एक खामोश महामारी, जो निगल रही है युवा पीढ़ी-पिंटू यादव,छात्र नेता सह सामाजिक कार्यकर्ता, कुमारखंड, मधेपुरा (बिहार),

बिहार की पहचान कभी ज्ञान, संस्कृति, संघर्ष और सामाजिक चेतना की भूमि के रूप में रही है। इसी धरती ने देश को महान समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी, साहित्यकार और राजनीतिक नेतृत्व दिया है। लेकिन आज बिहार एक ऐसे संकट का सामना कर रहा है, जिसकी चर्चा राजनीतिक मंचों और चुनावी सभाओं में बहुत कम सुनाई देती है। यह संकट है “सूखा नशा” अर्थात स्मैक, हेरोइन, चरस, गांजा, नशीली गोलियां, इंजेक्शन और अन्य मादक पदार्थों का बढ़ता जाल। यह केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और नैतिक पतन का ऐसा प्रश्न है जो आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को प्रभावित कर रहा है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि इस नशे की चपेट में गांवों और कस्बों के किशोर, छात्र और युवा तेजी से आ रहे हैं। जिस उम्र में उन्हें शिक्षा, खेल, रोजगार और राष्ट्र निर्माण के सपने देखने चाहिए, उस उम्र में वे नशे की गिरफ्त में अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं।

बिहार में शराबबंदी लागू होने के बाद उम्मीद की गई थी कि समाज नशामुक्त होगा और युवा पीढ़ी बेहतर वातावरण में विकसित होगी। शराबबंदी के सकारात्मक परिणाम भी सामने आए, लेकिन इसके समानांतर एक नई और अधिक खतरनाक समस्या उभरकर सामने आई—सूखे नशे का फैलाव। आज कई क्षेत्रों में शराब की जगह स्मैक, हेरोइन और अन्य नशीले पदार्थों ने ले ली है। यह नशा न केवल शरीर को बल्कि व्यक्ति की सोच, व्यवहार, परिवार और सामाजिक जीवन को भी नष्ट कर देता है। मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, पुर्णिया एवं अररिया सहित सीमांचल और कोसी क्षेत्र के अनेक जिलों में लगातार नशीले पदार्थों की बरामदगी की खबरें सामने आ रही हैं। यह संकेत है कि कहीं न कहीं एक संगठित नेटवर्क सक्रिय है। गांवों के लोग जानते हैं कि उनके आसपास कौन लोग इस कारोबार में शामिल हैं, लेकिन भय, असुरक्षा और प्रतिशोध की आशंका के कारण खुलकर सामने नहीं आ पाते। आम नागरिकों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब स्थानीय स्तर पर लोगों को जानकारी है, तो क्या प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं होगी?
आज स्थिति यह है कि नशे की लत से ग्रसित कई युवा अपराध की दुनिया में भी प्रवेश कर रहे हैं। मोबाइल छिनतई, बाइक चोरी, लूटपाट, घरेलू हिंसा और अन्य अपराधों के पीछे नशे की लत एक महत्वपूर्ण कारण बनती जा रही है। नशे की आवश्यकता पूरी करने के लिए युवा किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाते हैं। इससे न केवल उनका भविष्य बर्बाद होता है बल्कि परिवार और समाज भी संकट में पड़ जाता है। सूखे नशे का प्रभाव केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक भी होता है। लंबे समय तक नशा करने वाले व्यक्ति में अवसाद, तनाव, चिड़चिड़ापन, आक्रामकता, भ्रम और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याएं पैदा हो जाती हैं। कई मामलों में व्यक्ति सामाजिक जीवन से कट जाता है और अकेलेपन का शिकार हो जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार नशीले पदार्थों का लगातार सेवन फेफड़ों, हृदय, किडनी, लीवर और स्नायु तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।
इस समस्या का सबसे दुखद पहलू यह है कि अब इसकी चपेट में कम उम्र के बच्चे भी आने लगे हैं। कई स्थानों पर 12 से 15 वर्ष की आयु के किशोर नशे का सेवन करते पाए जा रहे हैं। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए गंभीर चेतावनी है। यदि बच्चों और किशोरों को समय रहते इस दलदल से नहीं निकाला गया तो आने वाले वर्षों में सामाजिक और आर्थिक संकट और गहरा होगा। इस समस्या के लिए केवल सरकार या प्रशासन को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। समाज, परिवार, शैक्षणिक संस्थान और स्वयं युवाओं को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। माता-पिता को अपने बच्चों के साथ नियमित संवाद बनाए रखना चाहिए। बच्चों के मित्रों, दिनचर्या और व्यवहार में होने वाले बदलावों पर ध्यान देना चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों को नशा विरोधी जागरूकता अभियान चलाने चाहिए। पंचायत स्तर पर खेलकूद, पुस्तकालय, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सकारात्मक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि युवाओं की ऊर्जा सही दिशा में लग सके।
सरकार के स्तर पर भी व्यापक और ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है। नशे के कारोबार में शामिल लोगों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। नशा मुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में काउंसलिंग सेवाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए। साथ ही, नशे के शिकार युवाओं को अपराधी नहीं बल्कि उपचार और पुनर्वास की आवश्यकता वाले व्यक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। आज आवश्यकता केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन खड़ा करने की है। जिस प्रकार समाज ने कभी दहेज, अशिक्षा और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष किया था, उसी प्रकार अब नशे के खिलाफ भी व्यापक जनजागरण की जरूरत है। यदि समाज जागरूक होगा तो नशा माफियाओं की ताकत स्वतः कमजोर पड़ेगी।
बिहार की सबसे बड़ी पूंजी उसकी युवा शक्ति है। यदि यही युवा शक्ति नशे की भेंट चढ़ गई, तो विकास, रोजगार, शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन के सारे सपने अधूरे रह जाएंगे। इसलिए यह केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि बिहार के भविष्य का प्रश्न है। आइए संकल्प लें कि हम अपने गांव, मोहल्ले, विद्यालय और समाज को नशामुक्त बनाने के लिए जागरूकता फैलाएंगे, युवाओं का मार्गदर्शन करेंगे और नशे के खिलाफ एक मजबूत सामाजिक अभियान खड़ा करेंगे। क्योंकि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित, स्वस्थ और सशक्त बनाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। नशा किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि अनेक समस्याओं की शुरुआत है। बिहार को बचाना है तो उसकी युवा पीढ़ी को बचाना होगा।



