टीकाकरण के नाम पर करोड़ों का खेल,घोषणा बड़ी, जवाबदेही छोटी,नड्डा की विफलता

अमेरिकी दवा कंपनी, सरकारी खरीद और बेटियों के स्वास्थ्य पर सवाल,रितेश सिन्हा

सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ लड़ाई जरूरी है, लेकिन बीमारी की गंभीरता को सरकार के हर फैसले के लिए खुला अधिकार-पत्र नहीं बनाया जा सकता। 28 फरवरी 2026 को केंद्र सरकार ने 14 वर्ष की लगभग 1.15 करोड़ लड़कियों के लिए राष्ट्रीय मानव पेपिलोमा विषाणु टीकाकरण अभियान शुरू किया। पात्र लाभार्थियों का आंकड़ा लगभग 1.2 करोड़ बताया गया। सरकार ने एकल खुराक वाले गार्डासिल-4 को इस कार्यक्रम में इस्तेमाल करने का फैसला किया और इसे सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर निःशुल्क देने की व्यवस्था की। सवाल टीके की उपयोगिता का नहीं, बल्कि इतने बड़े राष्ट्रीय कार्यक्रम में सरकारी निर्णय की पारदर्शिता का है। जब लगभग 1.2 करोड़ किशोरियां हर वर्ष संभावित लाभार्थी हैं तो यह केवल स्वास्थ्य अभियान नहीं, बल्कि लगातार चलने वाला विशाल सार्वजनिक व्यय है। सरकार को बताना चाहिए कि प्रति खुराक वास्तविक सरकारी खरीद मूल्य कितना है, कुल कितनी खुराक खरीदी गईं, कुल अनुबंध राशि कितनी है और आने वाले वर्षों में इस कार्यक्रम पर कितना सार्वजनिक धन खर्च होने का अनुमान है।

“बच्चियों को टीका मुफ्त मिलेगा” यह सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन सरकार के लिए यह टीका मुफ्त नहीं है। भुगतान जनता के धन से होता है। इसलिए करदाता को यह जानने का अधिकार है कि उसकी बेटियों के नाम पर खरीदी जा रही प्रत्येक खुराक की वास्तविक कीमत कितनी है। सरकार ने राष्ट्रीय कार्यक्रम के लिए गार्डासिल-4 को चुना है और इसकी निर्बाध आपूर्ति के लिए वैश्विक टीका गठबंधन के साथ खरीद व्यवस्था की बात कही है। सरकार का दावा है कि यह व्यवस्था पारदर्शी तरीके से की गई है। लेकिन पारदर्शिता का असली प्रमाण केवल यह कहना नहीं कि व्यवस्था पारदर्शी है; खरीद की कीमत, मात्रा और अनुबंध की शर्तें सामने रखना है। गार्डासिल का संबंध अमेरिकी बहुराष्ट्रीय दवा कंपनी मर्क से है, जो अमेरिका और कनाडा के बाहर एमएसडी नाम से कारोबार करती है। ऐसे में जब भारत का राष्ट्रीय कार्यक्रम करोड़ों बच्चियों को एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के उत्पाद से जोड़ता है तो सरकार से यह पूछना बिल्कुल जायज है कि भारतीय सार्वजनिक हित और दवा कंपनी के व्यावसायिक हित के बीच संतुलन तय करने के लिए कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई?

