पालतू कुत्तों का आतंक और प्रशासन की कुम्भकर्णी नींद, क्या प्रशासन किसी बड़े घटना का इंतजार कर रही है ? गुंजन अपार्टमेंट, रणजीत विहार, डीएलएफ अंकुर विहार

एक बिल्डिंग में लगभग 30 खतरनाक पालतू कुत्ते , एक परिवार के पास लगभग 12-15 खतरनाक पागल कुत्ते , प्रशासन बेबस , लोकल थाना बेबस , गाजियाबाद का डी एम बेबस , कुत्ते को पालने वाला परिवार सभी को महिला होने के नाम पर फंसाने की धमकी का सहारा लेकर आतंक की साया बना रखा है । निवासी क्या करें ? डीएलएफ अंकुर विहार, गाजियाबाद का गुंजन अपार्टमेंट। एक सामान्य आवासीय सोसाइटी जहां मध्यम वर्ग के परिवार सपनों का घर बसाने आए थे। लेकिन आज यहां का माहौल डर और आतंक से भरा हुआ है। एक परिवार द्वारा पाले गए कम से कम 12-15 कुत्ते पूरे परिसर में आतंक फैलाए हुए हैं। बच्चे स्कूल जाते समय डरते हैं, बुजुर्ग घर से बाहर निकलने में हिचकिचाते हैं, बिल्डिंग में बाहर से आने वाले लोग खौफ का अनुभव कर रहा है और महिलाएं रोजमर्रा के कामों में भी सतर्क रहती हैं। बार-बार लोकल पुलिस को और गाजियाबाद के डी एम भी को दी गई शिकायतें बेनतीजा साबित हो रही हैं। सोया हुआ प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा लगता है।

यह कहानी सिर्फ एक अपार्टमेंट की नहीं, बल्कि कई सोसाइटियों में फैली पालतू जानवरों के अनियंत्रित पालन और उससे जुड़ी समस्याओं की है। जहां पशु प्रेम की आड़ में दूसरों के अधिकारों का हनन हो रहा है। समस्या की शुरुआत एक अंधविश्वास से पैदा हुआ । निवासी का कहना है किलोगों का मानना है की कुत्तों को खाना देने का मतलब स्वर्ग पाना है। एक परिवार का जुनून गुंजन अपार्टमेंट में एक परिवार ने सालों पहले कुत्ते पालने शुरू किए। शुरू में एक-दो थे, फिर संख्या बढ़ती गई। आज स्थिति यह है कि उनके पास कम से कम 12-15 कुत्ते हैं – बड़े-बड़े breed के, जिनकी देखभाल के नाम पर पूरा परिसर प्रभावित हो रहा है। ये कुत्ते न सिर्फ अपनी छत पर बल्कि सीढ़ियों, लॉबी, पार्किंग और आसपास के खुले इलाकों में घूमते हैं। उनकी दहाड़ पूरे ब्लॉक में गूंजती है, खासकर रात के समय।बच्चे खेलने के लिए नीचे उतरते ही इन कुत्तों से घिर जाते हैं। कई बार कुत्ते भौंकते हुए पीछे पड़ जाते हैं। एक मां बताती है, “मेरा 7 साल का बेटा स्कूल से आते समय रो-रो कर घर आता है। कुत्ते उसे देखते ही दौड़ पड़ते हैं। मैं उसे अकेला छोड़कर कहीं नहीं भेज सकती।” बुजुर्गों की स्थिति और खराब है। हृदय रोग से ग्रस्त एक 68 वर्षीय व्यक्ति कहते हैं, “रात में कुत्तों की आवाज से नींद नहीं आती। दिल की धड़कन बढ़ जाती है। डॉक्टर ने स्ट्रेस से बचने की सलाह दी है, लेकिन यहां तो रोज का तनाव है।”