डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह “सहज़”,हरदा, मध्य प्रदेश,

मोहब्बत में दिल का इख़्तियार कितना है, पूछो न अब कि हमको ख़ुमार कितना है।
वो जो क़रीब होकर भी कभी पास न आया, इसपर भी हमें उसपे एतबार कितना है।
हर आहट पे धड़कन का सहम् सा जाना, गवाह है कि तेरा इंतेज़ार कितना है।
ख़ामोश निगाहें और आँखों में अश्क, तू ही बता इस इश्क़ का मेयार कितना है।
हँसकर गुज़ार दी हमने ज़िंदगी अपनी, मुश्ताक दिल में ज़ख़्मों का शुमार कितना है।




