‘गो बैक चाइना’ से ‘वेलकम चाइना’ तक; ब्रेटन वुड्स व्यवस्था के प्रभुत्व का अंत, अमेरिकी दबदबे को झटका,ब्रिक्स शिखर सम्मेलन

रितेश सिन्हा

भारत की विदेश और आर्थिक नीति जिस तेजी से बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच नई दिशा तलाश रही है, उसका सबसे बड़ा मंच इस समय ब्रिक्स बनता दिखाई दे रहा है।

कभी सीमा विवाद, गलवान और चीनी कंपनियों को लेकर देश में ‘गो बैक चाइना’ का माहौल बनाया गया था, लेकिन आज वही चीन भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार के रूप में सामने है। यह बदलाव केवल कूटनीति का नहीं, बल्कि बदलती आर्थिक वास्तविकताओं का भी संकेत है। भारत अब अमेरिका और चीन के बीच किसी एक खेमे में खड़े होने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर दोनों के साथ संबंधों को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है। भारत के लिए 2026 का ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इसलिए और महत्वपूर्ण है क्योंकि इस वर्ष भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है। ब्रिक्स अब केवल ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका तक सीमित समूह नहीं है। मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और इंडोनेशिया के शामिल होने के बाद यह 11 देशों का प्रभावशाली समूह बन चुका है। आधिकारिक ब्रिक्स वेबसाइट भी इन 11 देशों को वर्तमान सदस्य के रूप में सूचीबद्ध करती है।

सबसे दिलचस्प सवाल यह है कि जिस समय पश्चिमी दुनिया चीन के आर्थिक प्रभाव को रोकने की रणनीति पर काम कर रही है, उसी समय भारत और चीन के बीच व्यापार क्यों बढ़ रहा है? इसका जवाब आंकड़ों में छिपा है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत और चीन के बीच वस्तु व्यापार 151.10 अरब डॉलर तक पहुंच गया। भारत ने चीन को 19.47 अरब डॉलर का निर्यात किया, जबकि चीन से 131.63 अरब डॉलर का आयात हुआ। परिणामस्वरूप भारत का व्यापार घाटा 112.16 अरब डॉलर रहा। चीन पहली बार अमेरिका को पीछे छोड़कर भारत का सबसे बड़ा वस्तु व्यापार साझेदार बन गया। यह आंकड़ा एक तरफ भारत की चीन पर निर्भरता की गंभीर तस्वीर पेश करता है, तो दूसरी तरफ यह भी बताता है कि आर्थिक संबंधों को राजनीतिक नारों से हमेशा नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार उपकरण, मशीनरी, रसायन, औद्योगिक कच्चे माल और अनेक विनिर्माण क्षेत्रों में चीन भारतीय अर्थव्यवस्था की आपूर्ति शृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। इसलिए भारत के सामने वास्तविक चुनौती चीन से व्यापार बंद करने की नहीं, बल्कि व्यापार असंतुलन को कम करने की है।

ब्रिक्स का आर्थिक महत्व इसी जगह सामने आता है। भारत के वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार 2024 में ब्रिक्स देशों के बीच वस्तु व्यापार 1.17 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच चुका था, जबकि 2003 में यह केवल 8400 करोड़ डॉलर था। यानी दो दशकों में ब्रिक्स के भीतर वस्तु व्यापार लगभग 13 गुना बढ़ा है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का ब्रिक्स देशों को वस्तु निर्यात लगभग 82 अरब डॉलर और 2024 में सेवाओं का निर्यात 31.3 अरब डॉलर रहा। इन आंकड़ों का राजनीतिक अर्थ भी है। ब्रिक्स अब केवल सम्मेलन करने वाला मंच नहीं रहा। यह ऊर्जा, व्यापार, वित्त, भुगतान व्यवस्था, प्रौद्योगिकी, आपूर्ति शृंखला और विकासशील देशों के हितों पर प्रभाव डालने वाला समूह बन रहा है। अगस्त 2026 में ब्रिक्स के व्यापार मंत्रियों की बैठक में आर्थिक साझेदारी 2030 की रणनीति को अंतिम रूप दिया गया और लघु एवं मध्यम उद्योगों के लिए ऋण सुविधा मजबूत करने की दिशा में भी कदम उठाए गए।

