चुनाव आयोग के विरुद्ध पब्लिक गुस्से में — देश भी गुस्से में …

किसी भी जीवंत लोकतंत्र के लिए उसकी संस्थाओं का निष्पक्ष होना अनिवार्य है। चुनाव आयोग के खिलाफ देश का यह गुस्सा इस बात का संकेत है कि भारतीय मतदाता अब अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और प्रक्रियाओं की शुचिता को लेकर अत्यधिक जागरूक हो चुका है। समय रहते यदि आयोग ने अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं किया, तो यह जन-आक्रोश आने वाले समय में चुनावी प्रक्रियाओं की वैधता पर ही सवाल खड़े कर सकता है।

देश में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के संचालन की जिम्मेदारी संभालने वाले संस्थान, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को लेकर इस समय देशव्यापी बहस और जन-आक्रोश देखने को मिल रहा है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों, ईवीएम (EVM) और वीवीपीएटी (VVPAT) से जुड़े विवादों, और चुनाव कार्यक्रमों की घोषणा में कथित पक्षपात के आरोपों ने आम नागरिकों के बीच संस्था की साख पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक, जनता और विभिन्न नागरिक समाज संगठनों द्वारा आयोग की कार्यप्रणाली के खिलाफ खुलकर नाराजगी व्यक्त की जा रही है। आलोचकों और आम जनता का आरोप है कि हाल के वर्षों में चुनाव आयोग ने कुछ राज्यों में मतदान के चरणों को जरूरत से ज्यादा लंबा खींचा है। जनता का मानना है कि ऐसा सत्तारूढ़ दलों को बड़े पैमाने पर प्रचार करने का अवसर देने के लिए किया जाता है। लंबी चुनाव अवधियों के कारण आम जनजीवन प्रभावित होता है और प्रशासनिक मशीनरी महीनों तक ठप रहती है, जिससे नागरिकों में निराशा बढ़ी है। सोशल मीडिया मंचों पर नागरिकों द्वारा लगातार यह चिंता उठाई जा रही है कि आदर्श आचार संहिता (MCC) के उल्लंघन के मामलों में आयोग का रुख सभी राजनीतिक दलों के लिए एक जैसा नहीं रहा है। विपक्ष और नागरिक समाज का आरोप है कि सत्तापक्ष के नेताओं द्वारा दिए गए भड़काऊ बयानों या नियमों के उल्लंघन पर आयोग नरमी बरतता है, जबकि विपक्षी नेताओं के खिलाफ त्वरित और सख्त कार्रवाई की जाती है। तकनीकी युग में पारदर्शिता को लेकर सजग नागरिक अब ईवीएम की विश्वसनीयता और 100% वीवीपीएटी पर्चियों की मिलान की मांग कर रहे हैं। जब सर्वोच्च न्यायालय में इस संबंध में याचिकाएं दायर की गईं और आयोग ने तकनीकी सुरक्षा का हवाला देकर शत-प्रतिशत मिलान का विरोध किया, तो जनता के एक बड़े वर्ग में यह संदेश गया कि आयोग पारदर्शिता से पीछे हट रहा है।

देश के विभिन्न हिस्सों में हुए नागरिक प्रदर्शनों और डिजिटल अभियानों से साफ है कि यह गुस्सा केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं है। युवा मतदाताओं, बुद्धिजीवियों और सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारियों के समूहों (जैसे कॉन्स्टिट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप) ने भी आयोग की घटती स्वायत्तता पर चिंता जताई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकतंत्र की नींव ‘विश्वसनीयता’ पर टिकी होती है। यदि देश के नागरिकों का चुनाव कराने वाली सर्वोच्च संस्था से ही भरोसा उठने लगे, तो यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक खतरे की घंटी है। सोशल मीडिया पर #ElectionCommission और #SaveDemocracy जैसे हैशटैग का ट्रेंड होना इस बात का प्रमाण है कि देश का एक बड़ा वर्ग इस समय आयोग की भूमिका से असंतुष्ट और गुस्से में है। अखबारों के संपादकीय और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स इस जन-आक्रोश को प्रमुखता से रेखांकित कर रहे हैं। कई वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों (जैसे टी.एन. शेषन) के दौर में आयोग की जो हनक और निष्पक्ष छवि थी, उसमें पिछले कुछ सालों में भारी गिरावट आई है।

नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार के सीधे प्रभाव को लेकर बने नए कानूनों ने भी इस अविश्वास की आग में घी डालने का काम किया है। चुनाव आयोग को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है। इस बढ़ते जन-आक्रोश को शांत करने और देश का भरोसा जीतने के लिए आयोग को कदम उठाने की तत्काल आवश्यकता है। आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन की हर शिकायत पर त्वरित, निष्पक्ष और सार्वजनिक रूप से दिखने वाली कार्रवाई की जाए। वीवीपीएटी और तकनीकी चिंताओं को लेकर नागरिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के साथ आयोग को बंद कमरों के बजाय खुले मंच पर संवाद करना चाहिए। आयोग को अपने फैसलों से यह साबित करना होगा कि वह किसी भी प्रकार के राजनीतिक या सरकारी दबाव से पूरी तरह मुक्त है। किसी भी जीवंत लोकतंत्र के लिए उसकी संस्थाओं का निष्पक्ष होना अनिवार्य है। चुनाव आयोग के खिलाफ देश का यह गुस्सा इस बात का संकेत है कि भारतीय मतदाता अब अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और प्रक्रियाओं की शुचिता को लेकर अत्यधिक जागरूक हो चुका है। समय रहते यदि आयोग ने अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं किया, तो यह जन-आक्रोश आने वाले समय में चुनावी प्रक्रियाओं की वैधता पर ही सवाल खड़े कर सकता है।

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