बधाई हो GenZ, पहली बार तानाशाह झुका, कॉकरोच, राहुल और विपक्ष को भी बधाइयाँ

एक बार फिर से बधाई हो GenZ, बधाई हो राहुल गांधी, बधाई हो विपक्ष और बधाई हो भारत की उस महान जनता को जिसने अपने वोट की चोट से साबित कर दिया कि—“सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।” भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कुछ तारीखें और कुछ दौर ऐसे आते हैं, जिन्हें आने वाली नसें सिर्फ याद नहीं रखतीं, बल्कि उनसे प्रेरणा लेती हैं। पिछले कुछ सालों से देश के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य पर एक अजीब सी मायूसी, डर और एकतरफा सत्ता का माहौल था।

एक ऐसी सत्ता, जिसे अजेय मान लिया गया था। एक ऐसा तंत्र, जिसके सामने उठने वाली हर आवाज को दबा दिया जाता था। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब-जब अहंकार अपनी चरम सीमा पर पहुंचता है, तब-तब बदलाव की बयार चलती है। आज देश के युवा, खासकर ‘जेनरेशन जी’ (GenZ), मुख्य विपक्षी नेता राहुल गांधी, संपूर्ण विपक्ष और उन तमाम आम नागरिकों को बधाई देने का वक्त है, जिन्हें सत्ता के गलियारों से कभी ‘कॉकरोच’ या ‘कीड़ा-मकौड़ा’ समझकर नजरअंदाज किया गया था। पहली बार देश ने देखा है कि तथाकथित ‘तानाशाही रवैया’ जनबल के सामने झुकने पर मजबूर हुआ है। यह किसी एक पार्टी की जीत नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा की वापसी का उत्सव है।

बधाई हो GenZ, रील की दुनिया से निकलकर रीयल क्रांति तक के लिए आपको याद किया जाएगा. लंबे समय तक इस नई पीढ़ी, जिसे हम GenZ (1997 से 2012 के बीच जन्मे युवा) कहते हैं, को लेकर समाज में एक रूढ़िवादी सोच बनी हुई थी। लोग सोचते थे कि यह पीढ़ी सिर्फ इंस्टाग्राम रील्स, मीम्स, नेटफ्लिक्स और स्नैपचैट की दुनिया में खोई रहती है। इन्हें देश, राजनीति, अर्थव्यवस्था या अपने अधिकारों से कोई सरोकार नहीं है। इन्हें ‘उदासीन पीढ़ी’ (Indifferent Generation) का टैग दे दिया गया था। लेकिन इस दौर ने साबित किया कि यह सोच कितनी गलत थी। GenZ ने दिखाया कि उनका विरोध करने का तरीका पुराना और घिसा-पिटा नहीं है। उन्होंने सत्ता के अहंकार को चुनौती देने के लिए डिजिटल हथियारों का इस्तेमाल किया।

जिस नैरेटिव को करोड़ों रुपये खर्च करके मुख्यधारा के मीडिया (गोदी मीडिया) के जरिए फैलाया जा रहा था, उसे इस पीढ़ी ने एक साधारण से फैक्ट-चेक और क्रिएटिव मीम से ध्वस्त कर दिया। युवाओं ने व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से फैलने वाले झूठ को तर्कों और आंकड़ों के साथ काटना शुरू किया। जब पेपर लीक, बेरोजगारी और अग्निपथ जैसी योजनाओं ने उनके भविष्य पर वार किया, तो यही सोशल मीडिया जनरेशन सड़कों पर भी उतरी और डिजिटल स्पेस पर भी सरकार को बैकफुट पर धकेल दिया। प्रिय GenZ, आपने साबित कर दिया कि आप आंखें मूंदकर किसी को मसीहा नहीं मानते। आपने सवाल पूछने की उस परंपरा को जिंदा किया है, जिसे इस देश का लोकतंत्र भूल चुका था। आपकी इसी बेबाकी ने उस सत्ता के पैर उखाड़ दिए जो खुद को अजेय समझती थी।

