कपिल मिश्रा और चिराग पासवान: राजनीतिक संरक्षण के आरोप और समकालीन भारतीय राजनीति की हकीकत

कपिल मिश्रा और चिराग पासवान जैसे नेताओं पर लगने वाले ये आरोप भारतीय राजनीति की उस गहरी बीमारी का हिस्सा हैं, जिसे “राजनीति का अपराधीकरण” कहा जाता है।


भारतीय राजनीति में ‘अपराधीकरण’ और ‘नेताओं द्वारा अपराधियों को संरक्षण देने’ का मुद्दा कोई नया नहीं है। जब भी देश के किसी हिस्से में कोई बड़ी आपराधिक घटना होती है, या किसी बाहुबली का नाम सामने आता है, तो अक्सर सत्तापक्ष और विपक्ष के नेताओं पर उन्हें प्रश्रय (संरक्षण) देने के आरोप लगने लगते हैं। हाल के वर्षों में, दिल्ली भाजपा के प्रमुख नेता कपिल मिश्रा और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के मुखिया व केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान जैसे युवा व मुखर नेताओं पर भी विरोधियों द्वारा इस तरह के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। लेकिन क्या वाकई ये नेता राजनीतिक अपराधियों के प्रश्रयदाता हैं, या फिर ये आरोप केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और छवि को धूमिल करने के सुनियोजित प्रयास हैं? इस विषय को गहराई से समझने के लिए दोनों नेताओं के राजनीतिक करियर, उनके खिलाफ लगे आरोपों की प्रकृति और भारतीय राजनीति के व्यापक ताने-बाने का विश्लेषण करना आवश्यक है।

आम आदमी पार्टी (AAP) से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाले और बाद में भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हुए कपिल मिश्रा दिल्ली की राजनीति में एक बेहद चर्चित और विवादित चेहरा रहे हैं। कपिल मिश्रा पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वे अपनी तीखी बयानबाजी से न केवल माहौल को गरमाते हैं, बल्कि कानून को हाथ में लेने वाले तत्वों को परोक्ष रूप से संरक्षण देते हैं। कपिल मिश्रा पर सबसे बड़ा और गंभीर आरोप फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के दौरान लगा। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में चल रहे प्रदर्शनों के बीच, कपिल मिश्रा ने जाफराबाद में एक सभा की थी, जिसमें उन्होंने पुलिस की मौजूदगी में अल्टीमेटम दिया था कि यदि सड़कें खाली नहीं कराई गईं, तो वे खुद सड़कों पर उतरेंगे। विपक्ष और कई मानवाधिकार संगठनों ने आरोप लगाया कि मिश्रा के इस बयान ने दंगाइयों को उकसाया। दंगों के बाद, जब हिंसा के आरोपियों और कुछ दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुईं, तो यह आरोप लगा कि कपिल मिश्रा और उनके सहयोगी ऐसे तत्वों को कानूनी और राजनीतिक ढाल प्रदान कर रहे हैं। इसके विपरीत, कपिल मिश्रा और भाजपा ने हमेशा इन आरोपों को खारिज किया है। उनका तर्क है कि उन्होंने केवल सड़क बंद होने से परेशान आम जनता की आवाज उठाई थी। उनका कहना है कि वे किसी अपराधी का समर्थन नहीं करते, बल्कि उन लोगों के साथ खड़े हैं जो हिंसा का शिकार हुए। अदालती कार्यवाहियों में भी कपिल मिश्रा के खिलाफ सीधे तौर पर दंगा भड़काने या अपराधियों को प्रश्रय देने के ठोस कानूनी सबूत स्थापित नहीं हो सके हैं, जिससे यह मामला कानूनी से ज्यादा राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है।

