मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ‘वोट चोरी’ (Voter Fraud) के गंभीर आरोपों को लेकर पूरे देश में राजनीतिक घमासान चरम पर पहुंच गया है.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और विभिन्न विपक्षी दलों के देशव्यापी आह्वान के बाद भारत के कई राज्यों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं, जिसके कारण आम जनता में भारी गुस्सा देखा जा रहा है. यह राजनीतिक विवाद तब और गहरा गया जब हालिया मीडिया रिपोर्टों में यह सनसनीखेज दावा किया गया कि चुनाव आयोग के दो अन्य सदस्यों ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision – SIR) की प्रक्रिया और लाखों नाम हटाए जाने को लेकर पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई थीं. विपक्ष का सीधा आरोप है कि इस प्रक्रिया के जरिए एक सोची-समझी रणनीति के तहत वैध मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, जबकि सरकार और निर्वाचन आयोग ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें मनगढ़ंत बताया है. विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस पूरे मामले को भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था पर एक सीधा और बड़ा हमला करार दिया है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कड़ा रुख अपनाते हुए आरोप लगाया कि “वोट चोरी देश की जनता के अधिकारों का हनन है और यह हमारे संविधान पर सीधा आघात है”. विपक्षी गठबंधन का दावा है कि इस कथित चुनावी हेरफेर में सत्ताधारी दल और निर्वाचन आयोग के शीर्ष नेतृत्व की मिलीभगत है, जिसके कारण करोड़ों वास्तविक नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित होना पड़ा है. विरोध प्रदर्शनों को और तेज करने के लिए कांग्रेस ने देश भर में ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ नामक एक व्यापक हस्ताक्षर अभियान की शुरुआत की है, जिसके तहत करोड़ों आम नागरिकों के हस्ताक्षर एकत्र कर राष्ट्रपति को सौंपने की रूपरेखा तैयार की गई है.

देश की राजधानी दिल्ली से लेकर शिमला, लखनऊ, देहरादून, चंडीगढ़ और ब्यावर जैसे शहरों में प्रदर्शनकारियों का गुस्सा सड़कों पर साफ देखा जा सकता है. दिल्ली में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और विभिन्न छात्र संगठनों ने जंतर-मंतर पर व्यापक प्रदर्शन किया और निर्वाचन आयोग के मुख्यालय की तरफ मार्च निकाला, जहां उग्र भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को वाटर कैनन और आंसू गैस का सहारा लेना पड़ा. वहीं, शिमला में हिमाचल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त का पुतला फूंका और आयोग के कार्यालय के बाहर जमकर नारेबाजी की. प्रदर्शन कर रहे नेताओं का आरोप है कि चुनाव आयोग ने अपनी निष्पक्षता और तटस्थता खो दी है और वह एक स्वतंत्र प्रहरी के रूप में कार्य करने के बजाय सत्तापक्ष के चुनावी हितों को साधने का जरिया बन चुका है. इन तीखे और आक्रामक हमलों के जवाब में, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने भी आक्रामक रुख अपनाते हुए विपक्ष पर तीखा पलटवार किया है. बीजेपी के वरिष्ठ प्रवक्ताओं ने राहुल गांधी को “भ्रम फैलाने का उस्ताद” बताते हुए कहा कि विपक्ष के पास अपने इन गंभीर दावों को साबित करने के लिए कोई ठोस या विश्वसनीय तकनीकी सबूत मौजूद नहीं हैं. सत्तापक्ष का तर्क है कि जब भी विपक्षी दलों को चुनावों में हार का सामना करना पड़ता है या अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती हुई दिखाई देती है, तो वे अपनी संगठनात्मक कमियों को छिपाने के लिए ईवीएम, मतदाता सूची और चुनाव आयोग जैसी देश की शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं पर दोष मढ़ना शुरू कर देते हैं. बीजेपी नेताओं ने इसे देश की लोकतांत्रिक साख को वैश्विक पटल पर धूमिल करने का एक गैर-जिम्मेदाराना प्रयास बताया है. इस बीच, बढ़ते विवाद को देखते हुए भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने भी अपनी निर्णय प्रक्रिया और आंतरिक मतभेदों के दावों पर आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया है. आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय के भीतर फाइलों पर अलग-अलग राय होना या किसी नीतिगत विषय पर आंतरिक असहमति होना एक सामान्य लोकतांत्रिक और प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है. निर्वाचन आयोग ने प्रेस नोट जारी कर स्पष्ट किया कि मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) सहित सभी महत्वपूर्ण और अंतिम निर्णय तीनों निर्वाचन आयुक्तों की सर्वसम्मति और पूर्ण सहमति से ही लिए गए हैं. आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध, पारदर्शी और त्रुटिहीन बनाए रखने के लिए ही यह नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया अपनाई जाती है ताकि फर्जी, मृत या दोहरे मतदाताओं के नामों को तकनीकी रूप से दुरुस्त किया जा सके.

सड़कों पर मचे इस बवाल के साथ ही यह मामला देश की शीर्ष अदालत के दरवाजे तक भी पहुंच चुका है. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को बदलने वाले 2023 के अधिनियम की संवैधानिकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई हैं. याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह है कि चयन समिति से देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर करने से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसकी निष्पक्ष कार्यप्रणाली के सुरक्षा कवच कमजोर हुए हैं. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की एक दो-न्यायाधीशों की पीठ ने इस संवेदनशील मामले को पांच-न्यायाधीशों की बड़ी संविधान पीठ के पास भेजने के सवाल पर एक खंडित (split) फैसला सुनाया है, जिसने इस कानूनी और राजनीतिक बहस को और अधिक गरमा दिया है. राजनीतिक विश्लेषकों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव किसी भी जीवंत लोकतंत्र की सबसे बुनियादी रीढ़ होते हैं, और चुनावी प्रक्रिया में देश के आम नागरिकों का अटूट विश्वास होना अनिवार्य है. यदि विपक्षी दलों द्वारा उठाए गए प्रशासनिक और तकनीकी सवालों में कोई भी तथ्यात्मक आधार है, तो उसकी गहन और पारदर्शी समीक्षा कानूनी एवं संवैधानिक दायरे के भीतर होनी चाहिए ताकि किसी भी प्रकार का ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ (विश्वास की कमी) पैदा न हो. वहीं दूसरी ओर, बिना किसी पुख्ता और न्यायिक रूप से प्रमाणित सबूतों के देश की शीर्ष चुनावी संस्था की साख पर निरंतर उंगली उठाने से जनता के मन में पूरी लोकतांत्रिक प्रणाली के प्रति अविश्वास की भावना घर कर सकती है, जो एक स्वस्थ लोकतंत्र के भविष्य के लिए चिंताजनक है. फिलहाल, देश भर की सड़कों पर देखा जा रहा यह सार्वजनिक आक्रोश और राजनीतिक दलों के बीच की यह रस्साकशी आने वाले दिनों में क्या कानूनी और राजनीतिक मोड़ लेती है, इस पर पूरे देश के बुद्धिजीवियों और आम जनता की निगाहें टिकी हुई हैं.