भारत के लिए ब्रिक्स देशों के साथ व्यापार का विस्तार कई अवसर लेकर आता है। संयुक्त अरब अमीरात के साथ भारत का व्यापार पहले ही बड़े स्तर पर पहुंच चुका है। रूस भारत के लिए ऊर्जा, रक्षा और कच्चे माल का महत्वपूर्ण स्रोत है। सऊदी अरब के साथ ऊर्जा और निवेश संबंध लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं। इंडोनेशिया से कोयला, पाम तेल और अन्य वस्तुओं का व्यापार होता है। ब्राजील कृषि, खाद्य और खनिज क्षेत्रों में महत्वपूर्ण साझेदार है, जबकि दक्षिण अफ्रीका अफ्रीकी बाजारों तक भारत की पहुंच का प्रमुख द्वार है। ब्रिक्स के भीतर भारत के सामने केवल चीन नहीं है। भारत के लिए यह 11 देशों का ऐसा आर्थिक क्षेत्र है, जहां ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, खनिज, प्रौद्योगिकी, विनिर्माण, दवा, कृषि, डिजिटल भुगतान और सेवाओं के क्षेत्र में नए बाजार तैयार किए जा सकते हैं। भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि तभी होगी जब वह चीन से आयात बढ़ाने के बजाय ब्रिक्स देशों को भारतीय उत्पादों और सेवाओं के लिए बड़ा बाजार बनाए।

यहीं से ‘गो बैक चाइना’ से ‘वेलकम चाइना’ तक बदलते माहौल को समझना होगा। इसका अर्थ यह है कि भारत भावनात्मक प्रतिक्रिया की जगह आर्थिक हितों को प्राथमिकता देने लगा है। चीन से व्यापार बढ़ाना और साथ ही सीमा, सुरक्षा तथा रणनीतिक हितों पर कठोर रुख रखना—दोनों बातें एक साथ संभव हैं। इस बदलाव का एक और संकेत भारत की निवेश नीति में दिखाई देता है। 2026 में भारत ने भूमि सीमा साझा करने वाले देशों से जुड़े कुछ निवेशों के लिए नियमों में सीमित ढील दी है। लेकिन यह ढील पूर्ण आर्थिक खुलापन नहीं है। सुरक्षा, संवेदनशील क्षेत्रों और नियंत्रण से जुड़े मामलों में सावधानी बरकरार है। इसका मतलब साफ है—भारत चीन के साथ आर्थिक संबंध बढ़ाना चाहता है, लेकिन अपनी रणनीतिक स्वायत्तता छोड़कर नहीं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बनी ब्रेटन वुड्स व्यवस्था ने वैश्विक वित्तीय प्रणाली में डॉलर को केंद्रीय भूमिका दी।अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा बाजार, बैंकिंग और वित्तीय लेन-देन में अमेरिकी मुद्रा की ताकत ने अमेरिका को असाधारण आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव दिया। आज ब्रिक्स के भीतर स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था और केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राओं के बीच संभावित संपर्क पर चर्चा उसी व्यवस्था को चुनौती देने वाली व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है।

अगस्त 2026 में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बताया कि ब्रिक्स देश तेज भुगतान प्रणालियों और केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राओं को आपस में जोड़ने के विकल्पों पर चर्चा कर रहे हैं। उन्होंने सीमा-पार भुगतान की लागत कम करने और स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। अभी यह प्रक्रिया विचार-विमर्श के स्तर पर है, लेकिन इसका संदेश महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह नहीं कि कल से डॉलर समाप्त हो जाएगा या ब्रेटन वुड्स व्यवस्था खत्म हो जाएगी। वास्तविकता यह है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे अधिक बहुध्रुवीय हो रही है। डॉलर की भूमिका अभी भी अत्यंत मजबूत है, लेकिन चीन, भारत, रूस, ब्राजील और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाएं ऐसी वित्तीय और व्यापारिक व्यवस्थाएं विकसित करना चाहती हैं जिनमें किसी एक देश की मुद्रा या वित्तीय प्रणाली पर अत्यधिक निर्भरता न रहे।

