जीवन के सफर में इंसान अनगिनत रिश्तों से रूबरू होता है,कुछ खून के रिश्ते होते हैं, तो कुछ समय के साथ खुद-ब-खुद बन जाते हैं। लेकिन इन सबमें सबसे अनोखा, पावन और आत्मिक रिश्ता यदि कोई है, तो वह है,मित्रता का रिश्ता। और जब बात बच्चों की पहली मित्रता की हो, तो उसका आकर्षण और उसकी मासूमियत शब्दों की सीमाओं से परे हो जाती है।-डॉ. मुश्ताक अहमद शाह ‘सहज’, हरदा, मध्य प्रदेश

बचपन की दोस्ती,,जहां स्वार्थ का कोई स्थान नहीं होता। वयस्कों की दुनिया में मित्रता अक्सर नफा-नुकसान, सामाजिक ओहदे या समान हितों की तराजू पर तौली जाती है। इसके विपरीत, बच्चों की दुनिया इन तमाम कृत्रिम दीवारों से कोसों दूर होती है। निष्कपट भाव, बच्चों की पहली दोस्ती किसी योजना का हिस्सा नहीं होती। यह पार्क के झूले पर अचानक हुई मुलाक़ात, स्कूल की पहली बेंच पर शेयर की गई टिफिन की खुशबू, या मिट्टी के घरौंदे एक साथ मिलकर बनाने भर से शुरू हो जाती है। बिना शर्तों का स्नेह,इस रिश्ते में कोई शर्त नहीं होती। यहाँ रंग, रूप, जाति या आर्थिक स्थिति कोई मायने नहीं रखती। उनके लिए तो बस साथ खेलना और एक-दूसरे की खिलौना-गाड़ी को साझा करना ही पूरी दुनिया होती है। वह अनमोल पल,,, जब मैं और अशोक एक थे

बचपन के उन दिनों के कई पल आज भी दिल के सबसे करीब है, जब हर चीज़ बेफिक्र और अपनी हुआ करती थी। दोपहर की चिलचिलाती धूप हो या बारिश की फुहारें, हमारा ठिकाना हमेशा एक ही हुआ करता था,पुराने नीम के पेड़ की छांव या कच्ची गलियाँ। मुझे आज भी वह दिन अच्छी तरह याद है जब स्कूल से लौटते वक्त अचानक मूसलाधार बारिश शुरू हो गई थी। हमारे पास एक ही छोटा सा छाता था, जो दोनों को पूरी तरह ढंक नहीं सकता था।

ऐसे में अशोक ने बिना एक पल गंवाए अपना बस्ता अपनी छाती से लगाया, छाता मेरी तरफ़ झुका दिया और खुद भीगते हुए मुझसे हँसकर बोला, “तू आज बीमार पड़ गया तो स्कूल की छुट्टी हो जाएगी, और मेरा खेलने का साथी कौन बचेगा? वो भीगता हुआ घर पहुंचा,,,
उसकी वह बेपरवाह हँसी, बारिश की बूँदों के बीच गूँजती उसकी आवाज़ और एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर घर तक का वह लंबा सफ़र,आज भी मेरी स्मृतियों में किसी अमूल्य रत्न की तरह चमकता है। वह पल छोटा था, लेकिन उसकी गहराई समंदर जैसी असीम थी। दोस्ती की एक अनूठी मिसाल। अशोक सिर्फ़ एक नाम या एक दोस्त नहीं था, बल्कि भरोसे का दूसरा नाम था। हमारी दोस्ती उम्र के हर पड़ाव के साथ और गहरी होती गई। जब कभी मैं किसी बात पर टूटता या उदास होता, तो अशोक का यह कहना ही काफ़ी होता था,”फिक्र मत कर, तेरा भाई तेरे साथ है।” उसने दोस्ती को एक ऐसा आयाम दिया जहाँ सुख-दुःख की लकीरें मिट जाती थीं। वह खुद की परवाह किए बिना अपने यार की खुशी के लिए हर हद पार करने को तैयार रहता था।
अब बस यादें शेष हैं… वक्त का पहिया घूमा, रास्ते अलग हुए, और फिर ज़िंदगी ने एक ऐसा क्रूर मोड़ लिया जहाँ से अशोक इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह गया। आज जब भी मैं उन पुरानी जगहों से गुजरता हूँ, तो ऐसा लगता है जैसे हर कोने से अशोक की हँसी गूँज रही हो। वह भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसकी मौजूदगी का अहसास आज भी मेरी साँसों में बसा है। उसकी दी हुई यादें ही अब मेरा संबल हैं। “कुछ लोग ज़िंदगी से चले जाते हैं, लेकिन दिलों में उनका ठिकाना हमेशा के लिए अमर हो जाता है।”
अशोक, तुम्हारी दोस्ती इस जीवन की सबसे बड़ी दौलत थी, और आज मित्रता दिवस के इस पावन अवसर पर तुम्हारी यादें ताउम्र इस दिल की धड़कन बनकर साथ रहेंगी।



