नाम ही पहचान हो

शादी से पहले मनीषा चैधरी आज मनीषा सिंह हैं । विवाह के बाद लड़की को वाइफ आफ या श्रीमति के से संबोधित किया जाने लगता है। जब तक जरूरत न हो तब तक उसके नाम को छिपाया जाता है और पति के नाम से उसकी पहचान कायम की जाती है। इसलिए शादी के बाद लड़की का उपनाम बदलकर पति का उपनाम लगा दिया जाता है। लेकिन आखिर ऐसा क्यों होता है इसकी सचमुच जरूरत है या सिर्फ परंपरा के नाम पर ऐसा होता है। अगर यह परंपरा के नाम पर है तो क्या इसमें पुरुष वर्चस्व की बू नहीं आती शादी के बाद पति का उपनाम अपना लेने की परंपरा गंभीर मुद्दा है जो लड़की की पहचान को प्रभावित करती है।

 इंसान का नाम उसकी सबसे बड़ी पहचान होता है। इस नाम को ऊंचा बनाने और सम्मान पाने के लिए वह हर संभव कोशिश करता है। लेकिन हमारे देश की कुछ परंपराएं अजीबोगरीब हैं। खासकर लड़कियों के मामले में तो यह हर कदम पर भेदभाव की पुष्टि करती हैं। शादी के बाद लड़की की जिंदगी में बड़े स्तर पर कई परिवर्तन आते हैं। उसे पिता के घर को छोड़कर किसी दूसरे घर जाना होता है। सिर्फ जाना ही नहीं बल्कि उसे अपनाना भी मजबूरी बना दी जाती है। परिवर्तन की रफ्तार यहीं नहीं रुकती। इस कड़ी में एक बड़ा परिवर्तन आता है नाम में बदलाव। शादी के बाद लड़की को उसके पति के नाम से ही जाना जाने लगता है। इसलिए उसका सरनेम यानी उपनाम भी बदल जाता है। लेकिन इस बदलाव के लिए लड़कियां मानसिक रूप से तैयार होती हैं या नहीं यह भी एक प्रश्न है. यह जानने के लिए एक सर्वे कराया गया यह बात सामने आयी कि 40 फीसदी से ज्यादा भारतीय महिलाएं शादी के बाद अपना सरनेम बदलना नहीं चाहती हैं बल्कि मजबूरी में आकर ऐसा करती है। इसके पीछे उनके ऊपर पति या ससुराल वालों का दवाब होता है। दवाब में आकर शादी के बाद उन्हें अपना सरनेम बदलना पड़ता है। अन्यथा बचपन से लेकर शादी के होने तक वो जिस नाम से जानी जाती हैं शादी के बाद भी वो उसी नाम से पहचाने जाने की ख्वाहिश रखती हैं। जाहिर है कि सरनेम बदलने के पीछे महिलाओं पर मानसिक दवाब होता है. हालांकि लड़कों के लिए इस तरह का कोई प्रावधान हमारे रीति रिवाजों में नहीं हैं। आखिर सिर्फ एक जेंडर के लिए यह रिवाज मजबूरी क्यों बने हुए हैं हमारे यहां कुछ ऐसे नियम बने हुए हैं कि पासपोर्ट में सरनेम लगाओ सर्टिफिकेट में सरनेम लगाओ। वरना इसकी जरूरत नहीं है। दूसरा लड़कियों को भी पूरी स्वतंत्रता है कि पिता वाला सरनेम लगाओ या मत लगाओ। एक और बात है जब शादी हो जाती है तो लड़का तो अपना नाम नहीं बदलता लेकिन समाज ने लड़की के लिए यह एक नियम बना दिया है कि तुम अब पिता का उपनाम छोड़कर पति का उपनाम लगा लो। यह महिलाओं की कमजोरी है कि उसका विरोध नहीं कर पाती। जब लड़के को नाम नहीं बदलना पड़ता तो फिर यह नाम बदलने का नियम सिर्फ लड़की के लिए ही क्यों है। लड़कियां भी इस ओर ध्यान नहीं देती और वह उस उपनाम को आभूषण की तरह अपना लेती हैं. बॉलीवुड और बड़े बड़े घरानों की महिलाओं ने इस चलन को और बढ़ा दिया है.बॉलीवुड  की मशहूर अभिनेत्रियां शादी के बाद अपने नाम के आगे से खुशी खुशी अपने पिता का उपनाम हटा देती हैं और पति का नाम लगा लेती हैं। कहने वाली बात नहीं हैं कि जिन्हें हम बड़े बड़े नाम कहते हैं वही छोटे छोटे काम करती हैं। लड़कियों को समझना होगा कि इन सो काल्ड आधुनिक महिलाओं को अपना प्रेरणाश्रोत न मानो जो चमक दमक में रहती हैं लेकिन काम छोटे करती हैं।

आज एक नया चलन और चल पड़ा है कि पिता का नाम भी मत हटाओ और पति का नाम भी लगा लो। इस तरह नाम के साथ दो दो उपनाम लग जाते हैं। जब कहीं नाम लिखा या लिया जाता है तो सरनेम की गूंज नाम के ऊपर भारी पड़ने लगती है। अपने नाम और पहचान को लेकर इतना हल्का रवैया आखिर क्यों उन्हें मालूम होना चाहिए कि दो उपनाम के बोझ में अपने नाम को उन्होंने कितना दबा दिया। हम भ्रम में रहते हैं अपनी डिग्रियों को लेकरए हम पोशाक में पहनावे में रहन सहन में पढ़ाई लिखाई में भी आधुनिक दिखते हैं। लेकिन चेतना के स्तर पर रुढिवादी होते हैं। हकीकत तो यह है कि इंसान पहनावे के नहीं बल्कि सोच के स्तर पर आधुनिक होता है। मैं उन चालीस प्रतिशत महिलाओं से कहूंगा  कि वह आज भी रुढ़िवादिता में बंधी हुई हैं, जो सरनेम को बदलना अपनी मजबूरी मान रही हैं। उनकी अनुकूलता वही है। इसलिए अभी तक भी वह विरोध करने का साहस नहीं जुटा पा रही हैं। वह समझती हैं कि ऐसा करके हम  अच्छी स्त्री माने जाएंगे। अगर हम सदियों से चले आ रहे इस रिवाज को तोड़ देंगे तो लोग हमसे क्या कहेंगे ‘लोग क्या कहेंगे’ इसकी उन्हें बहुत चिंता सताती है।