भारत के लिए इसमें अवसर भी है और जोखिम भी। अवसर इसलिए कि भारतीय रुपया क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है। जोखिम इसलिए कि यदि भारत चीन के साथ व्यापार घाटे को नियंत्रित नहीं कर पाया तो स्थानीय मुद्रा में व्यापार भी उस घाटे की समस्या का समाधान अपने आप नहीं करेगा। यही कारण है कि ब्रिक्स में भारत की भूमिका केवल चीन के साथ नजदीकी बढ़ाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। भारत को ब्रिक्स को अपने निर्यात का मंच बनाना होगा। भारत की दवाएं, वाहन, कृषि उत्पाद, मशीनरी, रक्षा उपकरण, सूचना प्रौद्योगिकी, डिजिटल सेवाएं और विनिर्माण उत्पाद ब्रिक्स बाजारों में ज्यादा पहुंचें—यह भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए।

भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में कुल 863.1 अरब डॉलर का रिकॉर्ड निर्यात किया, जिसमें वस्तु निर्यात 441.8 अरब डॉलर और सेवाओं का निर्यात 421.3 अरब डॉलर रहा। अब चुनौती यह है कि इस निर्यात क्षमता का बड़ा हिस्सा ब्रिक्स बाजारों तक कैसे पहुंचाया जाए। इस पूरी कहानी में अमेरिका के लिए भी एक संदेश है। भारत अमेरिका का विरोधी नहीं है और न ही चीन का सहयोगी बनने जा रहा है। लेकिन भारत अब किसी भी शक्ति के दबाव में अपनी आर्थिक नीति निर्धारित करने के लिए तैयार नहीं दिखता। अमेरिका के साथ व्यापार, प्रौद्योगिकी और रणनीतिक साझेदारी अपनी जगह है; रूस के साथ ऊर्जा और रक्षा संबंध अपनी जगह हैं; चीन के साथ व्यापार अपनी जगह है और ब्रिक्स का मंच अपनी जगह। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह चीन से व्यापार करे, लेकिन चीन पर निर्भर न हो; अमेरिका से साझेदारी करे, लेकिन अमेरिकी दबाव में न आए; रूस से ऊर्जा खरीदे, लेकिन किसी एक ऊर्जा स्रोत पर निर्भर न रहे; और ब्रिक्स का नेतृत्व करे, लेकिन उसे किसी दूसरे शक्ति-गुट में बदलने से भी बचे।

‘गो बैक चाइना’ से ‘वेलकम चाइना’ तक का सफर इसलिए केवल नारों का बदलाव नहीं है। यह भारतीय विदेश नीति के उस व्यावहारिक मोड़ का संकेत है जहां भावनाओं से ज्यादा महत्व व्यापार, निवेश, तकनीक और राष्ट्रीय हित को दिया जा रहा है। ब्रिक्स का भविष्य डॉलर को रातोंरात हटाने में नहीं, बल्कि दुनिया को ऐसी आर्थिक व्यवस्था देने में है जिसमें कई शक्तियां समान रूप से प्रभावशाली हों। भारत के लिए यही सबसे बड़ा अवसर है। यदि नई दिल्ली इस मंच का इस्तेमाल अपने निर्यात, अपनी मुद्रा, अपने उद्योग और अपने वैश्विक प्रभाव को बढ़ाने के लिए करती है, तो ब्रिक्स केवल चीन या अमेरिका को चुनौती देने का मंच नहीं रहेगा—वह भारत के लिए 21वीं सदी की नई आर्थिक शक्ति बनने का रास्ता भी बन सकता है।

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