बसंत में नया रूप लेती है और मनुष्य अपनी कला, विचारों और विज्ञान के माध्यम से संस्कृति को गढ़ता है। सृजन में विद्रोही स्वर भी है और निर्माण की पराकाष्ठा भी। यह स्थापित सीमाओं को तोड़कर कुछ नया रचने का साहस है, जो जीवन को ठहराव से बचाता है और गतिशीलता प्रदान करता है। इसके विपरीत, धर्म शब्द को अक्सर रूढ़ियों, परंपराओं या पूजा-पद्धतियों तक सीमित कर दिया जाता है, जबकि इसका मूल अर्थ बहुत व्यापक है। ‘धर्म’ का अर्थ है वह जो धारण करे,जो समाज को, रिश्तों को और मानवीय मूल्यों को जोड़े रखे।

सत्य, अहिंसा, करुणा, कर्तव्य और न्याय ही वास्तविक धर्म हैं। यह मनुष्य को उसके पतन से बचाता है और उसे भीतर से अनुशासित एवं संवेदनशील बनाता है। जब सृजन और धर्म मिलते हैं, तो एक नया आयाम खुलता है। सच्चा धर्म वही है जो जीवन के सृजन में बाधक न बनकर उसका पोषक बने। इसी तरह, सृजन भी वही सार्थक है जिसमें विध्वंस की बजाय निर्माण और कल्याण की भावना निहित हो। एक रचनाकार जब अपनी कृति रचता है, तो वह एक प्रकार का अनुष्ठान कर रहा होता है,वह उसका ‘धर्म’ होता है। दूसरी ओर, धर्म जब संकीर्णताओं से ऊपर उठकर मानवता के कल्याण के लिए नए मार्ग तलाशता है, तो वह भी एक प्रकार का ‘सृजन’ बन जाता है। ये दोनों मिलकर मनुष्य को केवल जीवित रहने से ऊपर उठाकर सार्थक जीवन जीने की कला सिखाते हैं। इस यात्रा में आपका प्रिय सृजन कौन सा रूप लेता है,कला, साहित्य, या कुछ और?