2002 के बाद पहली बार तानाशाह झुका, अहंकार का किला ढहने की दास्तान देखिये । पिछले 2 दशक में भारतीय राजनीति ने एक ऐसा दौर देखा जहां ‘सहमति’ शब्द का वजूद खत्म हो चुका था और ‘संसदीय मर्यादा’ महज किताबों की बात रह गई थी। नोटबंदी, बिना चर्चा के पास किए गए कृषि कानून, चुनी हुई सरकारों को गिराना, और विपक्ष मुक्त संसद की कल्पना—यह सब एक ऐसे तंत्र के लक्षण थे जो खुद को जनता से ऊपर समझने लगा था। लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और चुनाव परिणामों ने इस अहंकार की चूलें हिला दी हैं। जो सत्ता कभी “एक अकेला सब पर भारी” का नारा देती थी, आज वह बैसाखियों (गठबंधन सहयोगियों) पर टिकने को मजबूर है। पहली बार ऐसा हुआ है कि सरकार को अपने कड़े और एकतरफा फैसलों पर कदम पीछे खींचने पड़ रहे हैं। वक्फ बोर्ड बिल को जेपीसी (JPC) में भेजना हो, लेटरल एंट्री के जरिए नौकरशाही में आरएसएस के एजेंडे को लागू करने से पीछे हटना हो, या बजट में मध्यम वर्ग के गुस्से को देखकर टैक्स स्लैब में बदलाव करना हो—ये सब इस बात के प्रमाण हैं कि तानाशाह अब झुकना सीख रहा है। तानाशाही तब खत्म होती है जब सत्ता के मन में जनता का खौफ पैदा होता है। आज संसद से लेकर सड़क तक सत्ता की वह हेकड़ी गायब है। मंत्रियों के चेहरों की हवाइयां उड़ी हुई हैं और प्रधानमंत्री को अब हर फैसले से पहले सहयोगियों की मनुहार करनी पड़ रही है। यह झुकना इस बात का प्रतीक है कि भारत में आज भी ‘लोक’ ही ‘तंत्र’ का असली मालिक है।

‘कॉकरोच’ की जीत, आम आदमी की ताकत का अहसास, सत्तारूढ़ दल के नेताओं और उनके समर्थकों द्वारा अक्सर विरोध करने वाले नागरिकों, बुद्धिजीवियों, छात्रों और एक्टिविस्टों को ‘दीमक’, ‘कॉकरोच’ या ‘परजीवी’ जैसे अपमानजनक शब्दों से नवाजा गया। तानाशाहों की यह पुरानी फितरत होती है कि वे अपने विरोधियों का ‘अमानवीकरण’ (Dehumanization) करते हैं ताकि समाज में उनके प्रति नफरत फैलाई जा सके। लेकिन इन तथाकथित ‘कॉकरोचों’ ने जो किया, वह इतिहास में दर्ज होगा। आईटी सेल की गालियां, गोदी मीडिया का मीडिया ट्रायल, ईडी-सीबीआई के झूठे मुकदमे और यूएपीए (UAPA) जैसी धाराएं भी इन आम लोगों के हौसले को नहीं तोड़ सकीं। किसानों ने साल भर दिल्ली की सीमाओं पर बैठकर ठंड, गर्मी और बरसात झेली। युवाओं ने लाठियां खाईं। महिलाओं ने शाहीन बाग से लेकर पहलवानों के धरने तक मोर्चा संभाला। यह जीत उन सभी ‘कॉकरोचों’ की है जिन्हें कुचलने की पूरी कोशिश की गई, लेकिन वे हर बार मिट्टी से उठ खड़े हुए। उन्होंने साबित किया कि लोकतंत्र में जनता की आवाज को चाहे कितना भी दबाया जाए, वह एक दिन ज्वालामुखी बनकर फटती ही है। आज उन सभी प्रताड़ित, बदनाम और संघर्षशील नागरिकों को सलाम करने का दिन है।