परिसर में गंदगी का आलम देखने लायक है। कुत्तों के मल-मूत्र हर तरफ बिखरा रहता है। साफ-सफाई का जिम्मा सोसाइटी पर है, लेकिन इतनी मात्रा में गंदगी साफ करना मुश्किल हो गया है। बदबू से मच्छर-मक्खियां बढ़ गई हैं। बच्चे और बुजुर्ग संक्रमण की चपेट में आ रहे हैं। शिकायतों का सिलसिला और विपरीत परिणाम रेजिडेंट और प्रभावित परिवारों ने कई बार शिकायत की। मीटिंग्स हुईं, चर्चाएं हुईं, पुलिस आई । लेकिन हर बार वही परिवार, खासकर उसकी महिला सदस्य, आक्रामक हो जाती है। शिकायतकर्ताओं को “पशु-द्वेषी” करार दिया जाता है। महिला धमकियां देती है – “मैं तुम्हें फंसाऊंगी”, “महिला होने का फायदा उठाऊंगी”, “केस कर दूंगी”। लोकल पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई गई शिकायतों का भी यही हाल है। पुलिस आती है, चेतावनी देती है और चली जाती है। कुछ दिनों शांति रहती है, फिर पुरानी स्थिति। एक निवासी बताता है, “हमने 3 से 4 बार शिकायत की। हर बार ‘मैटर सॉल्व हो जाएगा’ कहकर टाल दिया जाता है। क्या इंतजार है? किसी बच्चे के काटने का या बुजुर्ग के हार्ट अटैक का? ”यह समस्या केवल गुंजन अपार्टमेंट तक सीमित नहीं। डीएलएफ अंकुर विहार और आसपास की कई सोसाइटियों में पालतू कुत्तों की संख्या बढ़ रही है। गाजियाबाद-दिल्ली बॉर्डर इलाका होने से यहां मध्यम वर्ग की बड़ी आबादी है, लेकिन बुनियादी सुविधाएं और कानून व्यवस्था कमजोर है।
कानूनी पहलू: अधिकार और सीमाएं
भारतीय कानून पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के तहत जानवरों के प्रति क्रूरता को दंडनीय बनाता है, लेकिन साथ ही नागरिकों के अधिकारों की भी रक्षा करता है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कई फैसलों में साफ कहा गया है कि पालतू जानवर रखना अधिकार है, लेकिन वह दूसरे के शांति भंग नहीं कर सकता।AWBI (Animal Welfare Board of India) के दिशा-निर्देशों में साफ है कि सोसाइटी पालतू कुत्तों को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं कर सकती, लेकिन उनके नियंत्रण, टीकाकरण, स्टरलाइजेशन और व्यवहार के लिए नियम बना सकती है। यदि कुत्ते आक्रामक हैं या गंदगी फैला रहे हैं, तो RWA कानूनी कार्रवाई कर सकती है।लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। कई सोसाइटियों में “डॉग लवर्स” का ग्रुप इतना सक्रिय होता है कि कोई आवाज उठाने की हिम्मत नहीं करता। सामाजिक मीडिया पर भी यह मुद्दा उठता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर समाधान नहीं निकलता।स्वास्थ्य और सुरक्षा का खतराकुत्तों के मल से फैलने वाले रोग – लेप्टोस्पायरोसिस, टोक्सोकारा, रेबीज आदि – बच्चों और बुजुर्गों के लिए घातक साबित हो सकते हैं। अनियंत्रित भौंकने से मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। नींद की कमी, तनाव, डिप्रेशन – ये आम शिकायतें हैं।एक डॉक्टर निवासी कहते हैं, “मैं रोज क्लिनिक में ऐसे मरीज देखता हूं जिनकी समस्या का मूल कारण घर के आसपास का यह आतंक है। हाई ब्लड प्रेशर, अनिद्रा, बच्चों में एंग्जायटी – सब बढ़ रहा है।”बच्चों पर सबसे बुरा असर। खेलने-कूदने की उम्र में डर का माहौल उन्हें अंदर कैद कर देता है। माता-पिता स्कूल बस तक छोड़ने और लेने जाते हैं। पार्किंग में कार से उतरते समय भी सतर्क रहना पड़ता है।