यहीं “दवा लॉबी” का सवाल उठता है। सवाल यह है कि क्या भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य नीत में बहुराष्ट्रीय दवा उद्योग के प्रभाव को रोकने के लिए पर्याप्त स्वतंत्रता और पारदर्शिता है? यदि सरकार के पास इसका मजबूत उत्तर है तो उसे खरीद दस्तावेज और वैज्ञानिक मूल्यांकन सार्वजनिक करने चाहिए। भारत के पास अपना स्वदेशी मानव पेपिलोमा विषाणु टीका सर्ववैक भी है। 2023 के प्रकाशित अध्ययन में सर्ववैक की प्रतिरक्षाजनकता को गार्डासिल के तुलनीय बताया गया था। जून 2026 में यह भी रिपोर्ट हुआ कि सर्ववैक को राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल करने पर एकल-खुराक प्रभावशीलता के अध्ययन के परिणाम का इंतजार किया जा रहा था। जब भारत के पास अपना टीका मौजूद था तो राष्ट्रीय कार्यक्रम के लिए तत्काल गार्डासिल-4 क्यों चुना गया? क्या दोनों विकल्पों की कीमत, सुरक्षा, प्रभावशीलता, आपूर्ति क्षमता और दीर्घकालिक आर्थिक बोझ की समान कसौटी पर स्वतंत्र तुलना हुई? यदि हुई तो वह रिपोर्ट जनता के सामने क्यों नहीं रखी गई? सवाल किसी विदेशी कंपनी के खिलाफ नहीं है। यदि गार्डासिल-4 वैज्ञानिक और आर्थिक रूप से बेहतर विकल्प था तो सरकार को उसका प्रमाण प्रस्तुत करना चाहिए। यदि स्वदेशी सर्ववैक उस समय एकल खुराक के लिए पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध न होने के कारण नहीं चुना गया तो सरकार को यह बात स्पष्ट रूप से बतानी चाहिए। लेकिन निर्णय का वैज्ञानिक आधार सार्वजनिक होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि निजी बाजार की कीमत को सरकारी खरीद कीमत मानना गलत होगा। फिर भी सार्वजनिक रिपोर्टों में गार्डासिल और सर्ववैक की निजी कीमतों में अंतर का उल्लेख मिलता रहा है। इसलिए सरकार से केवल एक प्रश्न पर्याप्त है—करोड़ों खुराक के लिए सरकार ने वास्तव में कितने रुपये प्रति खुराक का भुगतान किया? यही आंकड़ा पूरी आर्थिक बहस का केंद्र होना चाहिए।


यदि सरकारी खरीद कीमत बहुत कम है तो सरकार को देश को बताना चाहिए कि उसने कितनी बचत की। यदि कीमत अधिक है तो उसका औचित्य क्या है। यदि खरीद की दर सार्वजनिक नहीं की जा सकती तो कम से कम कुल सार्वजनिक वित्तीय प्रतिबद्धता और स्वतंत्र लेखा-परीक्षण की जानकारी तो सार्वजनिक होनी ही चाहिए। अगस्त 2026 तक अभियान की वास्तविक प्रगति भी सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाती है। उपलब्ध नवीनतम आधिकारिक आंकड़े के अनुसार 15 जुलाई 2026 तक 52,10,302 किशोरियों को टीका लगाया गया था। लगभग 1.2 करोड़ के लक्ष्य की तुलना में यह केवल करीब 43.4 प्रतिशत है। यानी उस तारीख तक लगभग 67.9 लाख पात्र लड़कियां टीकाकरण से बाहर थीं। सरकार ने अभियान शुरू करते समय इसे ऐतिहासिक राष्ट्रीय पहल बताया था। प्रचार और परिणाम में फर्क होता है। लक्ष्य 1.2 करोड़ और उपलब्धि 52.10 लाख—यह अंतर स्वास्थ्य मंत्रालय की जमीनी क्षमता पर सवाल खड़ा करता है। अगस्त तक मंत्रालय को नया राष्ट्रीय आंकड़ा सामने रखना चाहिए था कि कितनी अतिरिक्त बच्चियों तक टीका पहुंचा। यदि अगस्त तक अद्यतन आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया है तो यह भी पारदर्शिता का सवाल है।


