चुनाव आयोग पर सवाल ही सवाल मतलब असंवैधानिक सरकार — ? विचारणीय सवाल , देश आक्रोश में …

धन खोया, कमाया जा सकता है पर विश्वास खोया तो —-असंवैधानिक सरकार? चुनाव आयोग पर उठते ये ‘सवाल ही सवाल’ वास्तव में देश के हर सजग नागरिक के लिए एक विचारणीय विषय हैं।

संविधान और लोकतंत्र के मूल स्तंभों पर जब जनता का भरोसा डगमगाने लगता है, तो देश में असंतोष की लहर उठना स्वाभाविक है। वर्तमान समय में भारतीय चुनाव आयोग (Election Commission of India – ECI) की निष्पक्षता को लेकर उठ रहे अनगिनत सवाल और विपक्ष के तीखे हमले इसी व्यापक जन-आक्रोश और चिंता को बयां करते हैं। हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े (Data) और तथ्य साझा किए हैं। इन आंकड़ों के माध्यम से उन्होंने यह दर्शाने का प्रयास किया है कि कैसे वर्तमान समय में चुनावी प्रक्रियाओं, ईवीएम (EVM) के प्रबंधन और मतों की गिनती में विसंगतियां देखी जा रही हैं। विपक्ष का सीधा आरोप है कि जब एक संवैधानिक संस्था निष्पक्षता से काम नहीं करती, तो उसके द्वारा चुनी गई सरकार की वैधता भी सवालों के घेरे में आ जाती है, जिससे ‘असंवैधानिक सरकार’ जैसी गंभीर स्थिति की चर्चा शुरू हो जाती है।

चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाने के साथ-साथ मुख्य रूप से सत्तारूढ़ भाजपा (BJP) को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। विपक्ष और जनता के एक बड़े हिस्से द्वारा सरकार से सीधे तौर पर कुछ विचारणीय सवाल पूछे जा रहे हैं। संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव का आरोप: क्या भाजपा सरकार अपने राजनीतिक हितों के लिए चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्थाओं के कामकाज में दखल दे रही है? शिकायतों पर दोहरी नीति: आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में सत्तापक्ष के बड़े नेताओं के भाषणों पर ढिलाई बरतने और विपक्ष पर तुरंत कार्रवाई करने के दोहरे रवैये पर सवाल उठाए जा रहे हैं। पारदर्शिता की कमी: चुनावी आंकड़ों में होने वाले बदलावों और ईवीएम (EVM) को लेकर उठने वाली शंकाओं का संतोषजनक जवाब न देना संदेह को और गहरा करता है।

किसी भी जीवंत लोकतंत्र में चुनाव आयोग वह धुरी है जिस पर जनता का विश्वास टिका होता है। अगर चुनाव कराने वाली संस्था पर ही पक्षपात के आरोप लगने लगें, तो यह पूरे लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करता है। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी दलों द्वारा पेश किए गए आंकड़े और उठाए गए मुद्दे केवल एक राजनीतिक बयानबाजी नहीं हैं, बल्कि यह देश के नागरिकों के मन में उठ रहे उस आक्रोश को दर्शाते हैं जो अपनी लोकतांत्रिक प्रणाली की रक्षा करना चाहते हैं। चुनाव आयोग पर उठते ये ‘सवाल ही सवाल’ वास्तव में देश के हर सजग नागरिक के लिए एक विचारणीय विषय हैं। एक निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव ही किसी भी सरकार को वास्तविक और संवैधानिक वैधता प्रदान करता है। लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि चुनाव आयोग अपनी साख को पुनर्जीवित करे और उठ रहे हर सवाल का जवाब पूरी पारदर्शिता के साथ दे, ताकि जनता का भरोसा अटूट बना रहे।

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