राहुल गांधी, ‘पप्पू’ से ‘जननायक’ बनने का सफर, इस पूरे राजनीतिक बदलाव के केंद्र में जो शख्स सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा है, वह हैं राहुल गांधी। पिछले दस सालों में भारतीय राजनीति के इतिहास का सबसे महंगा और सुनियोजित चरित्र-हनन (Character Assassination) राहुल गांधी का किया गया। उन्हें ‘पप्पू’, ‘अपरिपक्व’ और ‘नॉन-सीरियस’ साबित करने के लिए हजारों करोड़ रुपये पानी की तरह बहाए गए। लेकिन राहुल गांधी ने हार नहीं मानी। उन्होंने जो रास्ता चुना, उसने पूरी बाजी पलट दी, जब मुख्यधारा के मीडिया ने विपक्ष को पूरी तरह ब्लैकआउट कर दिया, तब राहुल गांधी ने सीधे जनता से संवाद करने का फैसला किया। कन्याकुमारी से कश्मीर और मणिपुर से मुंबई तक की हजारों किलोमीटर की पदयात्राओं ने भारत के राजनीतिक नैरेटिव को बदल दिया। उन्होंने नफरत की राजनीति के जवाब में प्रेम, सद्भाव और संविधान की रक्षा का नारा दिया। यह नारा देश के उस बड़े हिस्से के दिल में उतर गया जो विभाजनकारी राजनीति से ऊब चुका था। राहुल गांधी ने जातिगत जनगणना, सामाजिक न्याय और संविधान बचाने की जो लड़ाई छेड़ी, उसने सत्ता के ध्रुवीकरण के एजेंडे को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। आज राहुल गांधी संसद में नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition) हैं। जब वे संसद में हाथ में लाल किताब (संविधान) लेकर खड़े होते हैं और सत्ता पक्ष की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछते हैं, तो प्रधानमंत्री की बॉडी लैंग्वेज देखने लायक होती है। राहुल को यह बधाई उनके धैर्य, उनकी तपस्या और बिना डरे तानाशाह के सामने सीना तानकर खड़े रहने के लिए है।

एकजुट विपक्ष (INDIA ब्लॉक): लोकतंत्र का असली कवच

तानाशाह की ताकत इस बात में थी कि विपक्ष बिखरा हुआ था। ‘बांटो और राज करो’ की नीति के तहत विपक्ष को कभी धर्म, कभी जाति तो कभी क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर लड़ाया जाता था। लेकिन केंद्रीय एजेंसियों (ED, CBI, IT) के दुरुपयोग और तानाशाही के चरम ने विपक्ष को एक मंच पर आने के लिए मजबूर कर दिया। क्षेत्रीय क्षत्रपों और कांग्रेस ने अपने मतभेदों को भुलाकर ‘INDIA’ गठबंधन का निर्माण किया। उत्तर प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल तक विपक्ष ने जिस सूझबूझ से चुनाव लड़ा, उसने सत्ताधारी दल के ‘400 पार’ के नारे को हवा में उड़ा दिया। आज विपक्ष इतना मजबूत है कि वह सरकार को मनमाने ढंग से बिल पास करने की इजाजत नहीं दे रहा है। संसद की कार्यवाही अब एकतरफा नहीं चलती, वहां विपक्ष की आवाज गूंजती है, हंगामे होते हैं और सरकार को जवाब देना पड़ता है। विपक्ष ने साबित कर दिया कि लोकतंत्र में एक मजबूत प्रतिपक्ष उतना ही जरूरी है जितना कि शरीर में रीढ़ की हड्डी। इस एकजुटता के लिए पूरा विपक्ष बधाई का पात्र है।

यह अंत नहीं, एक नई शुरुआत है,भारतीय लोकतंत्र ने अपनी खोई हुई जमीन वापस पा ली है। वह दौर खत्म हो चुका है जहां एक व्यक्ति का फैसला पूरे देश का भाग्य तय करता था। अब देश ‘चर्चा, संवाद और सहमति’ के पुराने लोकतांत्रिक ढर्रे पर लौट रहा है। लेकिन यह जीत अंतिम नहीं है। तानाशाही प्रवृत्तियां इतनी आसानी से खत्म नहीं होतीं। वे कमजोर जरूर हुई हैं, लेकिन मरी नहीं हैं। इसलिए GenZ, विपक्ष और इस देश के नागरिकों की जिम्मेदारी अब और बढ़ गई है। हमें लगातार सवाल पूछते रहना होगा। हमें रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर सरकार को घेरते रहना होगा। हमें नफरत की राजनीति को दोबारा पनपने नहीं देना है। एक बार फिर से बधाई हो GenZ, बधाई हो राहुल गांधी, बधाई हो विपक्ष और बधाई हो भारत की उस महान जनता को जिसने अपने वोट की चोट से साबित कर दिया कि—“सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।”

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