सरकार यह जरूर कहती है कि सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षित किया गया और टीकाकरण का अभिलेख डिजिटल व्यवस्था में दर्ज किया जा रहा है। लेकिन प्रशिक्षण पूरा होना उपलब्धि नहीं, परिणाम तक पहुंचना उपलब्धि है। यदि व्यवस्था पूरी तरह तैयार थी तो जुलाई के मध्य तक लक्ष्य का आधे से भी कम हिस्सा क्यों पूरा हुआ? सर्वाइकल कैंसर का खतरा वास्तविक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मानव पेपिलोमा विषाणु सर्वाइकल कैंसर का प्रमुख कारण है और टीकाकरण रोकथाम का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए टीकाकरण के खिलाफ भय फैलाना गलत होगा। टीके को लेकर वैज्ञानिक समर्थन का अर्थ यह भी नहीं कि सरकारी खरीद पर सवाल पूछना बंद कर दिया जाए। टीकाकरण के साथ जांच और उपचार भी जरूरी हैं। सरकार को यह बताना होगा कि कितनी महिलाओं की जांच हुई, कितने संदिग्ध मामले सामने आए, कितनों की आगे जांच हुई और कितनों को समय पर उपचार मिला। केवल टीकाकरण का आंकड़ा बढ़ाकर सर्वाइकल कैंसर की समस्या खत्म नहीं होगी।

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा के लिए यह अब केवल टीकाकरण अभियान नहीं, बल्कि मंत्रालय की विश्वसनीयता की परीक्षा है। नड्डा को चार सवालों का सीधा जवाब देना चाहिए—कितना खर्च हुआ, किससे खरीदा गया, किस आधार पर खरीदा गया और वास्तविक कवरेज कितना है? सरकार ने गार्डासिल-4 के लिए वैश्विक टीका गठबंधन के साथ खरीद व्यवस्था की बात कही है। यदि प्रक्रिया वास्तव में पारदर्शी है तो सरकार को कम से कम कुल खरीद मात्रा, कुल वित्तीय प्रतिबद्धता और प्रति खुराक प्रभावी सरकारी लागत का स्पष्ट विवरण जनता के सामने रखना चाहिए। विदेशी कंपनी से दवा खरीदना अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन जब देश की करोड़ों बच्चियों को एक विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनी के उत्पाद से जोड़ा जा रहा हो तो सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि नीति का केंद्र भारतीय बच्चियों का स्वास्थ्य है, किसी कंपनी का बाजार विस्तार नहीं। यही वह जगह है जहां चिकित्सा उद्योग और सरकार के बीच संभावित हित-संघर्ष की स्वतंत्र जांच की आवश्यकता पड़ती है। निर्णय लेने वालों की स्वतंत्रता कैसे सुनिश्चित हुई, किन विशेषज्ञों ने सिफारिश की, कौन-से विकल्पों का मूल्यांकन हुआ और आर्थिक तुलना क्या थी—पूरी तरह जायज है। सवाल स्वदेशी विकल्प का है। यदि सर्ववैक उस समय एकल खुराक के लिए पर्याप्त प्रमाण के स्तर तक नहीं पहुंचा था तो सरकार का निर्णय वैज्ञानिक आधार पर समझ में आता है। लेकिन फिर सवाल यह है कि जून 2026 तक चल रहे अध्ययन को तेजी से पूरा कराने और भारतीय विकल्प को राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल करने की तैयारी कितनी गंभीर थी।