महिला का रवैया: पशु प्रेम या आतंक?जिस परिवार के कुत्ते हैं, उनकी महिला सदस्य हर शिकायत पर आक्रामक हो जाती है। पड़ोसियों के अनुसार वह कुत्तों को “बच्चे” मानती है और किसी भी आलोचना को व्यक्तिगत हमला समझती है। फंसाने की धमकियां, झगड़े, सोशल मीडिया पर बदनामी – ये उनके हथियार हैं।पशु प्रेम सराहनीय है, लेकिन जब वह दूसरों के जीवन को नर्क बना दे तो वह स्वार्थ बन जाता है। कई विशेषज्ञ कहते हैं कि इतनी बड़ी संख्या में कुत्ते एक फ्लैट में रखना खुद जानवरों के लिए क्रूरता है। पर्याप्त जगह, व्यायाम और देखभाल की कमी से वे आक्रामक हो जाते हैं।प्रशासन की नींद: कौन जिम्मेदार?लोकल पुलिस, नगर निगम, RWA – सब जिम्मेदार पक्ष चुप हैं। क्या बड़े हादसे का इंतजार है? दिल्ली-NCR में स्ट्रे डॉग हमलों की घटनाएं बढ़ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल में सख्ती बरती है। लेकिन पालतू कुत्तों पर नियंत्रण के लिए स्पष्ट नीति की कमी है । रणजीत विहार और डीएलएफ अंकुर विहार का इलाका तेजी से विकसित हो रहा है। नए फ्लैट्स, अपार्टमेंट्स आ रहे हैं। लेकिन अगर बुनियादी समस्याएं हल नहीं हुईं तो निवासियों का विश्वास टूट जाएगा।
समाधान के रास्ते RWA का सक्रिय रोल:
नियम बनाएं – अधिकतम कितने पालतू रखे जा सकते हैं, स्टरलाइजेशन अनिवार्य, लीड पर रखकर घुमाना, गंदगी साफ करने की जिम्मेदारी मालिक की।
पुलिस और प्रशासन: शिकायतों पर तुरंत कार्रवाई। Noise Pollution Act, PCA Act की धाराएं लगाएं।
कानूनी मदद: प्रभावित निवासी कलेक्टर, SDM या कोर्ट जा सकते हैं। PIL दायर की जा सकती है।
जागरूकता: पशु प्रेम और मानवीय अधिकारों का संतुलन। “Adopt, don’t shop” के साथ “Responsible ownership” पर जोर।
स्वास्थ्य विभाग: नियमित जांच, वैक्सीनेशन ड्राइव।
समय रहते जागें – गुंजन अपार्टमेंट की यह कहानी चेतावनी है। एक परिवार का जुनून पूरे समुदाय को आतंकित कर रहा है। बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं – सब असुरक्षित। पुलिस और प्रशासन की निष्क्रियता हादसे को न्योता दे रही है। पशु प्रेम अच्छी बात है, लेकिन वह सीमित होना चाहिए। जब एक का अधिकार दूसरे के जीवन को प्रभावित करने लगे तो कानून हस्तक्षेप करे। RWA, पुलिस, नगर निगम और निवासियों को मिलकर समाधान निकालना होगा।अन्यथा एक दिन कोई बच्चा कट जाएगा, कोई बुजुर्ग गिर जाएगा और फिर सारे “जिम्मेदार” पक्ष रो-रो कर बयान देंगे। क्या तब जागेंगे? समय है जागने का। गुंजन अपार्टमेंट के निवासी चुप नहीं रहेंगे। आवाज उठाएंगे, लड़ेंगे – शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ता से। क्योंकि यह उनका घर है, उनका अधिकार है।
*यह लेख निवासियों की साझा पीड़ा पर आधारित है। वास्तविक नाम और विवरण गोपनीयता के लिए संरक्षित रखे गए हैं, लेकिन समस्या सार्वजनिक है। जिम्मेदार अधिकारियों से तुरंत हस्तक्षेप की अपील।