लेकिन एक बार अपने दिल से भी पूछिए कि आपका दिल क्या कहता है। एक और बात है कि लड़कियां ऐसा सोचती नहीं उसके पीछे परवरिश भी एक कारण है। हमारे समाज में संतान नहीं पाली जातीं। लड़का और लड़की पाले जाते हैं। लड़के को यह आभास काराया जाता है कि वह उनका अपना है, जबकि लड़की को पराई मान लिया जाता है. उसके अंदर यह इच्छा पनपने ही नहीं दी जाती  कि उसकी भी कोई पहचान है। किसी अपने उपनाम के साथ वह ताउम्र रह सकती है। हालांकि एक सच यह भी है कि औरतों पर लगे बंधनों को कोई और तोड़ने नहीं आएगा। खुद महिलाओं को ही यह बंधन काटने होंगे। कितने काटने हैं यह भी उन्हें ही तय करना है। अपनी पहचान के साथ जीने की ख्वाहिश पैदा करनी होगी। नाम बदलने की प्रथा सिर्फ पिछड़े या ग्रामीण तबकों में ही नहीं है बल्कि मैट्रो सिटीज में भी महिलाएं पति के उपनाम के साथ जीती हैं। महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ता अमोली सिंह मानती हैं कि ग्रामीण महिलाओं की बात अलग है कि उन्हें मौका नहीं मिल पाता यह सोचने का अथवा वह मजबूरीवश विरोध नहीं कर पाती लेकिन पढ़ी लिखी आधुनिक महिलाएं भी शादी के बाद खुशी खुशी अपने उस उपनाम को त्याग देती हैं, जिससे उन्होंने अच्छा खासा सफर तय कर लिया होता है. ऐसा करके क्या हम भारतीय परंपरा के उसी ढर्रे पर नहीं चल रहे हैं, जिसमें कहा गया है कि विवाह से पूर्व महिला पिता के ऊपर निर्भर है, विवाह के बाद पति के और बुढ़ापे में पुत्र पर उपनाम को लेकर भी ऐसा ही लगता है कि शादी से पहले पिता का उपनाम उसके बाद पति का उपनाम चलता रहता है। यहां बात सिर्फ निर्भर रहने की बात कही गई है लेकिन महिलाएं तो उस पहचान के साथ भी जीने लगी हैं। हैरानी की बात है कि पढ़ी लिखी नौकरीपेशा आधुनिक महिलाएं ऐसा कर रही हैं। हालांकि कुछ लोग तर्क देते हैं कि यह परंपरा लड़की को परिवार के सूत्र में पिरोती है। उसके ऊपर इस बात की मुहर लग जाती है कि वह पति के परिवार का हिस्सा है. यह परंपरा सामाजिक जीवन को भले आसान बनाती है लेकिन आपकी पहचान को खत्म कर देती है. यह आपको पहले पत्नी बनाती है। कुछ लोग मानते हैं कि पति का उपनाम अपनाकर पत्नी उसके प्रति अपना समर्पण प्रदर्शित करती है। लेकिन यह समर्पण सिर्फ एक ही तबका क्यों करे। वैसे भी बचपन के नाम को गुम कर देना इतना आसान नहीं है क्योंकि इसके साथ भावनाएं भी जुड़ी होती हैं। अगर भावनावश लड़की ऐसा करती है, तो वह आने वाली पीढ़ियों  के सामने यह उदाहरण पेश करती हैं कि महिलाएं पुरुषों से कम हैं। हालांकि कुछ का यह भी तर्क होता है कि बचपन में मिला उपनाम भी तो पिता द्वारा ही दिया गया है। लेकिन यह समझना होगा कि वह उपनाम हमारे अपने परिवार से जुड़ा हुआ है। ताउम्र हमारे साथ रहना चाहिए। शादी के बाद उसका बदल जाना इस बात को इंगित करता है कि लड़की का पिता के घर से रिश्ता सिर्फ कुछ समय तक था और भारतीय समाज में लड़की तो पराया धन होती है वाली कहावत को और बल देता है। वैसे भी शादी के बाद उपनाम बदला जाए इसका जिक्र संविधान में भी कहीं नहीं है तो फिर ऐसा क्यों किया जाए। लड़कियों को समझना चाहिए कि सशक्तीकरण का अर्थ सिर्फ आर्थिक सशक्तीकरण या शारीरिक सशक्तीकरण भर से नहीं है बल्कि मानसिक स्तर पर भी सशक्त होना होगा। गुलामी से ओतप्रोत परंपराएं तोड़नी होंगी जिनमें यह एहसास कराया जाता है कि महिला की पहचान सिर्फ पुरुषों से है। इसके लिए लड़कियों में मन में एक सोच जागृत करने की जरूरत है। उन्हें मन में सवाल करने होंगे कि आखिर आधी आबादी के साथ ही ऐसा क्यों

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