आत्मनिर्भर भारत का अर्थ केवल विदेशी उत्पाद को भारत में बेचने की अनुमति देना नहीं हो सकता। रणनीतिक स्वास्थ्य उत्पादों में घरेलू क्षमता को मजबूत करना भी राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा है। चौथा और सबसे बड़ा सवाल परिणाम का है। जुलाई के मध्य तक केवल 52.10 लाख बच्चियों का टीकाकरण हुआ था। लगभग 68 लाख पात्र बच्चियां बाहर थीं। नड्डा को बताना चाहिए कि अगस्त 2026 में यह संख्या कितनी हुई। यदि लक्ष्य अब भी लगभग 1.2 करोड़ है तो शेष बच्चियों तक पहुंचने की समयबद्ध योजना क्या है?किसी भी सरकारी कार्यक्रम में असफलता स्वीकार करना अपराध नहीं है। असफलता छिपाना जनता के साथ अन्याय है। यदि अभियान में बाधाएं आईं तो सरकार उन्हें सार्वजनिक करे। यदि अभिभावकों में संकोच रहा तो कारण बताए। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में व्यवस्था कमजोर रही तो सुधार बताए। सबसे महत्वपूर्ण बात सुरक्षा की है। सरकार ने स्वैच्छिक टीकाकरण और अभिभावकीय सहमति की व्यवस्था बताई है। विद्यालयों में जबरन टीका लगाने का आरोप बिना प्रमाण नहीं लगाया जाना चाहिए। सहमति का अर्थ केवल हस्ताक्षर नहीं है। अभिभावकों को टीके के लाभ, सीमाएं और संभावित प्रतिकूल प्रभावों की स्पष्ट जानकारी देना भी सरकार की जिम्मेदारी है।

जुलाई 2026 में दिल्ली उच्च न्यायालय के सामने भी एचपीवी टीकाकरण अभियान से संबंधित सुरक्षा और जानकारी के सवाल उठे। इससे यह और जरूरी हो जाता है कि सरकार सुरक्षा निगरानी के आंकड़े सार्वजनिक करे और किसी गंभीर प्रतिकूल घटना की स्थिति में तत्काल चिकित्सा सहायता की स्पष्ट व्यवस्था बताए। यहां सरकार के सामने दो रास्ते हैं। पहला—हर सवाल को टीका-विरोधी बताकर खारिज करना। दूसरा—हर सवाल का वैज्ञानिक और वित्तीय जवाब देना। लोकतांत्रिक सरकार को दूसरा रास्ता चुनना चाहिए। भारत की बेटियां किसी दवा कंपनी का बाजार नहीं हैं। वे सरकारी विज्ञापन में दिखाई जाने वाली संख्या भी नहीं हैं। उनके नाम पर होने वाला प्रत्येक खर्च और उनके शरीर पर इस्तेमाल होने वाला प्रत्येक चिकित्सकीय उत्पाद सर्वोच्च वैज्ञानिक, नैतिक और वित्तीय कसौटी पर होना चाहिए। सर्वाइकल कैंसर से लड़ाई में टीकाकरण जरूरी हो सकता है। इसके साथ जांच, उपचार, सुरक्षा निगरानी और पारदर्शी खरीद भी उतनी ही जरूरी है। सवाल यह नहीं है कि गार्डासिल विदेशी है या स्वदेशी। असली सवाल यह है—किसने चुना, क्यों चुना, किस कीमत पर चुना, किस वैज्ञानिक आधार पर चुना और जनता के सामने पूरा हिसाब कब आएगा?


नड्डा के मंत्रालय को अब केवल यह नहीं बताना चाहिए कि कितनी बच्चियों को टीका लगाया गया। उसे यह भी बताना होगा कि कितना पैसा लगा, किस कंपनी को मिला, कितनी खुराक खरीदी गईं, कितनी इस्तेमाल हुईं, कितनी बचीं और कितनी बच्चियां अभी भी बाहर हैं। पारदर्शिता इस अभियान को मजबूत करेगी। इसके अभाव में सवाल उठेंगे—और सवाल उठना गलत नहीं है।
टीका मुफ्त हो सकता है, लेकिन उसकी कीमत जनता चुकाती है। इसलिए उसकी कीमत पूछना भी जनता का अधिकार है। अगस्त 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों ने एक बात साफ कर दी है—घोषणा और जमीन पर क्रियान्वयन के बीच अभी बड़ा अंतर है। अब स्वास्थ्य मंत्रालय को प्रचार नहीं, पूरा हिसाब देना होगा।

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