8 प्रतिशत विकास का दावा, रोजगार, निवेश और वैश्विक संकट पर खामोशी; सरकार समर्थित आर्थिक नैरेटिव की पूरी तस्वीर-रितेश सिन्हा

विश्व बैंक में भारत के कार्यकारी निदेशक नीलकंठ मिश्रा ने एक निजी समाचार एजेंसी को दिए गए हालिया साक्षात्कार में भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर बड़े दावे किए। उन्होंने कहा कि भारत 8 प्रतिशत से अधिक की विकास दर हासिल करने की क्षमता रखता है, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों को लेकर जताई जा रही चिंताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है और देश की आर्थिक बुनियाद पहले से कहीं अधिक मजबूत है। सुनने में यह तस्वीर आकर्षक लगती है, लेकिन क्या अर्थव्यवस्था का मूल्यांकन केवल कुछ चमकदार आंकड़ों, कारों की बिक्री, मॉल की भीड़ और विकास दर के अनुमानों से किया जा सकता है? या फिर देश की अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए उन सवालों पर भी नजर डालनी होगी जिन्हें अक्सर सरकारी दावों के शोर में दबा दिया जाता है? नीलकंठ मिश्रा का दावा है कि भारत 8 प्रतिशत से अधिक की रफ्तार से दौड़ सकता है। सवाल यह नहीं है कि क्षमता है या नहीं। भारत के पास युवा आबादी है, विशाल बाजार है, डिजिटल ढांचा है और निवेश आकर्षित करने की क्षमता भी है। असली सवाल यह है कि क्या मौजूदा आर्थिक ढांचा उस दावे का समर्थन करता है? यदि अर्थव्यवस्था वास्तव में इतनी मजबूत है तो फिर देश के लगभग 45 प्रतिशत श्रमिक आज भी कृषि पर निर्भर क्यों हैं, जबकि कृषि का योगदान सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 15-16 प्रतिशत के आसपास है? यह असंतुलन दशकों से बना हुआ है और बताता है कि देश की बड़ी आबादी अब भी कम आय वाले क्षेत्रों में काम करने को मजबूर है।

नीलकंठ मिश्रा ने कारों की बिक्री और मॉल की भीड़ को आर्थिक मजबूती का संकेत बताया। भारत की आबादी 140 करोड़ से अधिक है। देश में सालभर में लगभग 45 से 50 लाख यात्री वाहन बिकते हैं। क्या एक सीमित उपभोक्ता वर्ग की बढ़ती खपत को पूरे देश की आर्थिक समृद्धि का प्रतीक माना जा सकता है? क्या महानगरों के शॉपिंग मॉल ही भारत की वास्तविक अर्थव्यवस्था हैं? सरकार और उसके समर्थक अर्थशास्त्री अक्सर विकास दर को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करते हैं। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की वृद्धि दर लगभग 7.7 प्रतिशत रही है। यह निश्चित रूप से एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन क्या केवल वृद्धि दर ही पूरी कहानी है? यदि अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत है तो फिर केंद्र सरकार को 2025-26 में 11 लाख करोड़ रुपये से अधिक का पूंजीगत व्यय करना पड़ रहा है। सड़क, रेल, बंदरगाह, हवाई अड्डों और आधारभूत संरचना पर रिकॉर्ड खर्च किया जा रहा है। यह निवेश आवश्यक है, लेकिन इसके साथ एक सवाल भी जुड़ा है—क्या आर्थिक वृद्धि का इंजन अभी भी सरकारी खर्च है, या निजी निवेश ने वास्तव में उसकी जगह ले ली है? किसी भी विकसित होती अर्थव्यवस्था की असली ताकत निजी निवेश होती है। उद्योगपति तब निवेश करते हैं जब उन्हें भविष्य पर भरोसा होता है। यदि अर्थव्यवस्था इतनी ही मजबूत है जितना दावा किया जा रहा है, तो निजी क्षेत्र की निवेश क्षमता और निवेश की गति पर लगातार सवाल क्यों उठ रहे हैं?

