जब कोई व्यवस्था अपनी भावी पीढ़ी को एक सुरक्षित छत तक मुहैया न करा सके, लेकिन अपने नुमाइंदों के लिए विलासिता के सारे साधन जुटा ले, तो समझ जाना चाहिए कि लोकतंत्र का तराजू असंतुलित हो चुका है। 12 साल का यह कार्यकाल निश्चित रूप से सफल रहा है उन ठेकेदारों के लिए जिन्होंने 5-स्टार दफ्तर बनाए, उन नेताओं के लिए जिन्हें फाइव-स्टार सुविधाएं मिलीं।

देश के विकास का पहिया इतनी तेजी से घूम रहा है कि आम नागरिक का सिर चकरा जाए या शायद वह पहिया सीधे किसी आम आदमी के ऊपर से ही गुजर जाए। पिछले 12 सालों की महान यात्रा के बाद आज देश एक ऐसे स्वर्णिम युग में प्रवेश कर चुका है, जहां सरकारी दफ्तरों की भव्यता और आम जनता की लाचारी के बीच का फासला ऐतिहासिक रूप से चौड़ा हो चुका है। सरकार के 12 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में जब भव्य समारोहों की रूपरेखा तैयार हो रही है, तब एक कड़वी मगर सच्ची तस्वीर मलबे के ढेर से झांक रही है। यह मलबे में दम तोड़ते देश के भविष्य (हमारे बच्चों) और पांच-सितारा होटलनुमा सरकारी दफ्तरों में एयर-कंडीशनर की ठंडी हवा का लुत्फ उठाती सत्ता के बीच के फासले की कहानी है। सरकार ने पिछले एक दशक में यह तो साबित कर दिया है कि भले ही देश की बुनियादी ढांचागत व्यवस्था वेंटिलेटर पर हो, लेकिन फाइलों को रखने की जगह वर्ल्ड-क्लास होनी चाहिए। आंकड़ों पर नजर डालें तो नई दिल्ली के लुटियंस जोन से लेकर राज्यों की राजधानियों तक, सरकारी दफ्तरों के आधुनिकीकरण पर पानी की तरह पैसा बहाया गया है। सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना और विभिन्न मंत्रालयों के नए भवनों के निर्माण पर अनुमानित 20,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा चुके हैं। इन दफ्तरों में कदम रखते ही आपको किसी अंतरराष्ट्रीय कॉर्पोरेट मुख्यालय या 5-स्टार रिजॉर्ट का अहसास होगा।

इटैलियन मार्बल, हाई-टेक सेंसर लाइट्स, सेंट्रलाइज्ड एसी, बुलेटप्रूफ शीशे और विदेशी कलाकृतियों से सजे ये दफ्तर इस बात का प्रतीक हैं कि हमारे जनप्रतिनिधि और नौकरशाह कितने ‘कठिन’ परिवेश में देश की सेवा कर रहे हैं। इन आलीशान कमरों में बैठकर जब नीति-निर्माता “गरीबी उन्मूलन” और “सुरक्षित भारत” पर प्रेजेंटेशन देखते हैं, तो शायद उन्हें लगता है कि पूरा देश ही इसी तरह चमक रहा है। लेकिन जैसे ही आप इन पांच-सितारा दफ्तरों के सुरक्षा घेरे से बाहर निकलकर देश की जमीनी हकीकत पर नजर डालते हैं, तो विकास का यह गुब्बारा फूट जाता है। शिक्षा और बच्चों के भविष्य के नाम पर जो बुनियादी ढांचा हमें मिला है, वह बेहद डरावना है। एक हालिया राष्ट्रीय सर्वे और यूडीआईएसई (UDISE+) की रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक, देश के लगभग 15% से अधिक सरकारी स्कूलों की इमारतें जर्जर हालत में हैं। हर साल मानसून आते ही देश के किसी न किसी हिस्से से स्कूल की छत गिरने, दीवार ढहने या शौचालय की दीवार के मलबे में दबकर मासूम बच्चों की मौत की खबरें आती हैं। पिछले 12 वर्षों में करीब 450 से अधिक स्कूली बच्चों ने केवल इसलिए अपनी जान गंवाई क्योंकि वे जिस छत के नीचे क ख ग घ सीख रहे थे, वह सरकारी उपेक्षा के बोझ से ढह गई। क्या यह विडंबना नहीं है कि जिस देश में मंत्रियों के लिए 5-स्टार दफ्तर रातों-रात बनकर तैयार हो जाते हैं, उसी देश के 30% सरकारी स्कूलों में आज भी पीने के साफ पानी और छात्राओं के लिए सुरक्षित शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं तक गायब हैं? आइए इस 12 साल की ‘सफलता’ को कुछ और कड़े आंकड़ों के तराजू पर तौलते हैं।