बिहार की राजनीति का एक लंबा इतिहास अपराधियों और बाहुबलियों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। स्वर्गीय रामविलास पासवान के पुत्र और लोजपा (आर) के नेता चिराग पासवान खुद को ‘आधुनिक और विकासपरक राजनीति’ का चेहरा बताते हैं। इसके बावजूद, बिहार की क्षेत्रीय राजनीति की मजबूरियों के कारण उन पर भी अपराधियों को प्रश्रय देने या उनके साथ मंच साझा करने के आरोप लगते रहे हैं। बिहार चुनाव के दौरान चिराग पासवान की पार्टी पर अक्सर यह आरोप लगता है कि वे चुनाव जीतने के लिए ‘विनेबिलिटी’ (जीतने की क्षमता) को प्राथमिकता देते हैं, भले ही उस उम्मीदवार का आपराधिक इतिहास क्यों न हो। लोजपा के इतिहास में सूरजभान सिंह जैसे कद्दावर और पूर्व में आपराधिक छवि वाले नेताओं का बड़ा प्रभाव रहा है। चिराग पासवान ने राजनीतिक रूप से इन परिवारों से दूरी बनाने की बजाय उनके साथ गठबंधन और राजनीतिक संबंध बनाए रखे हैं। आलोचकों का कहना है कि जब कोई युवा नेता स्थापित अपराधियों या उनके परिजनों को टिकट देता है, तो वह परोक्ष रूप से उस आपराधिक साम्राज्य को राजनीतिक मान्यता और संरक्षण दे रहा होता है। चिराग पासवान का इस मुद्दे पर हमेशा स्पष्ट रुख रहा है कि जब तक किसी व्यक्ति को अदालत द्वारा दोषी नहीं ठहराया जाता, तब तक उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जा सकता। वे इसे बिहार के सामाजिक समीकरण और जमीनी राजनीति की मांग बताते हैं। उनका कहना है कि उनका मुख्य उद्देश्य बिहार का विकास (‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’) है और वे निजी तौर पर किसी भी प्रकार के अपराध या अपराधी का समर्थन नहीं करते हैं।

राजनीति में किसी को “प्रश्रयदाता” कहना एक बहुत ही गंभीर और कानूनी अर्थों वाला शब्द है। भारतीय कानून के तहत, किसी को अपराधी तब तक नहीं माना जाता जब तक कि अदालत उसे दोषी न करार दे दे। न तो कपिल मिश्रा और न ही चिराग पासवान पर किसी अपराधी को शरण देने, पुलिस से छिपाने या किसी आपराधिक साजिश में सीधे शामिल होने का कोई कानूनी दोष सिद्ध हुआ है। इसलिए, कानूनी तौर पर उन्हें “राजनैतिक अपराधियों का प्रश्रयदाता” कहना गलत होगा। नैतिक धरातल पर स्थितियां थोड़ी धुंधली हो जाती हैं। भारतीय राजनीति में चुनावी गणित (Electoral Mathematics) इतना जटिल है कि कोई भी दल या नेता पूरी तरह से ‘दूध का धुला’ होने का दावा नहीं कर सकता। कपिल मिश्रा की राजनीति राष्ट्रवाद और बहुसंख्यक समाज के अधिकारों के इर्द-गिर्द घूमती है। इस प्रक्रिया में अगर कुछ कट्टरपंथी तत्व उनके बयानों का फायदा उठाते हैं, तो नैतिक रूप से उन पर सवाल उठना स्वाभाविक है। चिराग पासवान की राजनीति बिहार की जातिगत और क्षेत्रीय वास्तविकताओं पर टिकी है। बिहार में कई दशकों से बाहुबलियों का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव रहा है। ऐसे में, उनसे पूरी तरह किनारा करना किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।

अंततः, यह समझना जरूरी है कि कपिल मिश्रा और चिराग पासवान जैसे नेताओं पर लगने वाले ये आरोप भारतीय राजनीति की उस गहरी बीमारी का हिस्सा हैं, जिसे “राजनीति का अपराधीकरण” कहा जाता है। जब विपक्ष इन नेताओं पर अपराधियों को संरक्षण देने का आरोप लगाता है, तो वह अक्सर अपने पाले में बैठे अपराधियों को भूल जाता है। कपिल मिश्रा की आक्रामक शैली उन्हें उनके समर्थकों की नजर में ‘रक्षक’ और विरोधियों की नजर में ‘उकसाने वाला’ बनाती है। वहीं, चिराग पासवान की आधुनिक छवि के पीछे बिहार की पारंपरिक और जटिल राजनीति की मजबूरियां छिपी हैं। यह कहना कि वे “वाकई” अपराधियों के प्रश्रयदाता हैं, तथ्यों से ज्यादा राजनीतिक धारणा (Political Perception) पर आधारित है। जब तक देश में कड़े चुनावी सुधार नहीं होते और पार्टियां खुद अपराधियों को टिकट देना बंद नहीं करतीं, तब तक नेताओं और अपराधियों के बीच के ये कथित संबंध और आरोप-प्रत्यारोप भारतीय लोकतंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा बने रहेंगे।

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