रोजगार का मोर्चा भी उतना सरल नहीं है जितना आधिकारिक आंकड़े दर्शाते हैं। बेरोजगारी दर घटकर लगभग 3 प्रतिशत के आसपास बताई जा रही है। लेकिन क्या यह आंकड़ा रोजगार की गुणवत्ता को दर्शाता है? क्या यह बताता है कि कितने युवाओं को स्थायी और सम्मानजनक रोजगार मिला है? क्या यह बताता है कि लाखों युवा आज भी कुछ हजार सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन क्यों कर रहे हैं? भारत की प्रति व्यक्ति आय आज भी लगभग 3,000 डॉलर के आसपास है। दूसरी ओर चीन 13,000 डॉलर से अधिक के स्तर पर पहुंच चुका है। ऐसे में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की चर्चा के साथ यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि उस आर्थिक वृद्धि का लाभ आम भारतीय नागरिक तक किस गति से पहुंच रहा है। नीलकंठ मिश्रा का एक और दावा है कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतों को लेकर जताई जा रही चिंताएं अतिरंजित हैं, क्या वास्तव में ऐसा है? भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। तेल महंगा होता है तो परिवहन महंगा होता है, उत्पादन महंगा होता है, कृषि लागत बढ़ती है और अंततः महंगाई का बोझ आम नागरिक पर पड़ता है। दुनिया आज एक नई आर्थिक और भू-राजनीतिक व्यवस्था के दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, ईरान-इजराइल संघर्ष की आशंकाएं, रूस-यूक्रेन युद्ध के दीर्घकालिक प्रभाव, अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा और वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता ऐसे कारक हैं जो किसी भी समय आर्थिक समीकरण बदल सकते हैं। ऐसे माहौल में अत्यधिक आशावाद कई बार दूरदर्शिता नहीं, बल्कि जोखिमों को कम करके आंकने का संकेत भी हो सकता है।
दरअसल, समस्या आंकड़ों में नहीं है, आंकड़ों की प्रस्तुति में है। जब विकास दर बढ़ती है तो उसे उपलब्धि बताया जाता है। जब शेयर बाजार रिकॉर्ड बनाता है तो उसे आर्थिक सफलता का प्रमाण माना जाता है। लेकिन जब रोजगार, ग्रामीण आय, कृषि संकट, छोटे उद्योगों की चुनौतियां या आय असमानता की बात आती है, तब चर्चा का स्वर अचानक बदल जाता है। यही वह बिंदु है जहां सरकार समर्थित आर्थिक नैरेटिव पर सवाल खड़े होते हैं। क्या देश को अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर दिखाई जा रही है या केवल उसका सबसे चमकदार हिस्सा? क्या विकास दर के उत्सव में उन चुनौतियों को नजरअंदाज किया जा रहा है जो भविष्य में बड़ी समस्या बन सकती हैं? इतिहास गवाह है कि आर्थिक संकट अचानक नहीं आते। उनसे पहले भी चेतावनी के संकेत मौजूद होते हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब नीति निर्माता और उनके आसपास मौजूद विशेषज्ञ उन संकेतों को महत्व देने के बजाय केवल सकारात्मक आंकड़ों पर ध्यान केंद्रित करने लगते हैं।
अर्थशास्त्र का उद्देश्य सत्ता को खुश करना नहीं, बल्कि उसे सचेत करना होता है। किसी भी अर्थशास्त्री का सबसे बड़ा दायित्व यह नहीं कि वह सरकार को बताए कि सब कुछ ठीक चल रहा है, बल्कि यह है कि वह उन जोखिमों की पहचान करे जो आने वाले समय में संकट बन सकते हैं। भारत की अर्थव्यवस्था में अपार संभावनाएं हैं। इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन संभावनाओं को उपलब्धि मान लेना और चुनौतियों को अपवाद घोषित कर देना गंभीर आर्थिक विमर्श का विकल्प नहीं हो सकता।नीलकंठ मिश्रा का आशावाद अपनी जगह है। लेकिन बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा संकट, रोजगार की चुनौती, निजी निवेश पर उठते सवाल और आय असमानता की वास्तविकताओं के बीच यह पूछना पूरी तरह जायज है कि क्या कुछ अर्थशास्त्री देश को पूरी तस्वीर दिखा रहे हैं या केवल उसका सबसे उजला हिस्सा?
अर्थव्यवस्था आंकड़ों से नहीं, लोगों से बनती है। और यदि लोगों के सवाल बढ़ रहे हों, तो केवल विकास दर के आंकड़े उन सवालों का स्थायी जवाब नहीं बन सकते। सबसे बड़ा खतरा कमजोर अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वह आत्मसंतोष है जो चुनिंदा आंकड़ों की चमक में वास्तविक चुनौतियों को देखने से इंकार कर देता है।