80वां स्वतंत्रता दिवस हमारे लिए एक उत्सव भी है और एक कड़ा संकल्प भी। आइए, नफरत के बाजारों में मोहब्बत की दुकानें खोलें। मजहब की दीवारों को तोड़कर विकास के पुल बनाएं। जब हम इस सोच के साथ आगे बढ़ेंगे, तभी हम अब्दुल कलाम के सपनों का, विवेकानंद के विचारों का और भगत सिंह के अरमानों का भारत बना पाएंगे।

15 अगस्त 2026 को भारत अपनी स्वतंत्रता के 80 वर्ष पूरे कर रहा है। यह दिन केवल तिरंगा फहराने या राष्ट्रगान गाने का औपचारिक अवसर नहीं है। यह दिन आत्मनिरीक्षण करने, अपने अतीत को याद करने और भविष्य के समृद्ध भारत का संकल्प लेने का महापर्व है। आज जब हम इस ऐतिहासिक मील के पत्थर पर खड़े हैं, तो हमें एक गहरे सत्य को स्वीकार करना होगा। भारत की असली ताकत उसकी विविधता में है, लेकिन यह विविधता तब तक सार्थक नहीं है जब तक हम संकीर्ण धार्मिक पहचानों से ऊपर नहीं उठते। आइए, इस 80वें स्वतंत्रता दिवस पर हम हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई की पहचान से ऊपर उठकर केवल और केवल ‘भारतीय’ बनकर इस उत्सव को मनाएं। भारत का स्वतंत्रता संग्राम किसी एक समुदाय या धर्म की बपौती नहीं था। जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब फिरंगियों के खिलाफ उठने वाली हर आवाज हिंदुस्तानी थी। मंगल पांडे की शहादत, बहादुर शाह जफर का नेतृत्व, अशफाक उल्ला खान और राम प्रसाद बिस्मिल की अटूट दोस्ती, भगत सिंह और उधम सिंह का सर्वोच्च बलिदान, और ईसाइयों द्वारा शिक्षा व समाज सुधार के माध्यम से चेतना जगाना—यह सब इस बात का प्रमाण है कि भारत के खून में ही एकता है।

फांसी के फंदे को चूमने वाले स्वतंत्रता सेनानियों ने कभी नहीं पूछा था कि उनके बगल में खड़ा व्यक्ति किस भगवान की पूजा करता है। उनका एक ही धर्म था—देशभक्ति, और एक ही लक्ष्य था—आजाद भारत। भारत एक ऐसा गुलदस्ता है जहां हर फूल का अपना रंग और खुशबू है। यदि इस गुलदस्ते से एक भी रंग कम हो जाए, तो इसकी खूबसूरती अधूरी रह जाएगी। हिंदू दर्शन का ‘वसुधैव कुटुंबकम’, इस्लाम का भाईचारा और न्याय, सिख धर्म का ‘मानस की जात सबै एकै पहचानबो’ का संदेश, और ईसाई धर्म की निस्वार्थ सेवा और करुणा—इन सबने मिलकर भारतीय संस्कृति के ताने-बाने को बुना है। जब हम खुद को धार्मिक सीमाओं में कैद कर लेते हैं, तो हम भारत की इस महान आत्मा को चोट पहुंचाते हैं। 80वां स्वतंत्रता दिवस हमें याद दिलाता है कि हमारी पहली और सबसे बड़ी पहचान हमारा भारतीय होना है। आजादी के 80 साल बाद भी आज हमारा समाज कहीं न कहीं आंतरिक मतभेदों, संकीर्ण राजनीति और नफरत की दीवारों से जूझ रहा है।
सोशल मीडिया और राजनीतिक स्वार्थों के कारण अक्सर धर्म को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन हमें यह समझना होगा कि गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और बीमारियां किसी का धर्म देखकर नहीं आतीं। एक गरीब हिंदू बच्चे और एक गरीब मुस्लिम बच्चे की भूख एक जैसी होती है। एक बेरोजगार सिख युवा और एक ईसाई युवा की चिंताएं समान होती हैं। इसलिए, हमारी लड़ाई एक-दूसरे के खिलाफ नहीं, बल्कि देश की इन बुनियादी समस्याओं के खिलाफ होनी चाहिए। हमारे संविधान की प्रस्तावना ‘हम भारत के लोग’ से शुरू होती है। इसमें कहीं भी हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई का अलग से उल्लेख नहीं है। यह संविधान हर नागरिक को बराबरी का हक देता है। जब हम मजहब की राजनीति से ऊपर उठते हैं, तभी हम संविधान के इस मूल तत्व का सम्मान करते हैं। 80वें स्वतंत्रता दिवस पर हर नागरिक को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह किसी भी प्रकार के भेदभाव को अपने आसपास पनपने नहीं देगा। हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहां योग्यता को सम्मान मिले, न कि धार्मिक पृष्ठभूमि को। आज का भारत युवाओं का देश है।
हमारी युवा पीढ़ी तकनीकी रूप से सक्षम, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और प्रगतिशील सोच रखती है। युवाओं को पुरानी रूढ़ियों और नफरत के एजेंडे को पूरी तरह से नकारना होगा। उन्हें विज्ञान, नवाचार, खेल और आर्थिक विकास में देश का नाम रोशन करना है। जब सुंदर पिचाई, सत्य नडेला या हमारे वैज्ञानिक इसरो के मंच पर खड़े होते हैं, तो दुनिया उन्हें भारतीय के रूप में देखती है, किसी विशेष धर्म के अनुयायी के रूप में नहीं। युवाओं को इसी समावेशी सोच को अपने जीवन का हिस्सा बनाना होगा। आइए, इस 80वें स्वतंत्रता दिवस पर हम अपने घरों के साथ-साथ अपने दिलों पर भी तिरंगा फहराएं। एक ऐसा तिरंगा जिसका केसरिया रंग साहस, सफेद रंग शांति व भाईचारा, और हरा रंग समृद्धि का प्रतीक बने।
हिंदू भाई आगे बढ़कर अल्पसंख्यकों को सुरक्षा और अपनेपन का अहसास कराएं। मुस्लिम भाई देश की मुख्यधारा में शामिल होकर शिक्षा और प्रगति के नए आयाम छुएं। सिख भाई अपनी सेवा भावना से समाज के हर वर्ग को जोड़ना जारी रखें। ईसाई भाई शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में करुणा की मशाल को और तेज करें। जब ये चारों धाराएं एक साथ मिलेंगी, तो विकास की एक ऐसी त्रिवेणी बहेगी जिसे दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं पाएगी।
80वां स्वतंत्रता दिवस हमारे लिए एक उत्सव भी है और एक कड़ा संकल्प भी। आइए, नफरत के बाजारों में मोहब्बत की दुकानें खोलें। मजहब की दीवारों को तोड़कर विकास के पुल बनाएं। जब हम इस सोच के साथ आगे बढ़ेंगे, तभी हम अब्दुल कलाम के सपनों का, विवेकानंद के विचारों का और भगत सिंह के अरमानों का भारत बना पाएंगे। आइए मिलकर कहें—जय हिंद, जय भारत!