जहां सरकारी भवनों, प्रचार-प्रसार और वीआईपी सुरक्षा के बजट में पिछले 12 वर्षों में 300% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है, वहीं शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का खर्च आज भी 2.8% से 3% के बीच ही झूल रहा है, जबकि कोठारी आयोग ने दशकों पहले इसे 6% करने की सिफारिश की थी। सरकार ने ‘डिजिटल इंडिया’ के तहत स्मार्ट क्लासरूम का ढिंढोरा तो पीटा, लेकिन हकीकत यह है कि देश के 40% से अधिक ग्रामीण स्कूलों में बिजली का नियमित कनेक्शन तक नहीं है। बच्चे गर्मी में पसीने से लथपथ होकर, बिना पंखे के, उस ढहती हुई इमारत में बैठने को मजबूर हैं जिसके मलबे में कभी भी उनका भविष्य दफन हो सकता है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि बुनियादी ढांचे की कमी और असुरक्षित रास्तों के कारण दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाले बच्चों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है। स्कूल जाते समय खुले नाले में गिरकर या जर्जर छज्जा गिरने से मरने वाले बच्चों को व्यवस्था ‘महज एक दुर्घटना’ मानकर फाइल बंद कर देती है। इस पूरी व्यवस्था पर सबसे बड़ा कटाक्ष यह है कि इतनी त्रासदियों के बाद भी जवाबदेही तय करने की जहमत कोई नहीं उठाता। जब किसी स्कूल के मलबे में मासूम जिंदगियां दफन होती हैं, तो 5-स्टार दफ्तरों से एक औपचारिक ‘ट्वीट’ या शोक संदेश जारी होता है, कुछ लाख रुपये के मुआवजे का ऐलान होता है और जिम्मेदारी का ठीकरा किसी अदने से जूनियर इंजीनियर या मौसम विभाग पर फोड़ दिया जाता है।
इसके बाद, साहब लोग फिर से अपनी मखमली कुर्सियों पर बैठकर अगले भव्य उद्घाटन की रूपरेखा तैयार करने में व्यस्त हो जाते हैं। इन 12 सालों की सबसे बड़ी ‘सफलता’ यही रही है कि सरकार ने जनता को यह विश्वास दिला दिया है कि भव्य इमारतें ही असली विकास हैं, भले ही उन इमारतों के निर्माण की नींव में आम आदमी के टैक्स का पैसा और गरीब के बच्चे का खून-पसीना दबा हो। जब कोई व्यवस्था अपनी भावी पीढ़ी को एक सुरक्षित छत तक मुहैया न करा सके, लेकिन अपने नुमाइंदों के लिए विलासिता के सारे साधन जुटा ले, तो समझ जाना चाहिए कि लोकतंत्र का तराजू असंतुलित हो चुका है। 12 साल का यह कार्यकाल निश्चित रूप से सफल रहा है उन ठेकेदारों के लिए जिन्होंने 5-स्टार दफ्तर बनाए, उन नेताओं के लिए जिन्हें फाइव-स्टार सुविधाएं मिलीं। लेकिन उस आम मां-बाप के लिए यह कार्यकाल एक सतत खौफ की तरह है, जो रोज सुबह अपने बच्चे को स्कूल भेजते समय यह दुआ करता है कि उसका बच्चा शाम को मलबे में तब्दील हो चुके स्कूल से सही-सलामत घर लौट आए। चमकते हुए दफ्तरों की खिड़कियों से बाहर झांकिए साहब, नीचे मलबे में दबा देश का भविष्य आपकी इस ‘अभूतपूर्व सफलता’ पर सिसक रहा है।




